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नई दिल्ली में प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह से मुलाकात के दौरान उन्हें परम्परागत नागा अस्त्र भेंट करत

Written byArchiveArchive
Feb 1, 2005, 12:00 am IST
inArchive

दिंनाक: 01 Feb 2005 00:00:00

नई दिल्ली में प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह से मुलाकात के दौरान उन्हें परम्परागत नागा अस्त्र भेंट करते हुए एन.एस.सी.एन. (आई.-एम.) के अध्यक्ष इसाक स्वू आई.-एम. की छाया में नागा शांति-वार्ताक्या शांति लौटेगीनागालैण्ड में?- आचार्य राधागोविन्द थोंङामश्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ (बाएं से)टी. मुइवा और इसाक स्वूदिसम्बर, 2004 के आरम्भ में नागा नेता इसाक स्वू और टी. मुइवा ने नई दिल्ली में प्रधानमंत्री, केन्द्रीय गृहमंत्री, पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी व भाजपा अध्यक्ष श्री लालकृष्ण आडवाणी से भेंट की। इस दौरान इन नागा नेताओं ने हालांकि ठोस मुद्दों पर चर्चा तो शुरू नहीं की परन्तु विश्वास व्यक्त किया कि नागा समस्या का समाधान केवल बातचीत के जरिए ही हो सकता है। लेकिन जिन मुद्दों को लेकर नागा नेता चल रहे हैं, जैसे नागालिम, वृहत नागालैंड आदि, उन पर कितना आगे बढ़ा जा सकता है, यह तो दूसरे दौर की उनकी वार्ता के बाद ही स्पष्ट होगा। फिलहाल नागा समस्या की पृष्ठभूमि पर नजर डालना आवश्यक है। नागालैण्ड के नागा मणिपुर के जेलियांरांग आदि जनजातियों को “कच्चा नागा” कहते हैं। वे अपने पड़ोसी तांखुल तथा माओ-मराम आदि जनजातियों को “पक्का नागा” मानते हैं। कूकी-मिजो को वे नागा मानने के लिए तैयार नहीं हैं। एन.एस.सी.एन. (आई.- एम.) गुट अरुणाचल से मिजोरम तक की जनजातियों को नागा मानता है। एन.एस.सी.एन. (के.) तथा एन.सी.एन. और कूकी संगठनों के कारण मुइवा को 1997 में भारत सरकार से मध्यस्थों तथा अपने लोगों के जरिए बातचीत की भूमि तैयार करनी पड़ी थी। तत्कालीन गुजराल सरकार के साथ 1997 में इसाक मुइवा ने बातचीत की। इसी तरह 1998 और 2000 में तत्कालीन राजग सरकार से बातचीत की। यूं इसाक मुइवा सबसे अधिक महत्व जापान में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से हुई वार्ता को देते हैं। उस समय वाजपेयी जी जापान दौरे पर थे एमस्टरडम से मुइवा-इसाक ने भेंट करने के लिए समय मांगा था। अटल जी ने कहा, “आप दोनों जब चाहे जापान आकर मुझसे मिल सकते हैं। आप के लिए मैं अवश्य समय निकालूंगा।” यही कारण है कि इसाक-मुइवा अटल जी को खुले दिल-दिमाग का नेता मानते हैं।चर्च, पूर्वाञ्चल तथा अलगाववादठीक है। अन्य अशान्त क्षेत्रों की तरह नागालैंड में भी शान्ति होनी चाहिए। लेकिन सवाल उठता है कि किस शर्त पर? पूर्वाञ्चल में सभी विद्रोही आन्दोलन चर्च के साए में तथा ईसाई कट्टरवादियों के मार्गदर्शन में जन्मे, बढ़े और चल रहे हैं। यह एक ऐसा सत्य है जिसे भाजपानीत सरकार ने भी स्वीकार किया था और नागालैंड के मुख्यमंत्री रियो को समर्थन देते हुए तुष्टीकरण का सहारा लिया था। अब सोनिया गांधी के वास्तविक अधिपति होते ही चर्च प्रेरित शान्ति-वार्ताओं में तेजी आ गई है। लेकिन असलियत किधर मुड़ रही है, यह बोलने या उस पर चर्चा करने का साहस बहुत कम दिख रहा है। पिछले दिनों प्रसिद्ध उद्योगपति एवं राज्यसभा सदस्य विजय माल्या ने इस सम्बंध में एक सवाल उठाया तो ऐसा सन्नाटा छा गया कि किसी ने इस पर चर्चा भी नहीं की। विजय माल्या का सवाल था- क्या पूर्वाञ्चल को भारत से अलग करने में अमरीकी षड्यंत्र सत्य है? जब संसद में एक सांसद का सवाल दबा दिया जाता है तो आम चर्चा कहां से होगी? इस पृष्ठभूमि में ही शान्ति-वार्ता के नए दौर को देखना चाहिए।बातचीत से पहले ईसाई प्रार्थनाजिस समय दोनों नागा नेता इसाक स्वू और टी. मुइवा प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह से भेंट करने उनके निवास पर गए तो वहां उपस्थित सभी लोग उस समय आश्चर्यचकित रह गए जब बात शुरू करने से पहले इसाक स्वू ने ईसाई प्रार्थना की। बताया गया कि स्वू कट्टर ईसाई हैं। वे ईसाइयत में गहन निष्ठा रखते हैं और नागा संघर्ष को बिल्कुल सही ठहराते हैं। यही नहीं, जब ये नेता केन्द्रीय गृहमंत्री श्री शिवराज पाटिल से मिलने उनके दफ्तर गए तो वहां भी इसाक स्वू ने ईसाई प्रार्थना की। कुछ सरकारी अधिकारियों को वैसे यह बात कोई नई नहीं लगी। क्योंकि इससे पहले भी वाजपेयी सरकार के समय केन्द्र की ओर से वार्ताकार के. पद्मनाभैया के साथ बातचीत के विभिन्न दौर इसी तरह की प्रार्थना से शुरू होते रहे हैं। उल्लेखनीय है कि जिस “नागालिम” की मांग नागा नेता करते आ रहे हैं, उसे वे “लैंड आफ क्राइस्ट” के रूप में चिन्हित करते हैं।यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि मुइवा ने पूर्वोत्तर के आतंकवादी संगठनों के लिए वार्ता का मार्ग खोला है। 11 सितम्बर, 2001 की अमरीका पर हमला करके बिन लादेन ने जिस प्रकार अमरीका की जो नाक काटी है तब से विश्व में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से आतंकवादियों को मदद न देने की और उनकी समाप्ति में सहयोग देने की अपील की जा रही है। अत: इसाक-मुइवा ने संघर्षविराम समझौते तथा वार्ता का जो मार्ग भूमिगत संगठनों को दिखाया है, उसका ऐतिहासिक महत्व है। लगता है कि मुइवा ने विश्व की बदलती राजनीति को पहचान लिया है। उल्फा, एन.एस.सी.एन. (के.) तथा मणिपुर के भूमिगत संगठन भी मानसिक रूप से वार्ता के लिए अपने को तैयार करने में लगे हैं। यह परिदृश्य अटल जी के दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों के साथ मैत्री-सहयोग संघ की पहल ने निर्मित किया है। पूर्व राजग सरकार ने पूर्वोत्तर भारत के विकास के लिए अलग मंत्रालय की रचना तथा देश के बजट का 10 प्रतिशत पूर्वोत्तर के विकास के लिए खर्च करने का प्रावधान बनाने के साथ-साथ बातचीत के जरिए पड़ोसी देशों से सद्भाव का मार्ग खोला है।6 दिसम्बर 2004 को एन.एस.सी.एन. (आई.-एम.) के महामंत्री मुइवा ने पत्रकारों से कहा, “हर समस्या का समाधान बातचीत के रास्ते से निकलता है। नागा जाति का एक इतिहास रहा है। हम शांतिपूर्ण ढंग से नागा समस्या का समाधान चाहते हैं।”नागालैंड में एन.एस.सी.एन. के दोनों गुटों में नवम्बर में तीन झड़पें हुई थीं। ये झड़पें एन.एस.सी.एन. (के.) के भारत से वार्ता के लिए तैयार होने के कारण हुईं। विशेषज्ञों की राय है कि नागालैंड में केवल आई.-एम. से वार्ता करने तथा संघर्षविराम करने से पूर्ण शांति नहीं आ सकती है। खापलांग गुट के साथ वार्ता करने के साथ ही एन.सी.एन. से भी बातचीत के लिए भूमि तैयार करनी होगी।नागालैंड के मुख्यमंत्री नैफियू रिओ तथा नागालैंण्ड से लोकसभा सांसद वाङघू कोन्याक ने भी आशा व्यक्त की कि आई.-एम. नागालैंड और नागा जाति की एकता को ध्यान में रखेंगे। दिल्ली प्रधानमंत्री और गृहमंत्री से बातचीत कर दोनों नेता क्रिसमस मनाने दीमापुर पहुंचे।नागालैंड की स्थितिनागालैंड राज्य का गठन 1963 में हुआ था। तब से विधानसभा के विधायकों तथा लोकसभा सांसद का चुनाव नागालैंड की जनता करती आ रही है। लोकतंत्र के कारण ही नागालैंड में अंगामी, आओ, सेमा, कोन्याक आदि सभी जनजातियों से मंत्री चुने जाते रहे हैं। एक जाति विशेष को ही बराबर मुख्यमंत्री पद न देकर विधायकों ने अपने बुद्धि-विवेक के प्रयोग से अलग-अलग जनजातियों से मुख्यमंत्री चुने हैं।नागालैंड पूर्वोत्तर विकास परिषद का सदस्य है। उसको अपनी “आठ बहनों” में हिस्सेदारी रखकर अपना हिस्सा लेना होता है। नागा जाति मणिपुर, असम और अरुणाचल में रहती है तो मणिपुरी, असमिया तथा अरुणाचलीय जनजातियां भी नागालैंड में रहती हैं। अत: नागा क्षेत्रों को वृहत नागालैंड के नाम पर नागालैंड में मिलाने का प्रस्ताव रखना कहां तक उचित है? यह सर्वविदित है कि मणिपुर से थीबोमइ, अरुणाचल से तुएन सांग, असम से डिमासा (काछारी) जाति क्षेत्र को लेकर नागा हिल्स क्षेत्र में मिलाने से नागालैंड बना है।नागालैंड जाने वाले असम के नागरिकों और मणिपुर के नागरिकों पर नागालैंड सरकार, नगर पालिकाओं और ग्राम पंचायतों ने परमिट और कर व्यवस्था लागू कर रखी है। नागालैंड के आतंकवादी संगठन कर लेते हैं। लेकिन उसी तरह असम और मणिपुर से गुजरने वाले नागालैंड के नागरिकों से भी कर लेना शुरू किया जाय तो उसका क्या परिणाम होगा? भूमिगत संगठनों पर राज्य की जनता की जिम्मेदारी नहीं होती है। अत: वे कुछ हद तक मनमानी बात कह सकते हैं। मगर राज्य सरकार के ऊपर अपनी जनता के जीवन की सुरक्षा, शांति, खुशहाली और उन्नति की जिम्मेदारी होती है। अत: अपने पड़ोसी राज्यों और राष्ट्र के प्रति उसका एक दायित्व होता है। इसलिए पूर्वोत्तर की एकता का ध्यान रखना नागालैंड की सरकार तथा नेताओं की जिम्मेदारी हो जाती है।NEWS

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