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-स्वामी सत्यमित्रानन्द
संस्थापक, भारत माता मन्दिर, हरिद्वार
भारत के ह्मदयस्थल के समान उज्जैन की महिमा अपार है। वैसे तो भारतवर्ष का कण-कण अपनी ऐतिसाहिक महिमा से महनीय है किन्तु तीर्थों की महिमा का अपना अलग महत्व है। काल की गति में संसार जीवन जी रहा है और उसका गन्तव्य महाकाल है। राजा, रंक, फकीर कोई भी महाकाल के गाल में जाने से बचने वाला नहीं है। अत: भगवान महाकालेश्वर की उपासना सम्प्रदाय रहित होकर करनी चाहिए। उज्जैन के महाकालेश्वर सदाशिव सबको काल की महिमा का स्मरण करा रहे हैं। वेदों, पुराणों महाकाव्यों में उज्जैन की महिमा का गान किया गया है।
सान्दीपनि ऋषि के आश्रम में भगवान कृष्ण विद्यार्थी बनकर रहे थे। कृष्ण-सुदामा की मैत्रीस्थली उज्जैन है। संपन्नता और विपन्नता का वहां अद्भुत गठजोड़ हुआ, जो इतिहास की कहानी बन गया। सुदामाचरित काव्य का सृजन हो गया।
प्रख्यात कविकुल गुरु कालिदास की रचनाएं इसी पावनभूमि से प्रकट हुर्इं। महाकवि बाण ने अपने साहित्यसृजन से यहां का गौरव बढ़ाया था तो वराह-मिहिर के ज्योतिष्ज्ञान ने इसी भूमि से विश्व को चमत्कृत किया था।
सप्तपुरियों में उज्जैन का विशेष महत्व है। योगीराज भर्तृहरि ने वैराग्यशतक लिखकर विलासरत जीवन की नि:स्सारता का संदेश यहीं से दिया था। वीर विक्रमादित्य, समुद्रगुप्त, चन्द्रगुप्त द्वितीय जैसे भद्रशासकों की गरिमापूर्ण राज्य-व्यवस्था के प्रेरणा प्रसंग उज्जैन को उत्तर भारत के “जयनगर” के रूप में स्थापित कर देते हैं।
उज्जैन के कुम्भ मेला को “सिंहस्थ पर्व” कहा जाता है। मेरी व्यक्तिगत मान्यतानुसार कायरता, प्रमाद एवं स्वाभिमान-शून्यता से राष्ट्र को बचाने के लिए सिंहस्थ पर्व की रचना की गई होगी। श्रृगालवृत्ति से राष्ट्र जीवित नहीं रह सकता। सिंह बनकर ही समस्याओं का समाधान होता है। पूरे राष्ट्र को स्वस्थता, स्वाभिमान, स्वदेशी, स्वसंस्कार एवं स्वराज्य का सतत स्मरण कराने के लिए सिंहस्थ महाकुम्भ पर्व का प्रादुर्भाव हुआ है।
उज्जैन देश का ह्मदयस्थल है। ह्मदय की गति सदा उचित दिशा में चलनी चाहिए तभी जीवन की दशा सुधरती है। मध्य भाग सुदृढ़ रहे तो आक्रांताओं को त्वरित उत्तर दिया जा सकता है। इसलिए वहां क्षिप्रा प्रवाहित है। गतिशीलता ही जीवन का दूसरा नाम है। आकाश, पाताल, भूलोक (मृत्युलोक) तीनों में अब मानवयात्राएं प्रचलित हो चुकी हैं। इन तीनों में भ्रमण करने वाले, यात्रा करने वाले महाकालेश्वर की पूजा से त्राण पाते हैं।
आकाशे तारकं लिंग, पाताले हाटकेश्वरम्।
मृत्युलोके महाकाल लिंगत्रयनमोस्तुते।।
आध्यात्मिक, राष्ट्रीय, शैक्षणिक, सामाजिक एवं धार्मिक सभी दृष्टियों से उज्जैन राष्ट्र के लिए प्रेरणास्रोत है। महाकुंभ का सबको लाभ लेना चाहिए। सदाशिव भूतभावन शंकर की पावन भस्म भ्रष्टाचाररूपी भस्मासुर को भस्म करेगी, ऐसा विश्वास है। देवाधिदेव महादेव की विभूति भारत के पूर्वगौरव संस्थापन में सहायक होगी और हम सब विजय-विभूति, विनय एवं विवेक संपन्न राष्ट्र के नागरिक बन सकें, ऐसी प्रार्थना उज्जैन के सर्व देव-देवियों के चरणों में करनी चाहिए।
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