बच्चों की सुरक्षा से जुड़ा कोई भी मामला बेहद गंभीर होता है। खासकर तब, जब नाबालिग के साथ यौन शोषण जैसा अपराध हुआ हो। ऐसे मामलों में कानून बच्चे की उम्र और उसकी सुरक्षा को सबसे ज्यादा महत्व देता है। केरल हाईकोर्ट ने भी एक ऐसे ही मामले में सख्त रुख अपनाते हुए साफ कर दिया है कि 18 साल से कम उम्र की बच्ची के साथ यौन संबंध को सिर्फ निकाह या विवाह का नाम देकर सही नहीं ठहराया जा सकता। हाईकोर्ट ने 17 वर्षीय नाबालिग लड़की से बार-बार दुष्कर्म के आरोपी की याचिका खारिज कर दी। आरोपी ने अपने खिलाफ चल रही आपराधिक कार्रवाई को खत्म करने की मांग की थी। उसकी ओर से दलील दी गई कि नाबालिग लड़की के साथ उसका निकाह मुस्लिम रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था। इसलिए उसके खिलाफ दुष्कर्म की कार्रवाई नहीं होनी चाहिए।
चार दिनों तक शोषण का आरोप
यह मामला अक्टूबर 2021 का है। आरोप है कि आरोपी नाबालिग लड़की को बहला-फुसलाकर अपने घर ले गया। इसके बाद करीब चार दिनों तक उसका लगातार यौन शोषण किया गया। मामले में कुछ अन्य लोगों पर भी आरोपी की मदद करने का आरोप है। इस मामले में यह बात भी सामने आई कि लड़की के माता-पिता को कथित तौर पर घटना की जानकारी थी, लेकिन उन्होंने इसकी शिकायत नहीं की। ऐसे मामलों में परिवार की चुप्पी पीड़ित बच्चे के लिए स्थिति को और मुश्किल बना सकती है। आरोपी की ओर से भारतीय दंड संहिता की धारा 375 के अपवाद-2 का हवाला दिया गया।
दलील थी कि 15 से 18 वर्ष की उम्र के बीच की पत्नी के साथ संबंध को उस समय दुष्कर्म नहीं माना जाता था। लेकिन जस्टिस जोबिन सेबास्टियन ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ‘इंडिपेंडेंट थॉट’ फैसले का हवाला देते हुए कहा कि नाबालिग की सुरक्षा को विवाह या धार्मिक रीति-रिवाज के आधार पर खत्म नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट ने पोक्सो अधिनियम की धारा 42ए का भी उल्लेख किया। इसके तहत पोक्सो कानून को विशेष प्राथमिकता प्राप्त है। इसका सीधा मतलब है कि 18 साल से कम उम्र के बच्चे के साथ यौन संबंध के मामले में कोई भी निजी कानून, परंपरा या विवाह का दावा आरोपी को पोक्सो की कार्रवाई से बचाने का आधार नहीं बन सकता।











