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अमूल्य धरोहर के दुर्लभ दर्शन
महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने भारतीय संस्कृति के पदचिह्नों की खोज में दुनियाभर की खाक छानी। फिर उन्हें इकट्ठा किया और हमारे लिए संजोकर रख दिया। पर हम ऐसे आलसी रहे कि 80 साल तक इनकी सुध ही नहीं ली। यह तो इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के प्रयासों का नतीजा है कि आमजन इन दुर्लभ कलाकृतियों-पांडुलिपियों को देख सके
आराधना शरण
बिहार की राजधानी पटना के संग्रहालय के अंधेरे कमरों में कला और संस्कृति की अनमोल विरासत रखी हुई थी। इन्हें प्रतीक्षा थी बंद कक्षों से बाहर निकलकर आम जनमानस तक पहुंचने की, क्योंकि अपने श्रमसाध्य प्रयासों से इन्हें संजोने वाले प्रख्यात कर्मयोगी महापंडित राहुल सांकृत्यायन ऐसा ही चाहते थे। हिंदू और बौद्ध संस्कृति के पदचिह्नों की खोज में देश-विदेश भटकने वाले यायावर राहुल सांकृत्यायन ने कमर बांधकर भावी घुमक्कड़ों का आह्वान किया था कि संसार उनके स्वागत के लिए तैयार बैठा है ताकि वे ज्ञान की अजस्र धारा में भावविभोर
हो सकें।
दरअसल, हाल ही में दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में राहुल सांकृत्यायन द्वारा एकत्र प्राचीन कलाकृतियों, चित्रों और पांडुलिपियों की प्रदर्शनी आयोजित की गई, जिन्हें वे तिब्बत से लेकर आए थे। यह दुर्लभ धरोहर बीते आठ दशकों से पटना संग्रहालय में पड़ी हुई थी। इन्हें लोगों के सामने प्रदर्शित करने का महत्वपूर्ण कार्य पहली बार हुआ। यह कदम ठिठकन को तोड़ने वाला जरूर है, पर यह आरंभ है, क्योंकि अब राहुल जी के अमूल्य योगदान से परिचित होने से बंद दरवाजे खुलने लगे हैं। इसके बाद इन्हें अपनाने का चरण शुरू होगा, तब जाकर महापंडित का लक्षित उद्देश्य पूरा हो सकेगा। 36 भाषाओं के ज्ञाता राहुल सांकृत्यायन की रचनाओं ने साहित्य जगत को समृद्ध किया, जबकि उनकी यात्राओं ने बौद्ध वाड्मय और हिन्दी साहित्य के बीच की कई धाराओं को जोड़ने की दिशा में अद्भुत योगदान दिया जिसके बारे में लोग अभी तक अनजान हैं। दिल्ली में इस प्रदर्शनी के आयोजन में अहम भूमिका निभाने वाली राधा बनर्जी सरकार कहती हैं, ‘‘2016 में यह विचार आया कि राहुल जी की विभिन्न यात्राओं में इकट्ठी की गई प्राचीन धरोहरों की प्रदर्शनी का आयोजन करना चाहिए, जिससे जन-जन को उनके अभूतपूर्व योगदान का लाभ मिले तथा बौद्ध वाड्मय से संबंधित प्रामाणिक दृष्टिकोण का विकास हो। हम राहुल जी पर अंतरराष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन करते रहे हैं, पर उनकी विभिन्न यात्राओं, खासकर तिब्बत यात्रा के दौरान एकत्रित दुर्लभ थंका (तिब्बती कथा शैली), चित्रों, काष्ठ कलाकृतियों और पांडुलिपियों को दुनिया के सामने कभी प्रस्तुत नहीं किया गया था। करीब डेढ़ साल के अथक प्रयास के बाद पटना संग्रहालय की मदद से हम यह आयोजन करने में सफल हुए हैं।’’
14 से 16 मार्च के दौरान इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में राहुल सांकृत्यायन पर एक गोष्ठी का आयोजन किया गया। उसके बाद 16 मार्च से उनके जीवन के विभिन्न पहलुओं, उनकी पुस्तकों, तिब्बत से लाई गई कलाकृतियों आदि की प्रदर्शनी लगाई गई। इसमें रेशम पर कढ़ाई और चित्रकारी वाली दुर्लभ थंका कलाकृतियां हैं, जिनमें भगवान बुद्ध, बोधिसत्व, सिद्ध, अवलोकितेश्वर जैसे विभिन्न अवतारों और बौद्ध आचार्योें को दर्शाया गया है। एक थंका में 10वीं सदी के विक्रमशिला मठ के प्रधानाचार्य रत्नाकर शांति को दिखाया गया है। इन थंका चित्रों के जरिये तिब्बत के राजाओं और जातक कथाओं का भी चित्रण किया गया है। इनके अतिरिक्त तांबा, पीतल और लकड़ी की दुर्लभ वस्तुओं को भी प्रदर्शित किया गया। साथ ही, विभिन्न तस्वीरों के जरिये राहुल जी की जीवन यात्रा को भी दिखाया गया है। राधा बनर्जी सरकार कहती हैं, ‘‘राहुल सांकृत्यायन द्वारा संग्रहीत थंगका, काष्ठ कलाकृति, पांडुलिपि आदि मौलिक व दुर्लभ हैं जो शायद और कहीं नहीं मिल सकतीं। सात में से पांच दलाई लामा की थंका चित्रकारी भी इसमें मौजूद है।’’
जिद से खोजी खोई विरासत
13वीं शताब्दी में जब नालंदा और विक्रमशिला विश्वविद्यालयों को धराशायी किया गया तो बड़ी संख्या में हिंदू धर्म और बौद्ध मत से जुड़े ग्रंथ नष्ट हो गए। उनमें उस समय की भारतीय संस्कृति का उल्लेख था। राहुल सांकृत्यायन चाहते थे कि इन खोई हुई धरोहरों को यथासंभव वापस हसिल किया जाए। इसी के लिए वे नालंदा और विक्रमशिला के खंडहरों से लेकर श्रीलंका, अफगानिस्तान, बलूचिस्तान, रूस, ईरान, तिब्बत आदि की खाक छानते रहे। उन्होंने अपने अथक प्रयासों से कई दुर्लभ पांडुलिपियों को खोज निकाला, जिनमें प्रमाण, हेतुबिंदु, धर्मोत्तर प्रदीप, जनश्रीमित्र रत्नाकीर्ति, अभिधर्मकोश आदि प्रमुख हैं। पूरे मध्य और पूर्वी एशिया तक बौद्ध धर्म का प्रसार भारत से ही हुआ। भारत और तिब्बत के आध्यात्मिक संबंध करीब हजार साल पुराने हैं और राहुल सांकृत्यायन ने यह तथ्य जाना था कि दोनों क्षेत्रों के लोग मजबूत सांस्कृतिक संबंधों की डोर से बंधे हैं और इसलिए यह संपर्क फिर से स्थापित होना चाहिए। उन्होंने इसी नजरिये से एक तिब्बती-हिंदी शब्दकोश भी तैयार किया। कह सकते हैं कि अगर हिंदू और बौद्ध धर्म के अंतर्संबंधों के मर्म को समझना है तो राहुल सांकृत्यायन का दृष्टिकोण इसमें काफी सहायक हो सकता है।
कण-कण में भारतीयता की खोज
जया सांकृत्यायन पार्थवक
मैं समझती हूं कि राहुल सांकृत्यायन जी ने एक खास दृष्टिकोण के तहत अपनी यात्राओं (खासकर तिब्बत की) के दौरान थंका चित्रों, कलाकृतियों और पांडुलिपियों आदि का संग्रह किया। उनका मानना था कि इन सबमें भारतीय कला-संस्कृति और सभ्यता की धरोहर मौजूद है। इन्हें पंथ से इतर इतिहास, भूगोल, घटनाओं के ऐतिहासिक दस्तावेजों के तौर पर देखने की जरूरत है, जो संस्कृत जैसी प्राचीन भाषाओं में लिखे गए, लेकिन लुप्त हो गए थे। हालांकि ये दस्तावेज तिब्बत के प्राचीन मठों और मंदिरों में अनूदित स्वरूप या ताड़पत्रों पर लिपिबद्ध और सुरक्षित थे। वहां से यह इतिहास दर्शन आया है, जो बहुत विस्तृत है। इसका अध्ययन आवश्यक है, क्योंकि आज लोगों में काफी भ्रम है और लोग अपनी ही संस्कृति को नहीं समझ पा रहे हैं।
हमारा देश प्राचीन सभ्यता की धरती है। सांकृत्यायन जी 36 भाषाओं के ज्ञाता थे, जिनमें कई प्राचीन और लोकभाषाएं शामिल थीं। भारत के विभिन्न क्षेत्रों और विदेशों की यात्राओं के दौरान उन्होंने स्थानीय वातावरण का बारीकी से अध्ययन किया और साहित्य सृजन किया और प्रस्तुति के लिए हिन्दी भाषा को चुना ताकि आमजन तक अपनी बात पहुंचा सकें।
राहुल जी के काम में हिंदू-बौद्ध एकता के सूत्र
राहुल सांकृत्यायन जी द्वारा बौद्ध मत से जुड़ी प्राचीन वस्तुओं का अनमोल संग्रह हमारी अपनी अनमोल विरासत का द्योतक है। बौद्ध वाड्मय किसी खास सीमा में बंधी विरासत नहीं है, बल्कि प्राचीन काल की विभिन्न सांस्कृतिक-धार्मिक धाराओं में पिरोया हुआ दर्शन है, जिससे अपनी भारतीय संस्कृति के बारे में और भी बेहतर जानकारी मिलेगी।
दिल्ली में इसकी प्रदर्शनी लगने से पहले तक ये अनमोल पांडुलिपियां, चित्र, थंका आदि पटना संग्रहालय के स्टोर रूम में पड़े हुए थे, जिन्हें कोई देख नहीं सकता था। यह बेहद शर्मनाक स्थिति थी। राहुल सांकृत्यायन जी के महत्व को समझने वाली विभूतियों और उनके प्रशंसकों के प्रयास से उनके दुर्लभ और मौलिक संग्रह की प्रदर्शनी दिल्ली में आयोजित की जा सकी। यह संग्रह केवल बिहार का नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय धरोहर है जिसे संरक्षित करना राष्ट्र का दायित्व है। मैं राहुल जी की कही एक बात दोहराना चाहूंगी जिससे मुझे हमेशा प्रेरणा मिलती है, ‘‘बड़े की भांति मैंने तुम्हें उपदेश दिया है, वह पार उतरने के लिए है, सिर पर ढोये-ढोये फिरने के लिए नहीं।’’
(लेखिका राहुल सांकृत्यायन की सुपुत्री हैं।)
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