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एशियाई खेल : सपनों से स्वर्णिम शिखर तक

भारतीय खेलों की तस्वीर अब बदल रही है। मैदान पर नई प्रतिभाओं का उभार, महिलाओं का बढ़ता दबदबा और अलग-अलग खेलों में मिल रही ऐतिहासिक सफलताएं इसका साक्ष्य हैं

Published by
विनोद पाठक

एशियाई खेलों में 2014 के आठवें स्थान से 2026 में चौथे स्थान तक भारत का सफर केवल पदकों की संख्या नहीं, बदलती खेल संस्कृति की कहानी है। एथलेटिक्स, निशानेबाजी, तीरंदाजी, मुक्केबाजी, कुश्ती, गोल्फ, हॉकी, क्रिकेट और कबड्डी जैसे विविध खेलों में मजबूत प्रदर्शन इस बदलाव को रेखांकित करता है। जापान के आइची-नागोया में संपन्न एशियाई खेलों में भारत ने 21 स्वर्ण, 27 रजत और 37 कांस्य सहित 85 पदक जीते। हांगझोउ एशियाई खेलों से पदक संख्या कम होने के बावजूद भारत लगातार दूसरी बार चौथे स्थान पर रहा।

1951 के दिल्ली एशियाई खेलों में 15 स्वर्ण सहित 51 पदक जीतकर भारत दूसरे स्थान पर रहा था, लेकिन इसके बाद प्रदर्शन में उतार-चढ़ाव आया। 1982 में 13 स्वर्ण सहित 57 पदकों के साथ भारत पांचवें स्थान पर रहा, जबकि 1990 में केवल एक स्वर्ण सहित 23 पदकों के साथ 11वें स्थान पर खिसक गया। 2002 में 36 और 2006 में 53 पदकों के बावजूद भारत क्रमशः सातवें और आठवें स्थान पर रहा। 2010 में 14 स्वर्ण सहित 65 पदकों के साथ छठा स्थान मिला, लेकिन 2014 में 57 पदकों के साथ भारत फिर आठवें स्थान पर पहुंच गया।

पदकों से बदली तस्वीर

यहीं से आज की उपलब्धि का महत्व समझ आता है। 2014 में 57 पदकों के साथ आठवें स्थान पर रहा भारत 2018 में 70 पदकों के बावजूद आठवें स्थान पर रहा। 2023 के हांगझोउ एशियाई खेलों में 28 स्वर्ण सहित 106 पदक जीतकर पहली बार सौ का आंकड़ा पार किया और चौथे स्थान पर पहुंचा। 2026 में 85 पदकों के साथ चौथा स्थान बरकरार रखना बताता है कि 2023 की सफलता कोई संयोग नहीं, बल्कि भारतीय खेलों में आए स्थायी बदलाव का संकेत है।

44 साल बाद महिला हाॅकी को स्वर्ण

2026 के भारतीय अभियान में महिला हॉकी का स्वर्ण खास उपलब्धि रहा। भारत ने चीन को 1-0 से हराकर 44 साल बाद एशियाई खेलों का स्वर्ण जीता। इससे पहले महिला हॉकी ने 1982 एशियाई खेल में स्वर्ण जीता था। यह सिर्फ एक पदक नहीं, खेल की वापसी थी, जिसे कभी भारत की खेल पहचान माना जाता था।

पुरुष टीम ने मलेशिया को 5-1 से हराकर खिताब बरकरार रखा। इस तरह पहली बार एक ही एशियाई खेल में पुरुष और महिला, दोनों हॉकी टीमों ने स्वर्ण जीते और लॉस एंजिल्स ओलंपिक 2028 के लिए सीधा स्थान हासिल किया। क्रिकेट और कबड्डी में भी पुरुष और महिला, दोनों टीमों ने स्वर्ण जीते। यानी हॉकी, क्रिकेट और कबड्डी के छह स्वर्ण भारत की झोली में आए। यह भारतीय खेलों में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी और प्रतिस्पर्धी क्षमता का भी संकेत है।

इतिहास रचने वाले खिलाड़ी

 तीरंदाजी : 17 वर्षीया कुमकुम अनिल मोहोद व्यक्तिगत रिकर्व स्वर्ण जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनीं। उन्होंने महिला रिकर्व टीम में स्वर्ण और मिश्रित रिकर्व में रजत सहित तीन पदक जीते।
निशानेबाजी : नीरू ढांडा व्यक्तिगत ट्रैप स्पर्धा में एशियाई खेलों का स्वर्ण जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनीं। 28 हिट के साथ उन्होंने रिकॉर्ड बनाया और मिश्रित ट्रैप में भी स्वर्ण जीता।
गोल्फ : प्रणवी उर्स एशियाई खेलों में महिला व्यक्तिगत गोल्फ में स्वर्ण जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनीं।
कुश्ती : अमन सहरावत और सुजीत कलकल ने फ्रीस्टाइल में स्वर्ण जीते। भारत ने पहली बार एक ही एशियाई खेल में दो पुरुष फ्रीस्टाइल स्वर्ण हासिल किए।
मुक्केबाजी: लवलीना बोरगोहेन ने 75 किग्रा में स्वर्ण जीतकर मैरी कॉम के बाद यह उपलब्धि हासिल करने वाली दूसरी भारतीय महिला बनीं।
भारोत्तोलन : मीराबाई चानू के 49 किग्रा रजत ने 28 साल बाद भारत को एशियाई खेलों में भारोत्तोलन पदक दिलाया। 1998 में कर्णम मल्लेश्वरी ने पदक जीता था।
स्क्वैश : अनाहत सिंह महिला एकल के फाइनल में पहुंचने वाली पहली भारतीय बनीं और रजत जीता।
मैराथन : सावन बरवाल के रजत ने इस स्पर्धा में भारत का 44 साल का पदक इंतजार खत्म किया। वह एशियाई खेलों में इस स्पर्धा में पदक जीतने वाले पहले भारतीय बने।
पोल वॉल्ट : बरनिका इलांगोवन ने कांस्य जीतकर इस स्पर्धा में भारत का पहला एशियाई खेल पदक दिलाया।
मिक्स्ड मार्शल आर्ट्स : सुचिका तारियाल ने 60 किग्रा में कांस्य जीतकर एशियाई खेलों में भारत का पहला एमएमए पदक हासिल किया।
सॉफ्ट टेनिस : जय मीणा ने कांस्य जीतकर इस खेल में भारत को पहला एशियाई खेल पदक दिलाया। सॉफ्ट टेनिस को पहली बार एशियाई खेलों में शामिल किया गया था।
रोइंग : सतनाम सिंह और सलमान खान ने डबल स्कल्स में कांस्य जीतकर इस स्पर्धा में भारत को पहला पदक दिलाया।
400 मीटर बाधा दौड़ : वित्या रामराज ने 54.75 सेकंड के राष्ट्रीय रिकॉर्ड के साथ कांस्य जीता और पीटी ऊषा का 42 साल पुराना रिकॉर्ड तोड़ा।

खेलों का बढ़ता दायरा

पहले भारतीय सफलता कुछ पारंपरिक खेलों तक सीमित थी। अब पदक जीतने वाले खेलों का दायरा तेजी से बढ़ा है। यह बदलाव मजबूत और व्यापक खेल आधार का संकेत है। तीरंदाजी में भारत ने नौ पदक जीते। महिला रिकर्व टीम ने पहली बार स्वर्ण जीता और कुमकुम मोहोद ने व्यक्तिगत रिकर्व में भारत को पहला स्वर्ण दिलाया। इस खेल में दक्षिण कोरिया जैसे देशों का दबदबा है, जिसे अब भारत चुनौती दे रहा है। कुश्ती में अमन सहरावत (57 किग्रा) और सुजीत कलकल (65 किग्रा) ने और मुक्केबाजी में लवलीना बोरगोहेन, परवीन हुड्डा और अंकुश पंघाल, जबकि गोल्फ में प्रणवी उर्स महिला व्यक्तिगत स्वर्ण हासिल किया। यह विविधता बताती है कि भारतीय खेल अब कुछ पारंपरिक ताकतों तक सीमित नहीं रहे।

मैदान में बढ़ती महिला शक्ति

भारतीय खेलों में महिलाओं का बढ़ता योगदान सबसे बड़ा बदलाव है। क्रिकेट, हॉकी, कबड्डी, तीरंदाजी, मुक्केबाजी और गोल्फ में उनकी स्वर्णिम उपलब्धियां बताती हैं कि महिला खिलाड़ी अब केवल भागीदारी नहीं, खिताब की दावेदार हैं और दबाव में भी श्रेष्ठ प्रदर्शन कर सकती हैं। यह बदलाव खेल के साथ समाज की बदलती सोच का भी संकेत है। परिवारों में खेल को करियर के रूप में स्वीकार्यता बढ़ी है और छोटे शहरों की बेटियां राष्ट्रीय पहचान बना रही हैं।

यह बदलाव केवल सरकारी योजनाओं तक सीमित नहीं है। इस परिवर्तन के पीछे खेलों के लिए बनी नई व्यवस्था की भी भूमिका है। परिवारों की सोच बदली है और खेल अब करियर के रूप में स्वीकार किए जा रहे हैं। छोटे शहरों और सामान्य पृष्ठभूमि से आने वाली प्रतिभाएं राष्ट्रीय पहचान बना रही हैं। पिछले दशक में खेलो इंडिया और टॉप्स जैसी योजनाओं ने जमीनी स्तर पर प्रतिभाओं की पहचान, प्रशिक्षण और सहायता का दायरा बढ़ाया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी खेलों को केवल पदक नहीं, बल्कि युवाशक्ति और राष्ट्र निर्माण से जोड़ते हुए खिलाड़ी-केंद्रित दृष्टिकोण पर जोर दिया है। परिणामत: तीरंदाजी, मुक्केबाजी, कुश्ती, निशानेबाजी, एथलेटिक्स, बैडमिंटन और गोल्फ जैसे खेलों में देशभर से नई प्रतिभाएं उभर रही हैं।

आगे की चुनौती

आइची-नागोया की उपलब्धि उत्साहजनक है, पर आत्मसंतोष की गुंजाइश नहीं है। 2023 के 106 पदकों की तुलना में 2026 में भारत के पदक 85 और स्वर्ण 28 से घटकर 21 हुए। इसलिए अब उन खेलों की पहचान जरूरी है, जहां संभावनाएं पदकों में नहीं बदल सकीं। प्रतिभा खोजने के साथ उसके दीर्घकालिक विकास, वैज्ञानिक प्रशिक्षण, पोषण, मानसिक तैयारी, चोटों से बचाव, अंतरराष्ट्रीय अनुभव और प्रशिक्षकों की गुणवत्ता पर समान ध्यान देना होगा। चीन, जापान और दक्षिण कोरिया अभी भारत से काफी आगे हैं। 2026 में चीन 169 स्वर्ण सहित 341 पदक जीत कर शीर्ष पर रहा। भारत के लिए अगली चुनौती चौथे स्थान को मजबूत करने के साथ उन खेलों में भी पकड़ बनाना है, जहां उसकी उपस्थिति सीमित है।

प्रधानमंत्री मोदी ने भारतीय खिलाड़ियों के ‘दृढ़ संकल्प, जुनून और उल्लेखनीय खेल भावना’ की सराहना करते हुए उम्मीद जताई कि यह प्रदर्शन जमीनी स्तर पर खेलों को मजबूत करेगा। यही आइची-नागोया की बड़ी सीख है-पदकों से अधिक महत्वपूर्ण वह बढ़ता आत्मविश्वास है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए मजबूत खेल संस्कृति का आधार बनेगा।

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