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लोकतंत्र के नाम पर अराजकता: चिंता संविधान की या 2027 की सत्ता की?

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लक्ष्मीकांता चावला

वर्ष 2026 में समय से कुछ पहले ही 2027 को चुनावों की छाया पड़ गई। वैसे ही जैसे लोग मानते हैं कि सूर्य ग्रहण व चंद्र ग्रहण लगने से चौबीस घंटे पहले ही ग्रहण की छाया पड़ जाती है और लोग कई तरह के परहेज करते हैं। वैसे ही पंजाब और उत्तरप्रदेश की विधानसभा के चुनाव 2027 में है और इसके लिए सभी राजनीतिक दल समय से पहले ही सड़कों पर आ गए। नारा दिया जा रहा है कि वे संविधान की रक्षा कर रहे हैं। यह भी कहा जा रहा है कि लोकतंत्र को बचाने के लिए आंदोलन हो रहे हैं।

कांग्रेस पार्टी अपने सहयोगी दलों के साथ दिल्ली में बड़े स्तर पर प्रदर्शन कर रही है। चुनाव आयोग के विरुद्ध उनकी बहुत शिकायतें हैं और उन शिकायतों का समाधान विपक्षी यही मांग कर रहे हैं कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दें। अब इस्तीफा मांगना ही पक्ष विपक्ष का एक बड़ा शक्तिशाली शस्त्र बन गया है। कुछ महीने पहले भी एक ऐसा ही आंदोलन हुआ।

नई नवेली पार्टी ने नवयुवकों को प्रभाव में लेकर कई दिनों तक दिल्ली में आंदोलन किया। यह ठीक है कि नीट परीक्षा में पेपर लीक होने से अभ्यार्थी परेशान थे। आम लोगों ने भी आंदोलन में हिस्सा लिया। इसमें ऐसे लोग भी थे जिन्हें कोई परीक्षा नहीं देनी थी और पेपर लीक होने न होने से कोई अंतर नहीं पड़ता, बस आंदोलन करना है। उस आंदोलन को शांत करने के लिए यूं कहिए युवा विद्यार्थियों की मांग पूरी करने के लिए केंद्रीय शिक्षा मंत्री श्री धर्मेंद्र प्रधान ने त्यागपत्र भी दे दिया। यह मानो विपक्ष मुख्यत: कांग्रेस ने इसे हर आंदोलन का हथियार बना लिया।

राजनीतिक दलों ने यह सवाल कभी नहीं पूछा

आश्चर्य है कि किसी भी राजनीतिक दल ने सत्ता पक्ष या विपक्ष ने आज तक चुनाव आयोग से यह नहीं पूछा कि जो चुनावों में चुनाव आयोग की तरफ से पूरे देश में एक्सपेंडिचर आब्जर्वर भेजे जाते हैं क्या कभी उन्होंने यह रिपोर्ट किया कि चुनावी जंग में भाग लेने वाले प्रत्याशियों ने उतना ही धन चुनाव में खर्च किया जितना आयोग द्वारा निश्चित किया गया है।

मैंने स्वयं कई बार चुनाव आयोग को लिखकर पूछा कि क्या उन्हें यह विश्वास है कि सारे देश में राजनीतिक दलों के सभी प्रत्याशी निश्चित सीमा में ही खर्च कर रहे हैं। क्या चुनाव आयोग नहीं जानता कि लाखों में नहीं अब करोड़ों में चुनाव लड़े जाते हैं। क्यों खर्च का निरीक्षण करने के लिए भेजे गए आब्जर्वर हर रिपोर्ट को सही मान लेते हैं और चुनाव आयोग भी उसी को स्वीकार कर लेता है। शायद सारे देश में एक दर्जन से भी कम प्रत्याशियों के खर्च विवरण पर कोई आपत्ति आयोग द्वारा की गई है।

लोकतंत्र के नाम पर अराजकता

लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के नाम पर देश में अराजकता सी फैल गई है। सड़कें बंद, रेल मार्ग बंद, धरने, जाम, प्रदर्शन। इसमें पिसता कौन है- आम आदमी। राजनीतिक दलों से लेकर सरकारी कर्मचारियों तक और किसान संगठन भी ज​ब उचित समझते हैं, रास्ते बंद कर देते हैं। घंटों तक रेलगाड़ियां रुकी रहती हैं। क्या यह संविधान की रक्षा है? कानून के अनुसार रास्ता रोकना अपराध है, पर यहां कानून भीड़तंत्र चलाता है लोकतंत्र नहीं, संविधान नहीं, धक्का तंत्र। अगर संविधान और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा सभी नेता करना चाहते हैं तब सबसे पहले यह घोषण कर दें कि रास्ते बंद करके वे कहीं भी कभी भी आम जन के रास्ते को नहीं रोकेंगे। निर्बाध रूप से कार्य व्यवहार चलता रहे, कभी भी ऐसे बंद की घोषणा नहीं की गई, जिससे फुटपाथ पर बैठ कर रोटी कमाने वाला भी अपनी रोटी न कमा पाए। वास्तविकता तो यह है कि इन दिनों चिंता न तो संविधान की है न लोकतंत्र की। लोकतंत्र का प्रतिनिधित्व संसद और विधानसभाओं में करने वाले लोगों के अधिकारों की धज्जियां उड़ा रहे।

चुनाव की है चिंता

यह निश्चित है कि अगर अगले वर्ष चुनाव न हो रहे होते तब किसी भी राजनीतिक दल को लोकतंत्र या संविधान की चिंता नहीं होती। कोई नशों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा करके धरना प्रदर्शन और यात्राएं निकाल रहे हैं। कुछ नेता नशे पर वार करने के लिए मार्च कर रहे हैं। अब पंजाब में बहुत पीछे रह चुका अकाली दल के नेता भी नशों के नाम पर रैलियां निकाल रहे हैं। हैरानी है कि कभी पंजाब को जिनके राज में उड़ता पंजाब कहा जाता था, कभी एक नेता तीस दिनों में नशा बंद करने की घोषणा करके चुनाव जीतकर मुख्यमंत्री भी बन जाता है, पर नशा अपनी गति से बढ़ता रहता है। पंजाब की वर्तमान सरकार यद्यपि नशों के विरुद्ध जोर शोर से काम कर रही है, पर एक प्रश्न यहां है कि पाकिस्तान से ड्रोन लगातार भारत में प्रवेश करके हथियार और हेरोइन जैसे नशे फेंक रहे हैं उनको क्यों नहीं रोका जा रहा। सभी जानते हैं कि आपरेशन सिंदूर में एयर डिफेंस सिस्टम से हमारा देश, हमारी सीमाएं सुरक्षित रहीं।

जनता को क्यों परेशान किया जा रहा है

मुझे तो ऐसा लगता है कि देश में जो अराजकता फैली है, जो आम जन के लिए रास्ते बंद किए जा रहे हैं, वे चुनावी दृष्टि से ही हो रहे हैं। एक और बात उन सबको पूछनी चाहिए जो इन धरना-प्रदर्शनों में हिस्सा ले रहे हैं। दिल्ली में जो सांसद धरने या प्रदर्शन करते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त का त्यागपत्र लेने के नाम पर बड़ा आंदोलन कर रहे हैं वे स्वयं तो सरकारी वेतन टीए-डीए का उपभोग करके बढ़िया पिज्जा बर्गर कनॉट प्लेस पर खाकर राजघाट पहुंच जाते हैं, पर जो जनता उनके पीछे चलती है उनके टीए-डीए का क्या प्रबंध है, यह भी नेताओं को बताना चाहिए। क्या उन्हें भी वैसा ही नाश्ता या दोपहर का भोजन मिलता है और रहने की सुविधा मिलती है जैसी ये नेता प्राप्त कर रहे हैं।

देश की युवा पीढ़ी, अनुभवी वरिष्ठ नागरिक यह समझ लें कि यह चिंता संविधान की नहीं, सन 2027 में सत्ता पाने की है। इसलिए अब लोग बोलें क्योंकि लोकतंत्र में लोक मौन रहेंगे तो फिर यह भीड़ तंत्र, यह नेता तंत्र हावी हो जाएगा, हो रहा है।

 

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