पश्चिम बंगाल के चुनाव में तृणमूल कांग्रेस पार्टी की बुरी हार के बाद अब पार्टी के बगावत के स्वर उठने लगे हैं। परिवारवादी पार्टियां जब पार्टी सत्ता से लम्बे समय तक सत्ता से अलग रहती हैं तो इन दलों में बगावत का स्वर उठने लगता है। चुनाव हारने के बाद से तृणमूल कांग्रेस के कई नेता ममता बनर्जी के खिलाफ लगातार बोल रहे हैं और पार्टी में भी अब आंतरिक कलह लगातार बढ़ती जा रही है।
पार्टी गतिविधियों से दूरी बना रहे टीएमसी नेता
20 मई को पश्चिम बंगाल के विधानसभा परिसर में तृणमूल कांग्रेस विधायकों ने बुलडोजर और चुनाव के बाद हुई हिंसा को लेकर एक विरोध प्रदर्शन किया था, जिसमें तृणमूल कांग्रेस के 80 विधायकों में से सिर्फ 34 विधायक ही शामिल हुए थे। वहीं शेष 46 विधायकों ने इस विरोध प्रदर्शन में हिस्सा ही नहीं लिया। इस प्रदर्शन में मदन मित्रा और विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष विमान बंदोपाध्याय सहित कई बड़े नेता नहीं पहुंचे। ऐसा माना जा रहा है कि ये 46 विधायक अभिषेक बनर्जी के पार्टी नेतृत्व के खिलाफ हैं, उन्हें अभिषेक बनर्जी से बड़ी शिकायत है।
इसी तरह से अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी में भी टूट की घटना हो चुकी है और पार्टी के कुल 10 में से आठ राज्यसभा सांसद पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हो चुके हैं। विदित हो कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस ने आप के पक्ष में और पश्चिम बंगाल विधानसभा के चुनाव में अरविंद केजरीवाल ने ममता बनर्जी के पक्ष में प्रचार किया था। अतएव आप वाली घटना अब तृणमूल कांग्रेस में होती दिख रही है। पाञ्चजन्य पूर्व में ही तृणमूल कांग्रेस पार्टी में अवश्यम्भावी बगावत के बारे में गहराई से विश्लेषण कर चुका है। तृणमूल कांग्रेस पार्टी के कई विधायक और सांसद भाजपा के शामिल होने को आतुर दिख रहे हैं, मगर भाजपा इस प्रकार का कोई भी कदम नहीं उठाना चाहती है। तृममूल कांग्रेस पार्टी के राज्यसभा और लोकसभा सांसदों के साथ ही विधायकों का समूह पाला बदलने के मौका के इंतज़ार में है।
अभिषेक बनर्जी को टीएमसी नेतृत्व देना नेताओं को नहीं आ रहा रास
पार्टी में संभावित टूट का बड़ा कारण यह भी है कि चुनाव परिणाम के बाद ममता बनर्जी ने संकेत दिया था कि तृममूल कांग्रेस का नेतृत्व अब उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी करेंगे। तृणमूल कांग्रेस पार्टी के मुताबिक, विरोध प्रदर्शन में शामिल नहीं होने वाले विधायक अपने क्षेत्रों में चले गए थे इस कारण विरोध प्रदर्शन में भाग नहीं लिया। विदित हो कि 4 मई को भी चुनाव नतीजों के बाद जब पहली बार ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस के नए चुने हुए विधायकों के साथ बैठक बुलाई थी तो उस समय भी 80 में से 70 विधायक ही इस बैठक में पहुंचे थे। 10 विधायकों के साथ शुरू हुआ यह असंतोष अब तक 46 विधायकों को अपने पाले में कर चुका है।
ममता बनर्जी के आरोप आंकड़ों से अलग
तृणमूल कांग्रेस के वर्तमान में 80 विधायक हैं और पार्टी को हटाने के लिए कम से कम 54 विधायकों की आवश्यकता पड़ेगी। विधायकों के टूट को रोकने के लिए चुनाव नतीजों के बाद से ममता बनर्जी लगातार कह रही हैं कि वह हारी नहीं हैं, बल्कि उन्हें हराया गया है और जनता का तो उन्हें आज भी पूर्व की तरह ही जनसमर्थन प्राप्त है। मगर चुनाव आयोग द्वारा ममता बनर्जी की विधासभा क्षेत्र भबानीपुर में मतदान को लेकर जो जारी किये गए आंकड़े का विश्लेषण करें तो पाते हैं कि उनके खिलाफ उनके अपने ही क्षेत्र में लोगों में काफी नाराज़गी थी।
भबानीपुर सीट पर ममता वर्तमान मुख्यमंत्री बनर्जी सुवेंदु अधिकारी से चुनाव हारी हैं। ममता बनर्जी देश की पहली मुख्यमंत्री हैं जो लगातार दो बार एक ही व्यक्ति से दो अलग-अलग सीटों पर चुनाव हारी हैं। भवानीपुर ममता बनर्जी का अपना राजनीतिक गढ़ रहा है और वो पहले भी तीन बार इस सीट से चुनाव जीत चुकी हैं। इसके बावजूद भी शुभेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी के इस राजनीतिक गढ़ में घुसकर उनके खिलाफ चुनाव लड़कर बड़ी और करारी मात दी। ममता बनर्जी ने तीन बार विधानसभा में प्रतिनिधित्व किया और तीनों बार भबानीपुर से ही किया। वहीं 2021 में नंदीग्राम में शुभेंदु अधिकारी से ही चुनाव हार गई थीं।
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ममता का इस्लामिक तुष्टिकरण उन पर भारी पड़ा
भबानीपुर विधानसभा सीट का केन्द्रवार विश्लेषण करें तो पाते हैं कि ममता बनर्जी की मुस्लिम तुस्टीकरण की नीति ने उन्हें आमजन में कितना अलोकप्रिय बना दिया था। भबानीपुर में कुल 267 मतदान केन्द्रों में 207 केन्द्रों पर शुभेंदु अधिकारी को ममता बनर्जी से अधिक मत मिला। 267 मतदान केन्द्रों में से 68 ऐसे हैं, जहां ममता बनर्जी को 100 से भी कम वोट मिला है। 27 मतदान केन्द्रों पर तो ममता बनर्जी को 50 से भी कम मत मिला। मतदान केंद्र 227 पर ममता बनर्जी को महज 12 मत, मतदान केंद्र 29 पर 14 मत और 231 पर उन्हें सिर्फ 15 मत मिला।
शुभेंदु अधिकारी को केवल मुस्लिम बहुल इलाकों में मत नहीं मिला
लेकिन उल्लेखनीय है कि जिन मतदान केंद्रों पर शुभेंदु अधिकारी को कम मत मिला है वो सारे मुस्लिम बाहुल्य मतदान केंद्र थे। मुस्लिम मतदाताओं ने शुभेंदु अधिकारी को मत नहीं के बराबर किया। ऐसा अनुमान मतदान केन्द्रवार विश्लेषण से पता चलता है। इसका दूसरा निहितार्थ यह भी है कि भबानीपुर विधानसभा क्षेत्र के हिन्दू मतदाताओं ने एकजुट होकर ममता बनर्जी के खिलाफ भाजपा के पक्ष में मतदान किया। ममता बनर्जी का मतदाता वर्ग अब केवल मुस्लिम वर्ग तक ही सिमट कर रह गया है। भाजपा के पक्ष में हिन्दू मतदाता लामबंद हो रहे हैं। हिन्दू मतदाताओं ने मिलकर ममता बनर्जी को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया है। ऐसी ही स्थिति 2027 में उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव की भी होती दिख रही है। मगर ममता बनर्जी से सिख लेते हुए अखिलेश यादव अपने को विधानसभा के चुनाव में उम्मीदवारी नहीं करेंगे।

















