छत्तीसगढ़ के रायपुर से सामने आया यह मामला उस गहरे संकट का संकेत है, जहां अंधविश्वास का फायदा उठाकर इलाज के नाम पर ईसाई धर्मांतरण (कन्वर्जन) किया जा रहा है। 18 वर्षीय योगिता सोनवानी की मौत ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि तमाम कानून होने के बाद भी क्या समाज के भोले-भाले लोगों को “चमत्कार” के नाम पर ऐसे ही जाल में फंसाकर कन्वर्जन कराया जाता रहेगा, जो कि कई मामलों में अंततः जानलेवा साबित होगा?
दरअसल, मामले की गहन छानबीन में सामने आ सका है कि कथित चर्च कन्वर्जन के लिए कई पैंतरे अपना रहा है, ताजा प्रकरण में छग के गरियाबंद जिले के सुरसाबांधा गांव में रहने वाली आरोपी महिला ईश्वरी साहू ने खुद को एक ऐसी “चिकित्सक” के रूप में स्थापित कर रखा था, जो बिना दवाइयों के मानसिक रोगों का इलाज कर सकती है। योगिता, जोकि पहले से मानसिक बीमारी से जूझ रही थी और जिसका इलाज रायपुर व महासमुंद के अस्पतालों में चल रहा था, उसे परिवार इसी उम्मीद में वहां ले गया कि शायद यहां कोई चमत्कार हो जाए, लेकिन जो हुआ, वह चिकित्सा नहीं बल्कि अमानवीय अत्याचार था। युवती के शरीर पर गर्म पानी और कथित ‘चमत्कारी तेल’ ईशू की कृपा और चमत्कार के नाम पर डाला जाता था, आरोपी उसके शरीर पर चढ़कर पैरों से दबाव बनाती थी और लगातार ईशू की प्रार्थना करवाती थी। पर इसका परिणाम ये हुआ कि योगिता की हालत लगातार बिगड़ती चली गई।
पोस्टमार्टम ने उजागर किया सच
इसके बाद जब 22 मई 2025 को योगिता की मौत हुई, तब यह मामला एक गंभीर अपराध के रूप में सामने आया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने उन भयावह तथ्यों को उजागर किया, जिन्हें सुनकर किसी का भी दिल दहल जाए। युवती की पसलियां टूटी हुई थीं, फेफड़ों में खून जमा था और अंदरूनी चोटें इतनी गंभीर थीं कि सांस रुकने से उसकी मौत हो गई। डॉक्टरों ने स्पष्ट कर दिया कि यह प्राकृतिक मौत नहीं, बल्कि हिंसक कृत्य का परिणाम थी। यानी जिस “ईशू इलाज” में चमत्कारी तेल मालिश पर भरोसा किया गया तथा शारीरिक रूप से जो क्रूर तरीका ईशू की प्रार्थना के नाम पर अपनाया गया वही उसकी मौत का कारण बन गया।
कन्वर्जन का दबाव: आस्था के नाम पर प्रभाव
इस पूरे मामले का एक और गंभीर पहलू अदालत में सामने आया कि कथित धर्मांतरण (कन्वर्जन) का दबाव भी बनाया गया था। गवाहों और पीड़िता की मां के बयान के अनुसार, आरोपी महिला ईश्वरी साहू लगातार यह कहती थी कि “ईशु मसीह पर भरोसा रखो, वही ठीक करेंगे।” इतना ही नहीं, वह यह भी कहती थी कि ठीक होने के बाद उन्हें धर्म बदलना होगा। परिवार को यह कहकर डराया गया कि अगर उन्होंने किसी को कुछ बताया, तो “प्रभु ईशू नाराज हो जाएंगे।” इस तरह इलाज के नाम पर न सिर्फ शारीरिक, बल्कि मानसिक और धार्मिक दबाव भी बनाया गया, जिसने परिवार को भय और भ्रम के घेरे में कैद कर दिया।
डर और अंधविश्वास का जाल
यह घटना दिखाती है कि कैसे बीमारी और असहायता का फायदा उठाकर लोगों को ईशू प्रार्थना के नाम पर अंधविश्वास के जाल में फंसाया जाता है। किसी की कोई भी कमजोरी को हथियार बना लिया जाता है और फिर जिनका कन्वर्जन करना है, अपने प्रभाव में लेकर धीरे-धीरे उन्हें बाहरी दुनिया से अलग कर दिया जाता है और डर के वातावरण में रखा जाता है। जहां सवाल पूछने की भी गुंजाइश नहीं होती। यही वह मनोवैज्ञानिक जाल है, जो ऐसे मामलों को और खतरनाक बना देता है।
अदालत का कड़ा रुख
रायपुर की विशेष एससी-एसटी अदालत ने इस मामले में सख्त रुख अपनाते हुए न्यायाधीश पंकज कुमार सिन्हा ने आरोपी महिला ईश्वरी साहू को 18 वर्षीय युवती योगिता सोनवानी की हत्या का दोषी पाया है और आरोपी ईश्वरी साहू को दोषी ठहराते हुए उसे उम्रकैद की सजा सुनाई है। इसके साथ ही धर्म स्वतंत्रता कानून, टोनही प्रताड़ना अधिनियम और एससी-एसटी एक्ट के तहत भी सजा दी गई तथा 02 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया है। न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि आरोपी ने बिना किसी चिकित्सकीय योग्यता के इलाज का दावा किया और अंधविश्वास व धार्मिक प्रभाव का इस्तेमाल कर परिवार को गुमराह भी किया, इसलिए कड़ी से कड़ी सजा देना अनिवार्य है।
अमेरिकी नागरिकों को छोड़ना होगा देश
महाराष्ट्र की पुणे पुलिस ने पर्यटन वीजा नियमों का उल्लंघन करने के आरोप में तीन अमेरिकी नागरिकों को तुरंत भारत छोड़ने का आदेश जारी किया है। इनको ‘लीव इंडिया नोटिस’ थमाया गया है, जिसके तहत उन्हें 10 मई 2026 तक देश छोड़ना होगा।
जांच के अनुसार, ये तीनों विदेशी नागरिक अप्रैल के मध्य में पर्यटन वीजा पर भारत आए थे। नियमों के अनुसार, पर्यटन वीजा पर आए व्यक्ति को ऐसी किसी भी गतिविधि में शामिल होने की अनुमति नहीं होती है। पुलिस को सूचना मिली थी कि ये व्यक्ति पुणे के शुक्रवार पेठ और आसपास के इलाकों में घूम-घूमकर ईसाई मत से संबंधित प्रचार सामग्री और पर्चे बांट रहे थे। पुणे पुलिस के विदेशी नागरिक पंजीकरण कार्यालय (FRO) ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए कार्रवाई की। पुलिस अब इस बात की भी पड़ताल कर रही है कि क्या इन नागरिकों को किसी स्थानीय संस्था या व्यक्ति द्वारा इस काम के लिए सहायता प्रदान की जा रही थी।
कानून की सख्ती और उसका संदेश
उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ में भी हाल ही में धर्म स्वतंत्रता से जुड़े कानून को और कड़ा किया गया है, जिसमें जबरन या लालच देकर धर्म परिवर्तन कराने पर कठोर सजा का प्रावधान है। विशेष रूप से महिलाओं, नाबालिगों और अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग के मामलों में सजा और अधिक सख्त कर दी गई है। यह स्पष्ट संकेत है कि सरकारें इस तरह की गतिविधियों को गंभीरता से ले रही हैं और उन्हें रोकने के लिए ठोस कदम उठा रही हैं।
भारत में कन्वर्जन का व्यापक प्रश्न
रायपुर की यह घटना एक बड़े राष्ट्रीय मुद्दे की ओर भी इशारा करती है। भारत जैसे विविधतापूर्ण समाज में धर्मांतरण का प्रश्न लंबे समय से संवेदनशील रहा है। खासतौर पर जब यह आरोप लगते हैं कि कमजोर, बीमार या आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को “इलाज”, “चमत्कार” या “मदद” के नाम पर प्रभावित किया जाता है, तब यह चिंता और गहरी हो जाती है। यही कारण है कि कई राज्यों ने धर्म स्वतंत्रता से जुड़े कानूनों को सख्त किया है, ताकि बल, प्रलोभन या धोखे के जरिए होने वाले धर्म परिवर्तन पर रोक लगाई जा सके।
वैसे सबसे पहले स्वतंत्र भारत में अविभाजित मध्यप्रदेश में छत्तीसगढ़ से ही सबसे पहले इसके विरोध की आवाज भी उठी थी और राज्य में तत्कालीन सरकार ने नियोगी कमीशन बैठाया था, पर दुखद है कि राज्य दो भागों में विभाजित हो गया, लेकिन नियोगी कमीशन की ईसाई कन्वर्जन पर आई रिपोर्ट अब भी किसी कौने में धूल खा रही है। वहीं, ईसाई मिशनरी (चर्च) कहीं सेवा के नाम पर, कहीं चमत्कार के नाम पर, कहीं लालच देकर, कहीं गरीबी का फायदा उठाकर तो कहीं नौकरी एवं अच्छी जीवन शैली का वादा करके भोले-भाले लोगों को अब भी अपने कन्वर्जन के काम में तेजी से लगा हुआ सभी ओर दिखता है!

















