‘हमारी परंपराओं का मुख्य ध्येय वैज्ञानिक प्रणाली और नवाचार के बीच संतुलन बनाए रखना है’- दत्तात्रेय होसबाले
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होम संघ @100

‘हमारी परंपराओं का मुख्य ध्येय वैज्ञानिक प्रणाली और नवाचार के बीच संतुलन बनाए रखना है’- दत्तात्रेय होसबाले

गत 17 अप्रैल को अमेरिका स्थित सिलिकॉन वैली में ‘ग्लोबल साइंस इनोवेशन फोरम’ के ‘थ्राइव-2026 समिट’ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले ने वैज्ञानिक उन्नति के संबंध में एक प्रखर दृष्टिकोण सामने रखा।

Written byPanchjanyaPanchjanya
Apr 27, 2026, 02:17 pm IST
inसंघ @100, साक्षात्कार
सम्मेलन में बातचीत करते श्री दत्तात्रेय होसबाले (मध्य में )

सम्मेलन में बातचीत करते श्री दत्तात्रेय होसबाले (मध्य में )

गत 17 अप्रैल को अमेरिका स्थित सिलिकॉन वैली में ‘ग्लोबल साइंस इनोवेशन फोरम’ के ‘थ्राइव-2026 समिट’ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले ने वैज्ञानिक उन्नति के संबंध में एक प्रखर दृष्टिकोण सामने रखा। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा को पुनर्स्थापित करने की बात की और इस बात पर बल दिया कि वास्तव में, तकनीकी नवाचार-‘इकॉनामी’, ‘इकोलॉजी’ और ‘एथिक्स’ पर आधारित होना चाहिए। प्रस्तुत हैं प्रमुख अंश-

अपनी परंपरा में वैज्ञानिक और तकनीकी शोध की मौलिकता के बारे में क्या कहेंगे?
हमारी परंपरा में ज्ञान की मौलिकता स्थूल और सूक्ष्म, दोनों स्तर पर रही है, जो बुद्धि और तर्क पर आधारित है और जो मानवीय ज्ञान की सीमाओं से परे है। हमारी ज्ञान परंपरा में ‘आध्यात्मिक’ और ‘लौकिक’ के बीच कभी कोई भेद नहीं रहा है। हमारे यहां जिसे ‘आध्यात्मिक’ ज्ञान कहा जाता है, उसमें वह भी शामिल है, जिसे आज ‘वैज्ञानिक ज्ञान’ समझा जाता है।
इसके कई उदाहरण हैं। हमारे कई सूत्र (ग्रंथ) ऐसे हैं, जिनमें मानव शरीर विज्ञान, मस्तिष्क विज्ञान, मानवीय शरीर की कार्यप्रणाली, उसकी क्रियाशीलता और निष्क्रियता, शरीर काम क्यों करता या नहीं करता है आदि पर विस्तार से बताया गया है। फिर भी उन्हें आध्यात्मिक ग्रंथ माना जाता है। वास्तव में, ये वैज्ञानिक हैं।
सुदीर्घ इतिहास में, विशेषतौर पर सतत आक्रमणों और विदेशी शासन के कारण, इनमें से कई परंपराएं बिखर गईं या बर्बाद कर दी गईं। उस संकटकाल के दौरान हमें हमारी वैज्ञानिक विरासत में से अधिकांश को भुलाने को बाध्य किया गया। लेकिन अब, हम एक ऐसे दौर में हैं जहां उस ज्ञान को फिर से जाग्रत करने का पुन: प्रयास किया जा रहा है। नई सरकार ने ऐसी शिक्षा नीति अपनाई है, जिसके अंतर्गत भारतीय ज्ञान परंपरा को फिर से सामने लाया जा रहा है।
लगभग एक हजार साल के संघर्ष और विदेशी प्रभाव के कारण, इस ज्ञान के एक बहुत बड़े अंश को दरकिनार कर दिया गया। आज हमारे सामने महत्वपूर्ण लक्ष्य है कि हमारे सभ्यतागत इतिहास में विद्यमान उस वैज्ञानिक परंपरा का पुनरशोधन कर उसे पुनर्स्थापित किया जाए।

हमारी परंपरा ब्रह्माण्डीय अनुसंधान से पूर्ण रही है। हमेशा से ब्रह्माण्ड और अंतरिक्ष आकर्षण के स्रोत रहे हैं। हमारे सभी
ग्रंथों में संवाद और तर्क मौजूद हैं। हमारे प्राचीन वैज्ञानिक और तकनीकी ग्रंथों में भौतिक संसार के रूप में ‘माइक्रोकॉस्म’ और ‘मैक्रोकॉस्म’ यानी सूक्ष्म जगत और संपूर्ण ब्रह्माण्ड के संबंध में निरंतर चर्चा होती रही है।
भारत में हजारों साल पहले खेती-किसानी की बहुत विकसित प्रणाली प्रचलित थी। नगर योजना उत्कृष्ट स्तर की थी। इसके अंतर्गत विश्वविद्यालयों का निर्माण करवाया गया था। सिविल इंजीनियरिंग के क्षेत्र में भारत अग्रणी था। ये सभी भौतिक विज्ञान की गहरी समझ को दिखाते हैं जो कभी दोहन करने वाली नहीं रही। भारतीय ज्ञान परंपरा में प्रकृति को समझना, उसका उचित विश्लेषण करना, उसका समुचित उपयोग करना और साथ ही, उसे सुरक्षित रखने की सोच रही है। हमारी परंपराओं का मुख्य ध्येय वैज्ञानिक प्रणाली और नवाचार के बीच संतुलन बनाए रखना है।

तकनीक प्रतियोगिता और पूंजी से चलने वाले जगत में नैतिकता का क्या? क्या ऐसे जगत में यह अपना प्रभाव जमा सकती है?
इस सवाल के दो महत्वपूर्ण पहलू हैं। पहला-शिक्षा की भूमिका। हमारे समाज में विज्ञान की पढ़ाई को प्राथमिकता दी गई, लेकिन साथ ही, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और आध्यात्मिकता के बीच कोई भेद नहीं रहा। हमारी ज्ञान परंपरा में ये दो चीजें अलग-अलग नहीं हैं। अक्सर, दुनिया के कई हिस्सों में पंथ और विज्ञान को एक-दूसरे से अलग करके देखा जाता रहा है, लेकिन हमारी परंपरा में, दोनों को साथ जोड़ा गया है। कई लोग और समूह वैज्ञानिक खोज के साथ-साथ गहरी आध्यात्मिक साधना में भी लगे रहे हैं। कालांतर में यह सभ्यता की ‘ज्ञान परंपरा’ का अंग बन गई। इस मिले-जुले तरीके से एक ऐसी नींव रखी गई, जिसमें न केवल नैतिक प्रश्नों को बल्कि सुरक्षा, रोजगार और दैनिक जीवन के व्यावहारिक पहलुओं को भी जोड़ा गया। हमारे वैज्ञानिक शोध अमूर्त नहीं थे, ये सामाजिक आवश्यकताओं से जुड़े थे। हमें सशक्त बनाए रखने के लिए ऐसा ज्ञान आवश्यक रहा है।

दूसरा पहलू है कि अगर शिक्षा तकनीक की गति से आगे न बढ़े, तो समाज में असमानता बढ़ सकती है। जब विज्ञान और तकनीक का विकास होता है और सामाजिक एवं शैक्षणिक प्रणाली पीछे रह जाती है, तब भी असमानता बढ़ती है। आर्थिक विकास, शिक्षा और जीवन की गुणवत्ता, ये सभी आयाम आपस में जुड़े हुए हैं। इसलिए, आज प्रशासन को इस संतुलन पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। एक ओर हमें सामाजिक असमानता और भेदभाव को दूर करना होगा, तो दूसरी ओर हमें यह प्रयास करना होगा कि वैज्ञानिक प्रगति भी जारी रहे। ये दोनों ही आवश्यक हैं। हालांकि, आज शैक्षणिक प्रणाली के सामने एक चुनौती है। अगर लोग हमारे पारंपरिक ज्ञान के वैज्ञानिक पहलुओं को ठीक से सामने न रखें तो इन्हें अंधविश्वास कहकर नकारा जा सकता है। इस स्थिति में यह स्पष्ट तौर पर समझना जरूरी है कि क्या वैज्ञानिक है और क्या अवैज्ञानिक। यह एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। हमारे समाज के समक्ष उस ज्ञान परंपरा को संभालने की चुनौती भी है, ताकि उस ज्ञान को भविष्य की पीढ़ी को सौंपकर उसकी निरंतरता को बनाए रखा जा सके।

आम लोगों को, समाज को तकनीक और उसके सही इस्तेमाल के बारे में किस प्रकार से विचार करना चाहिए?
जहां तक मानवीयता और उसके नजरिए का सवाल है,
हमारी परंपरा में एक मूल विचार यह है कि हम सबकी ऊर्जा का एक ही स्रोत है। जब तक यह समझ लोगों के मन में गहराई से नहीं पैठ जाती, तब तक आप एक-दूसरे से आगे निकलने की कोशिश या विचारों का प्रभाव देखते हैं। ऐसी सोच एकात्म की भावना को पनपने नहीं देती है।
अगर प्रकृति को मानवीय आवश्यकताओं और इच्छा की पूर्ति का माध्यम समझा जाता है, तो उसका दोहन-शोषण शुरू हो जाता है। जब हम प्रकृति को ‘दासी’ समझते हैं, जो सिर्फ हमारी जरूरतों को पूरा करने के लिए है, तो हम प्रकृति को असंतुलित कर देते हैं। लेकिन अगर हम यह समझ लें कि ऊर्जा का एक ही स्रोत है, वह हम सभी में-हर इंसान में, पशु, पौधों, पूरी प्रकृति में-विद्यमान है, तो एक अलग नजरिया सामने आता है।हिंदू परंपरा में, यह विचार सबसे विशिष्ट है। हमारे यहां कहा गया है, हर जीव का सम्मान करो, क्योंकि जो शक्ति मुझमें है, वही सब जीवों में है। दुनियाभर में एक होने का यह विचार तय करता है कि हम दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं। यह सिर्फ इंसानों के बीच ही नहीं, बल्कि पूरे पर्यावरण के प्रति सम्मान, विनम्रता और मेलजोल को बढ़ावा देता है। हम प्रकृति से अलग नहीं हैं। हम उसके अंश हैं। इस समझ से हमें अपने काम करने चाहिए, जिसमें यह भी शामिल है कि हम तकनीक को कैसे विकसित और इस्तेमाल करते हैं।

तकनीक अपने आप में लाभदायक है या हानिकारक, इसे कैसे परखा जाए?
तकनीक को, अन्य किसी भी उपकरण की तरह, ध्यान से जांचना-परखना चाहिए। हमारी समझ में, इसे तीन महत्वपूर्ण कसौटियों पर खरा उतरना चाहिए। पहला, इकॉनामी यानी आर्थिक कसौटी। क्या तकनीक संतुलित विकास में मदद करती है? या यह समाज में असमानता पैदा करती है? तकनीक को कसने की दूसरी कसौटी है-इकोलॉजी यानी पर्यावरण। क्या तकनीक प्रकृति का सम्मान करती है? या यह प्रकृति के शोषण और असंतुलन को बढ़ा रही है? तीसरी कसौटी है-एथिक्स या नैतिक पक्ष। क्या तकनीक नैतिक रूप से
सही है? क्या यह उन मानवीय हित के मूल्यों को कायम रखने में सहायक है?
अगर कोई तकनीक असमानता पैदा करके अर्थव्यवस्था को बिगाड़ती है, या यह प्रकृति का शोषण करके पर्यावरण संतुलन को नुकसान पहुंचाती है, या इसमें नैतिक आधार की कमी है तो यह समझ जाना चाहिए कि यह समस्या बन रही है। इसलिए किसी भी तकनीक को उक्त तीन कसौटियों पर परखा जाना चाहिए। तकनीक का उद्देश्य हमेशा मानवीय हित होना चाहिए। तकनीक से समाज या प्रकृति को बिना हानि पहुंचाए हमारा जीवन बेहतर बनना चाहिए। ऐसी तकनीक ही श्रेयस्कर है।

आपकी परंपरा में ज्ञान और समझ में क्या अंतर है?
हमारी परंपरा में, ज्ञान और समझ में स्पष्ट अंतर है। जिसे हम ज्ञान कहते हैं, वह चीजों की समझ या जागरूकता है। यह जानकारी और सीखने का मेल है। लेकिन, सहज बुद्धि या प्रज्ञान कहते हैं, उस उपलब्ध ‘ज्ञान’ का सही प्रयोग करने की क्षमता है। यह इस बात का विवेक है कि ‘ज्ञान’ का कितना इस्तेमाल करना है, कहां इस्तेमाल करना है और किस उद्देश्य के लिए करना है।
केवल ‘ज्ञान’ पर्याप्त नहीं है। ‘ज्ञान’ या ‘बुद्धि’ यदि विवेक से दिशा प्राप्त नहीं करती है, तो यह अहंकार और दंभ की ओर ले जा सकती है। ऐसे में ज्ञान का गलत इस्तेमाल किया जा सकता है। हमारी परंपरा में बहुत सारे ग्रंथ हैं, जो इस अंतर को समझने पर बल देते हैं। ज्ञान के साथ हमेशा विवेक होना चाहिए। तभी यह उद्देश्यपूर्ण और लाभप्रद होता है। जब ‘ज्ञान’ विज्ञान से प्रेरित होता है, तो यह न केवल व्यक्ति विशेष के लिए बल्कि, समाज और पूरी मानवता के लिए सुखद होता है।

ज्ञान का लोकतंत्रीकरण या जन-जन तक पहुंचना कितना आवश्यक है?
‘ज्ञान’ का लोकतंत्रीकरण आवश्यक है। आज, ज्ञान का भंडार है, लेकिन यह हमेशा सरलता से प्रवाहित नहीं होता। ऐसी परिस्थिति बनाने की जरूरत है जहां ज्ञान वर्ग विशेष, समाज, देश और सभ्यताओं में आसानी से उपलब्ध हो सके। यह सभी के लिए उपलब्ध होना चाहिए, ताकि सभी को समान अवसर मिले। साथ ही, हमें ज्ञान पर एकाधिकार को लेकर भी सावधान रहना चाहिए, जिसमें इसकी पहुंच सीमित हो। कुछ परंपराएं अंधविश्वास से भरी हैं, इसे असली ज्ञान से अलग करना होगा। ज्ञान पर किसी एक समूह का एकाधिकार नहीं होना चाहिए। यह सभी के लिए उपलब्ध होना चाहिए। जब ज्ञान का लोकतंत्रीकरण होगा तो लोग मजबूत बनेंगे। समाज मजबूत बनेगा। समाज अधिक संतुलित और समान स्तर से आगे बढ़ेगा। ज्ञान तक यह समान पहुंच यह संभव करती है कि वैज्ञानिक खोज और तकनीक का लाभ सभी तक पहुंचे, न कि सिर्फ कुछ लोगों तक।

अंतिम टिप्पणी

‘अहंकार’ का अर्थ एक वर्ग विशेष, देश या समाज का ही स्वयं को दूसरों से ऊपर रखना नहीं है। जब इंसान स्वयं को प्रकृति और सृष्टिकर्ता से ऊपर समझता है और विनम्रता रहित होकर काम करता है, तो यह भी एक तरह का ‘अहंकार’ है।

 

Topics: भारतीय ज्ञान परंपराआरएसएस न्यूजसंघ शताब्दी वर्षआरएसएस सरकार्यवाहविज्ञान और तकनीकपर्यावरण अनुकूल तकनीकदत्तात्रेय होसबाले
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