POJK में 1947 के जिहादी नरसंहार: लाखों हिंदू-सिख विस्थापित, हजारों मारे गए
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POJK में 1947 के जिहादी नरसंहार: लाखों हिंदू-सिख विस्थापित, हजारों मारे गए

22 फरवरी 1994 को भारतीय संसद ने एकमत से पारित संकल्प: जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग। 1947 में POJK में मुजफ्फराबाद, मीरपुर, बारामूला नरसंहार में हजारों हिंदू-सिख मारे गए, लाखों विस्थापित।

Written byराकेश सैनराकेश सैन — edited by कुलदीप सिंह
Feb 23, 2026, 01:53 pm IST
in विश्लेषण, पंजाब
1947 Jihadi Massacre

प्रतीकात्मक तस्वीर

भारतीय संसद ने 1994 को आज ही के दिन एकमत से संकल्प पारित किया था कि जम्मू-कश्मीर-राज्य भारत का अविभाज्य अंग रहा है और रहेगा तथा शेष भारत से पृथक करने के किसी भी प्रयास का सभी आवश्यक साधनों से विरोध किया जाएगा। उसी एतिहासिक संकल्प को स्मरण करने, दोहराने का दिन हमें याद दिलवाता है कि जम्मू-कश्मीर में भारत ने केवल जमीन ही नहीं बल्कि भारी संख्या में जनधन की भी हानि उठानी पड़ी थी। केवल इतना ही नहीं लाखों हिन्दू-सिखों को अपने ही देश में विस्थापित हो अपने ही देश में शरणार्थियों का जीवन जीने को विवश होना पड़ा। जिहादी मानसिकता वाली पाकिस्तानी सेना, कबाइलियों व घर में छिपे बैठे जिहादी गद्दारों ने खुल कर हिन्दू-सिखों के खून से होली खेली थी।

हिन्दू-सिखों का संघर्ष

पाकिस्तान के आक्रमण से इन क्षेत्रों के रहने वाले हिन्दू-सिख परिवारों को वहां से पलायन करना पड़ा। वर्तमान में इन विस्थापन के दर्द को सह रहे लोगों की संख्या 12 लाख से अधिक है, केवल जम्मू क्षेत्र में इनकी संख्या 10 लाख से अधिक है। इनमें से अधिकांश के लिए यह यह दुबारा पलायन था, क्योकि जब पाकिस्तान बन रहा था तब पंजाब के हिन्दू और सिख जम्मू-कश्मीर के मीरपुर, कोटली आदि निकट के स्थानों पर आ गये थे क्योंकि जम्मू-कश्मीर का भारत में अधिमिलन हो चुका था। यह पीओजेके विस्थापित समुदाय में भी दो तरह के लोग है एक तरह के लोग है जो जम्मू कश्मीर में रहते हैं और दूसरा समुदाय जम्मू कश्मीर से बाहर बंगलौर, कानपुर, पुणे, धर्मशाला, मंगलौर, मुंबई आदि 70 से ज्यादा शहरों के अन्य भागों में रहते हैं।

इनकी परिवारों की संख्या 8,793 के करीब है। जम्मू-कश्मीर से बाहर रहने वाले तीन या चार पीढ़ियों को पीओजेके विस्थापितों को स्थानीय सरकारों ने बहुत प्रताड़ित किया है। तमाम मूलभूत अधिकारों से वंचित कर दिया गया था। यह समुदाय जम्मू-कश्मीर विषय के सबसे ज्यादा पीडि़त और बड़े एवं जम्मू कश्मीर के सबसे पहले स्टेकहोल्डर्स है। ये लोग पूरे विश्व में जम्मू कश्मीर के विषय को आगे लेकर जाने में सहायक है। दिल्ली में स्थित मीरपुर बलिदान भवन विभाजन से उत्पन्न इसी मानव विस्थापन व संहार का प्रतीक है।

मुजफ्फराबाद नरसंहार

मुजफ्फराबाद पाकिस्तान की सीमा से सटा 2408 वर्ग सील क्षेत्र में फैला बड़ा जिला था। यहां हिंदू व सिख अल्पसंख्या में थे। 22 अक्टूबर 1947 गढ़ी-हबीबुल्लाह से बॉर्डर पार कर पाकिस्तान में 22 अक्टूबर को मुजफ्फराबाद पर हमला किया। इसके बाद हमलावरों ने मुजफ्फराबाद जिले के रानुबहिका, मीटपरमाचा रामकोट, जानकीमीरा, चक्कर, कसाला, चिकोठी, अरोसा, गोआतला, दर्दकोट, कैथी समेत कुल 20 गांवों में नरसंहार किया। जिसके बाद 23 से 26 अक्टूबर के बीच मुजफ्फराबाद शहर समेत आस-पास के तमाम गावों में हजारों हिंदू-सिखों की नृशंसहत्या कर दी गयी। इस नरसंहार और पलायन के कारण मुजफ़्फ़राबाद और आसपास के क्षेत्रों में अनुमानत: 4,500 से 5,000 हिंदू और सिख मारे गए। 1,600 से अधिक महिलाएं और लड़कियां अगवा कर ली गईं। इस भयानक घटना के परिणामस्वरूप, मुजफ्फराबाद में हिंदू-सिखों की लगभग पूरी आबादी समाप्त हो गई। विभाजन से पहले जो समुदाय यहाँ जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा था। वह इस नरसंहार के बाद लगभग शून्य हो गया।

बारामूला नरसंहार

पाकिस्तान ने ऑपरेशन गुलमर्ग तहत 25 अक्टूबर 1947 को बारामुला पर कब्ज़ा कर लिया। वहाँ ये कई दिनों तक रहे और आगजनी, लूटपाट, तोडफोड़, बलात्कार और हत्याएं बिना किसी रोक टोक के करते रहे। इन आक्रमणकारियों ने मार्ग में कई स्थानों पर महिलाओं का बलात्कार, लोगों की हत्यायें, पूजा स्थलों में तोडफ़ोड़ और लूटपाट कर उन पवित्र स्थलों को जान बूझकर दूषित करने का जघन्य कार्य किया। 27 अक्टूबर 1947 को भारतीय सेना श्रीनगर पहुँची और इन आक्रान्ताओं को पीछे खदेड़ दिया। 8 नवम्बर को वे बारामुल्ला से 300 ट्रकों में लूट का सामान लादकर अपने साथ ले गए।

मीरपुर नरसंहार

26 अक्तूबर 1947 को जम्मू कश्मीर का विलय भारत में हो चुका था। मीरपुर इसी जम्मू कश्मीर में पाकिस्तानी सीमा पर बसा एक शहर था। यहां के 25,000 से ज्यादा हिन्दुओं, सिक्खों को लगा कि अब जम्मू कश्मीर तो भारत का अभिन्न हिस्सा हो गया है, लिहाजा अब शहर छोडऩे या पलायन करने की जरूरत नहीं है। इसके अतिरिक्त मार्च 1947 से यहाँ पर रावलपिंडी और गुजरखां में मुस्लिम अत्याचार के कारण हिन्दुओं ने भी मीरपुर में शरण ले रखी थी। हिन्दुओं की आबादी कस्बों में केन्द्रित थी। शिक्षा के क्षेत्र में उन्नति थी, बालिकाओं की शिक्षा के लिए कई विद्यालय थे।

पाकिस्तान सेना द्वारा जम्मू, मीरपुर, मुजफ्फराबाद पर अवैध कब्जे के पश्चात मीरपुर में भयानक नरसंहार हुआ जिसमे 20 हजार हिन्दू और सिख लोगों की हत्या की गयी और लगभग 3,500 नागरिक जो कि गंभीर रूप से घायल हो गए थे, उनको बंदी बना लिया गया। शेष लगभग 3,500 लोग जीर्ण-हीन अवस्था में ठोकर खाते हुए पैदल चलकर जम्मू पहुंचे। 25 नवम्बर के आसपास 5 हजार हिन्दू बालिकाओं को पकड़ कर ले जाया गया जिनमे से कई को पाकिस्तान, अफगानिस्तान व अरब के बाजारों में बेचा गया। हत्या को अंजाम देते हुए पाकिस्तानी सेना गुरुद्वारा दमदमा साहिब तक पहुंची और सिखों का कत्लेआम किया।

कोटली नरसंहार

कोटली, मीरपुर की तहसील थी और इसकी आबादी लगभग 6 हजार थी, जिसमें आधे हिन्दू और आधे मुस्लिम थे। यहाँ पर आर्य समाज का खासा प्रभाव था। लगभग 2 महीने तक कोटली के सभी हिन्दू बंधक बन कर रहे। पाकिस्तानी सेना ने बड़े पैमाने पर लूट, अपहरण कर हजारों महिलाओं, बच्चों और पुरुषों को क्रूरता से मौत के घाट उतार दिया।

अलीबेग गुरुद्वारा में नरसंहार

मीरपुर से 8-10 किमी दूर अलीबेग एक छोटा सा क़स्बा था व यहाँ पर एक बड़ा गुरुद्वारा था जिसे उस समय 1 लाख रूपये से बनाया गया था। इस गुरुद्वारे को अपवित्र किया गया इसे यातना गृह में बदल दिया गया। पाकिस्तानी सेना व स्थानीय मुस्लिम लीग के लोग जवान पुरुषों को कुल्हाड़ी से काटते व महिलाओं के साथ बलात्कार करते। यहाँ के अलीबेग कैम्प में पांच हजार हिन्दू सिखों को कत्ल करने की योजना थी। भयानक अत्याचार के बाद केवल 1500 लोग बचे थे। इस कैम्प की निर्दयता की अनेक वृतांत है जो निर्दयता में मानवीय सोच से परे है। लोग अपने धर्म व सतीत्व की रक्षा के लिए अपनी ही बहनों व माताओं को मारने के लिए विवश हुए। बगल का गाँव-गुडा निक्का सिख बाहुल्य था, वहां पर दो कुंए थे और दोनों महिलाओं के शवों से पटे पड़े थे। जिन्हें या तो पाकिस्तानी सेना ने हत्या कर यहाँ फेंक दिया था या वह अपने धर्म की रक्षा के लिए स्वयं बलिदान हो गयी थी।

अलीबेग कैंप नरसंहार

पाकिस्तान ने 25 नवंबर 1947 को मीरपुर शहर पर हमला किया और 20 हजार से ज्यादा हिंदू व सिखों की हत्या कर डालीं। मीरपुर और आसपास के 5,000 हिंदू व सिखों को मीरपुर से 25 मील दूर अली वेग कैंप में बंदी बनाकर रखा गया। यहां के भव्य कीर्तनगढ़ गुरुद्वारे को जलाकर इसको पाकिस्तानी सेना ने जेलनुमा अलीबेग कैंप बना दिया था। ये कैंप बाद में इन बंदी हिंदू-सिखों का ऑशविच साबित हुआ। पाकिस्तानी सैनिक लड़कियों-महिलाओं के साथ बलात्कार करते और प्रतिदिन पुरुषों के एक ग्रुप को बाहर ले जाकर हत्या कर देते। ये सिलसिला अगले कई महीनों तक चला। 2 दिसंबर 1948 को मीरपुर का पब्लिक प्रोशिक्यूटर सरदार मो. इब्राहिम कैंप आया। कैंप में कैद मीरपुर के हिंदू व सिख एडवोकेट थोड़े आश्वस्त हुए।

सरदार अब्राहम ने उनको भारत के इस हिस्से में सुरक्षित पहुंचाने का आश्वासन देते हुए सभी एडवोकेट, अध्यापकों समेत सभी पढ़े-लिखे हिंदू-सिखों को एकत्रित किया और लॉरी में बिठा दिया। रास्ते में वहशी पाकिस्तानियों ने उनको नग्न कर सामूहिक हत्या कर कर डाली। यही द्रोही इब्राहिम बाद में पीओजेके में कठपुतली सरकार में प्रेजीडेंट भी बना। इस तरह ये सिलसिला चलता रहा। जनवरी 1948 के अंत में जब इंटरनेशनल कमेटी ऑफ रेडक्रास की टीम यहां पहुंची तो मात्र 1,600 हिंदू-सिख शरणार्थी बचे थे। जिसमें विधवा महिलाएं, वृद्ध और कुछ बच्चे ही ये मरणासन्न हालत में बचे थे।

भिंबर व राजौरी नरसंहार

10 नवंबर 1947, दीवाली का दिन। पाकिस्तानी सैनिकों ने जम्मू कश्मीर पर हमला कर बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया था। दीवाली का मतलब है खुशियां, चारों तरफ रौनक। लेकिन क्या आप जानते है जम्मू कश्मीर के राजौरी की दीवाली से जुडी ऐसी यादें है जिन्हे याद कर राजौरी के लोग आज भी सिहर उठते हैं। नवम्बर के महीने तक उन्होंने पुंछ जिले के ज्यादातर हिस्सों पर कब्ज़ा कर लिया था। पाकिस्तानी सेना ने राजौरी तथा उसके आसपास के क्षेत्रों में भयानक अत्याचार आरम्भ कर दिया। पाकिस्तानी सेना ने दीवाली के दिन राजौरी शहर पर हमला बोला। सभी लोग राजौरी में तहसील भवन में जमा हो गए थे, जब पाकिस्तानी सेना ने हमला किया तो तहसील भवन के आस पास लोग निहत्थे थे। लेकिन पाकिस्तानी सेना ने राजौरी में इन निहत्थे लोगों के साथ ऐसी मारकाट मचाई कि शहर की गलियां लाल हो गयी।

ऐसे समय में राजौरी की महिलाओं और यहां तक कि छोटी बच्चियों ने यह तय किया कि वो दुश्मनों के हाथ पड़ने की बजाए मरना पसंद करेंगी, परिवार के पुरुषों ने गोलियों से अपनी मां, अपनी बहनों, अपनी पत्नी तमाम महिलाओं और बच्चों को खुद ही मारना शुरू किया। जब गोलियां खत्म हो गयी महिलाओं ने जहर खा कर और कुएं में कूदकर अपनी जान दे दी। आपने राजस्थान में हुए जौहर की कहानियां सुनी होंगी। लेकिन राजौरी शहर का ये जौहर इतिहास में कहीं दब-सा गया। भारतीय सेना राजौरी के तरफ कूच करते हुए चिंगस पहुंची तो उसे आग की लपटों में घिरा पाया। भागता हुआ शत्रु सर्वक्षार नीति; अर्थात जो लूट सके सो लूट लो बाकी सबकुछ नष्ट कर दो का पालन कर रहे थे। शत्रु के अत्याचारों के परिणामस्वरूप राजौरी में बड़े-बड़े गड्ढों में शव पाए गए। एक पत्रकार ने लिखा था, पीओजेके में मनुष्यों और जानवरों के मृत शरीर कुत्तों और गिर्दों से घिरे दिखाई देते हैं।

शहर आधा जला हुआ है और वहाँ एक भयानक सन्नाटा है, क्योंकि जनसंहार से बच निकलने वाले लोग पहाड़ों की ओर भाग गए हैं। राजौरी मर रहे तथा मरे हुए लोगों का शहर है। ऐसा माना जाता है कि राजौरी में लगभग 30,000 लोगों का कत्लेआम हुआ। बाद में ब्रिगेडियर प्रीतम सिंह के नेतृत्व में राजौरी को पाकिस्तानी सेना से मुक्त करवाया गया। जिस तहसील भवन में ये मौत का तांडव हुआ था। उसे आप आज भी बलिदान भवन के रूप में देख सकते है। इस बलिदान स्तम्भ की देखरेख भारतीय सेना करती है। आज भी आप वहां जाए तो आपको शहीद हुए लोगों की फोटोज देखने को मिलेंगे। स्थानीय लोगों, बुजुर्गों का कहना है कि अगर तहसील भवन के नीचे आज भी खुदाई की जाए तो पत्थरो और ईटो के बजाय हड्डियां और नर कंकाल निकलेंगे। आज भी दीवाली के समय राजौरी लोग 1947 के उस खूनी मंजर को याद सिहर उठते हैं।

मंदिरों व गुरुद्वारे पर आक्रमण

हिंदुओं का परम पवित्र स्थल शारदा पीठ, देवी गली, बाणगंगा, रघुनाथ, सीताराम सहित अनेक मंदिर व मीरपुर में उत्तर की ओर स्थित गुरुद्वारा दमदमा साहिब इन आक्रमणकारियों के हाथों में चले गयें। आज की अली बेग गुरुद्वारा में पाकिस्तान सरकार याकूब शहीद हाई स्कूल चलता है। आज जब हम पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर की बात करते हैं तो साधारणत: केवल भू-भाग की चर्चा सामने आती है परंतु हम भूल जाते हैं कि जेहल के पानी में असंख्य निर्दोष हिन्दू-सिखों की लाशें तैरी व इसका पानी उनके खून से लाल हो गया था।

Topics: जम्मू-कश्मीर अभिन्न अंग 1947 genocideHindu-Sikh displacementMirpur massacreMuzaffarabad massacreBaramulla massacreJammu and Kashmir integral part1947 नरसंहारहिंदू-सिख विस्थापितमीरपुर नरसंहारमुजफ्फराबाद नरसंहारबारामूला नरसंहार
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