बांग्लादेश में पिछले कुछ महीनों में अल्पसंख्यक खासकर हिंदू समुदाय के खिलाफ हिंसा और टार्गेटेड हमलों की खबरें लगातार आ रही हैं। यह मुद्दा अब केवल दक्षिण एशिया तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि एक अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संकट का रूप ले चुका है। भारत ने हमेशा इन हमलों की कड़ी निंदा की, कई हिंदू संगठनों ने भी जमकर विरोध जताया।वहीं अब अमेरिका के प्रवासी समुदायों ने भी इस पर कड़ा रुख अपनाया।
अमेरिका के प्रमुख शहरों में हुआ विरोध प्रदर्शन
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका के लगभग दो दर्जन से अधिक शहरों में बांग्लादेशी हिंदुओं के समर्थन में रैलियां, सभाएं और कैंडल मार्च निकाले गए। इन शहरों में प्रिंसटन, लॉस एंजिल्स, शिकागो, बे एरिया, डेट्रॉइट और टैम्पा जैसे प्रमुख शहर शामिल थे। इन विरोध प्रदर्शनों का मुख्य उद्देश्य न केवल पीड़ितों के प्रति संवेदना व्यक्त करना था, बल्कि वैश्विक समुदाय और अमेरिकी प्रशासन को इस गंभीर स्थिति के प्रति सचेत करना भी था।
धीमा नरसंहार और बढ़ते आंकड़े
प्रिंसटन में आयोजित एक रैली के दौरान वक्ताओं ने चिंताजनक आंकड़े मीडिया से साझा किए। एक शख्स ने दावा किया कि बांग्लादेश में पिछले एक साल के भीतर अल्पसंख्यकों पर 3,000 से अधिक हमले हुए हैं। इन हमलों में घरों को जलाना, मंदिरों में तोड़फोड़ और शारीरिक हिंसा शामिल है। डेट्रॉइट में प्रदर्शनकारियों ने स्थिति की गंभीरता को बताते हुए इसे ‘स्लो जीनोसाइड’ (धीरे-धीरे होने वाला नरसंहार) करार दिया। उनका तर्क है कि योजनाबद्ध तरीके से हिंदुओं को निशाना बनाया जा रहा है ताकि उन्हें पलायन के लिए मजबूर किया जा सके। प्रदर्शनकारियों ने स्थानीय निवासियों से अपील की कि वे अपने क्षेत्रीय सांसदों को फोन करें और वाशिंगटन में होने वाले बड़े आयोजनों का हिस्सा बनें ताकि नीतिगत स्तर पर बदलाव लाया जा सके।
चुप्पी तोड़ना है बहुत जरूरी
लॉस एंजिल्स में हुए कार्यक्रम में धार्मिक प्रार्थनाओं के साथ-साथ नागरिक सक्रियता पर जोर दिया गया। वहां मौजूद लोगों ने भावुक अपील करते हुए कहा कि चुप्पी का अर्थ स्वीकृति है। यदि दुनिया आज बांग्लादेशी हिंदुओं पर हो रहे जुल्मों के खिलाफ नहीं बोलती है, तो यह मान लिया जाएगा कि मानवता ने इन अत्याचारों को स्वीकार कर लिया है।
इसके साथ ही प्रदर्शनकारियों ने कई मांग भी उठाई। इनमें बांग्लादेश सरकार से मांग की गई है कि वह हिंसा के दोषियों को सजा दे, संयुक्त राष्ट्र और अन्य मानवाधिकार निकायों से इस मामले की स्वतंत्र जांच कराने की अपील की गई है। साथ ही अल्पसंख्यकों के पूजा स्थलों और उनके जीवन की सुरक्षा के लिए ठोस कानून और सुरक्षा बल तैनात किए जाएं जैसी मांग शामिल हैं।

















