उत्तराखंड की वो झील जहां आज भी बिखरे हैं सैकड़ों इंसानी कंकाल… वजह जानकर दंग रह जाएंगे
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उत्तराखंड की वो झील जहां आज भी बिखरे हैं सैकड़ों इंसानी कंकाल… वजह जानकर दंग रह जाएंगे

रूपकुंड झील का रहस्य (उत्तराखंड) रूपकुंड झील उत्तराखंड के चमोली जिले में समुद्र तल से लगभग 5,020 मीटर ऊपर है। यह छोटी सी ग्लेशियल झील दुनिया भर में स्केलेटन्स की झील के नाम से जानी जाती है, क्योंकि इसके चारों ओर इंसानी कंकाल बिखरे हुए हैं। सदियों से यह जगह लोगों के लिए रहस्य और जिज्ञासा का विषय बनी हुई है।

Written byउत्तराखंड ब्यूरोउत्तराखंड ब्यूरो — edited by Mahak Singh
Jan 28, 2026, 01:11 pm IST
in उत्तराखंड
रूपकुंड

रूपकुंड

आज भी देवभूमि उत्तराखंड में ऐसे रहस्य हैं जिन्हें कोई नहीं सुलझा पाया है। यहां रहस्य से भरी झीलें, बर्फीली चोटियां, गुफाएं हैं जिनके बारे में सिर्फ सुनी-सुनाई कहानियां ही सामने आती हैं। रूपकुंड झील का रहस्य (उत्तराखंड) रूपकुंड झील उत्तराखंड के चमोली जिले में समुद्र तल से लगभग 5,020 मीटर ऊपर है। यह छोटी सी ग्लेशियल झील दुनिया भर में स्केलेटन्स की झील के नाम से जानी जाती है, क्योंकि इसके चारों ओर इंसानी कंकाल बिखरे हुए हैं। सदियों से यह जगह लोगों के लिए रहस्य और जिज्ञासा का विषय बनी हुई है।

रहस्य की खोज कैसे हुई?

1942 में, जब हिमालय में बर्फ कम पड़ी, तब पहली बार ब्रिटिश अधिकारियों ने झील के किनारे बड़ी संख्या में मानव अस्थियाँ देखीं। शुरू में आशंका जताई गई कि ये किसी युद्ध या महामारी से जुड़ी हो सकती हैं, लेकिन बाद के शोधों ने इस रहस्य को और गहरा कर दिया।

वैज्ञानिक शोध क्या कहते हैं?

आधुनिक डीएनए परीक्षण, रेडियोकार्बन डेटिंग और कंकालों के अध्ययन से कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए- झील में मिले कंकाल एक ही समय के नहीं हैं, बल्कि अलग-अलग काल के हैं। कुछ कंकाल 9वीं–10वीं शताब्दी के हैं, जबकि कुछ अपेक्षाकृत बाद के। कई खोपड़ियों पर गोल, गहरी चोटें थीं, जो किसी सख्त चीज़ से टकराने जैसी थीं।

सबसे प्रचलित सिद्धांत: ओलों की भीषण आपदा

वैज्ञानिकों का मानना है कि एक समय में यात्रियों या तीर्थयात्रियों का समूह यहाँ पहुँचा होगा। अचानक बहुत बड़े-बड़े ओले (क्रिकेट बॉल के आकार के) गिरे होंगे, जिनसे लोगों को गंभीर चोटें आईं और वे बच नहीं पाए। ऊँचाई और मौसम की कठोरता के कारण कोई सहायता भी नहीं मिल सकी।

लोककथाएँ क्या कहती हैं?

स्थानीय लोककथाओं के अनुसार यह दल नंदा देवी राजजात यात्रा से जुड़ा हो सकता है। कहा जाता है कि देवी के अपमान या नियमों के उल्लंघन पर यह दैवी दंड हुआ। कुछ मान्यताओं में एक राजा, उसकी रानी और उनके साथ चल रहे लोग इस आपदा के शिकार बताए जाते हैं।

आज भी रहस्य क्यों?

हालाँकि विज्ञान ने बहुत कुछ स्पष्ट किया है, फिर भी अलग-अलग काल के लोग यहाँ क्यों आए? कुछ कंकाल दूर-दराज़ क्षेत्रों के लोगों से मेल क्यों खाते हैं? इतनी ऊँचाई पर इतने लोग किस उद्देश्य से पहुंचे? इन सवालों के पूरे उत्तर अभी भी शोध का विषय हैं। रूपकुंड झील केवल एक प्राकृतिक स्थल नहीं, बल्कि इतिहास, विज्ञान और लोकविश्वासों का संगम है। यह हमें हिमालय की कठोर प्रकृति, प्राचीन यात्राओं और मानव साहस तीनों की कहानी सुनाती है।

नंदा देवी राजजात और रूपकुंड झील का संबंध

नंदा देवी राजजात और रूपकुंड झील का संबंध उत्तराखंड की सबसे प्राचीन धार्मिक परंपराओं, लोककथाओं और ऐतिहासिक घटनाओं से जुड़ा हुआ है। यह संबंध केवल आस्था का नहीं, बल्कि हिमालयी समाज की संस्कृति, नियमों और चेतावनियों का प्रतीक भी है।

नंदा देवी राजजात क्या है?

नंदा देवी राजजात उत्तराखंड (गढ़वाल–कुमाऊँ) की सबसे बड़ी और कठिन धार्मिक यात्रा मानी जाती है। यह यात्रा हर 12 वर्ष में आयोजित होती है। देवी नंदा देवी (पार्वती का रूप) की मायके से ससुराल (कैलाश) तक की प्रतीकात्मक विदाई मानी जाती है। यात्रा का अंतिम पड़ाव होमकुंड होता है, जो रूपकुंड के पास स्थित है। यह यात्रा सदियों से चली आ रही है और इसमें हजारों श्रद्धालु भाग लेते हैं।

रूपकुंड झील का स्थान और महत्व

रूपकुंड झील, नंदा देवी राजजात मार्ग के निकटवर्ती क्षेत्र में स्थित है। यह क्षेत्र देवी नंदा का अत्यंत पवित्र और निषिद्ध (वर्जित) क्षेत्र माना जाता है। लोकमान्यता है कि यहाँ देवी के नियमों का उल्लंघन करना महापाप है।

लोककथा: राजा और देवी का क्रोध

गढ़वाल की सबसे प्रसिद्ध लोककथा के अनुसार एक समय एक राजा, उसकी गर्भवती रानी, नर्तकियाँ और सैनिकों का दल इस मार्ग से होकर यात्रा कर रहा था। इस दल ने देवी नंदा के पवित्र क्षेत्र में नृत्य-गान किया, शोरगुल मचाया, धार्मिक मर्यादाओं का उल्लंघन किया। इससे देवी नंदा क्रोधित हो गईं।

देवी का दंड और रूपकुंड

लोककथा कहती है कि देवी ने आकाश से लोहे जैसे कठोर ओले बरसाए। यह दैवी आपदा इतनी भयानक थी कि पूरा दल वहीं मारा गया। उनके शव और अस्थियाँ आज भी रूपकुंड झील के आसपास देखी जाती हैं। यही कथा वैज्ञानिक शोध में मिले गोलाकार सिर की चोटों से मेल खाती है। विज्ञान और लोककथा का संगम आधुनिक वैज्ञानिक शोध बताते हैं। कई कंकालों की मौत ऊपर से गिरने वाली गोल वस्तुओं से हुई यह प्राकृतिक रूप से भीषण ओलावृष्टि हो सकती है।

लोककथा इसे देवी का प्रकोप बताती है इस प्रकार लोकआस्था और विज्ञान दोनों एक ही घटना की अलग-अलग व्याख्या करते हैं।

आज भी क्यों पवित्र और वर्जित है?

आज भी राजजात यात्रा के दौरान कुछ नियम अत्यंत कठोर होते हैं रूपकुंड क्षेत्र में- शोर-शराबा, नृत्य-गान, अपवित्र आचरण वर्जित माना जाता है। श्रद्धालु इसे देवी का न्याय क्षेत्र मानते हैं। धार्मिक प्रतीकात्मक अर्थ नंदा देवी राजजात और रूपकुंड का संबंध यह सिखाता है कि प्रकृति और देवी का अपमान विनाश का कारण बन सकता है। हिमालय केवल पर्वत नहीं, बल्कि जीवित देवभूमि है। अनुशासन, मर्यादा और विनम्रता ही यात्रा का मूल मंत्र है।

रूपकुंड झील नंदा देवी राजजात की चेतावनी स्थली है, जहाँ इतिहास, लोककथा और विज्ञान एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं। यही कारण है कि रूपकुंड को “देवी नंदा की मौन साक्षी” कहा जाता है।

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