भाई मोती राम मेहरा: गुरु परिवार की सेवा में परिवार बलिदान
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भाई मोती राम मेहरा: गुरु परिवार की सेवा में परिवार बलिदान

भाई मोती राम मेहरा ने गुरु गोबिंद सिंह जी के छोटे साहिबजादों और माता गुजरी जी को ठंडे बुर्ज में दूध पिलाया, जिसके बदले पूरे परिवार को कोल्हू में पीसकर शहीद कर दिया गया। सिख इतिहास की यह प्रेरक बलिदान गाथा पढ़ें।

Written byराकेश सैनराकेश सैन — edited by कुलदीप सिंह
Dec 23, 2025, 01:28 pm IST
in पंजाब
Bhai Moti Ram Martyre

प्रतीकात्मक तस्वीर

यह धर्म की रक्षा और गुरुनिष्ठा की पराकाष्ठा है कि मोती राम मेहरा ने अपने परिवार को कोल्हू में पिरवाया जाना मंजूर कर लिया परन्तु हिन्दू धर्म छोड़ इस्लाम नहीं कबूला। मोती राम मेहरा का अपराध केवल इतना था कि उन्होंने ठण्डे बुर्ज में कैद गुरु गोबिन्द सिंह जी के दो साहिबजादों व माता गुजरी को पौष माह की हाड गला देने वाली ठंडी रात को गर्म-गर्म दूध पिलाया था। इस अपराध के चलते उनके सामने दो विकल्प रखे गए कि या तो इस्लाम कबूल लो या फिर मरने को तैयार हो जाओ। मोती राम मेहरा ने दूसरा जानलेवा मार्ग चुना, उनके सामने उनके सात वर्षीय बेटे को कोल्हू में गन्ने की तरह कुचल दिया और जब वो फिर भी टस से मस न हुए तो पूरे परिवार को यही सजा दी गई।

सन् 1704 ई. 24 दिसंबर को आनंदपुर साहिब में लड़ाई के दौरान भगदड़ में श्री गुरु गोविंद सिंह साहिब का पूरा परिवार आनंदपुर साहिब के पास सरसा नदी के तट पर नदी में बाढ़ आने के कारण बिछड़ गया और 25 दिसंबर को मुगलों ने छोटे साहिबजादों फतेह सिंह, जोरावर सिंह व माता गुजरी को गिरफ्तार कर लिया। उसी दिन साहिबजादों को कोतवाली मोरिंडा में रखा गया। 26 दिसंबर को साहिबजादों को हथकड़ी लगाकर बैलगाड़ी में बैठाकर सरहिंद नामक स्थान पर लाया गया था। इस नगर में प्रवेश करने से पहले पहचान के लिए एक पीपल के वृक्ष के नीचे साहिबजादों को बैठाया गया था।

पहचान होने के बाद दोनों छोटे साहिबजादों को माता गुजरी से अलग कर दिया था एवं माता गुजरी जी को ठंडे बुर्ज में कैद करने के लिये भेज दिया गया था। दोनों साहिबजादों ने जब सूबा सरहिंद की कचहरी में बेखौफ होकर प्रवेश किया था और निडर होकर फतेह बुलाई थी। कचहरी का समय समाप्त होने के पश्चात् साहिबजादों को भी ठंडे बुर्ज में कैद कर दिया गया था। हुकूमत का आदेश था कि इनके तन के लिए ना कपड़े दिए जाएँ और किसी भी प्रकार के भोजन-पानी की कोई व्यवस्था न की जाये और उनको भूखा रखा जाए। इस स्थान पर तैनात फौज के लिए भोजन बनाने वाले मोतीराम जी मेहरा को जब यह ज्ञात हुआ तो वो अपने घर पर भोजन ग्रहण नहीं कर सके।

साहिबजादों को ठंडे बुर्ज में कैद करके रखा

अपनी माँ से वार्तालाप करते हुए कहा कि माता जी श्री गुरु गोविंद सिंह साहिब के साहिबजादों को ठंडे बुर्ज में कैद करके रखा हुआ है। इस दुखद घटना के कारण मैं कैसे भोजन कर सकता हूँ? मैं रोटी गले से निगल ही नहीं सकता हूँ? कारण मेरे गुरु के लाल छोटे साहिबजादे और गुरु जी की माता, माता गुजरी उस ठंडे बुर्ज पर भूखी बैठी है। साथ ही सरहिंद के नवाब वजीर खान का हुक्म है कि यदि इस परिवार की किसी ने मदद की तो उसे कोल्हू की चक्की में डालकर पीस दिया जाएगा।

भाई मोती राम मेहरा जी की माता जी ने वचन किए कि बेटा जीवन में यह सेवा दुबारा नहींं मिलेगी। तुम माता गुजरी और साहिबजादों को भोजन अवश्य ग्रहण करवाओ। मोती राम मेहरा जी ने घर में प्रशादे (रोटी) और गर्म दूध को तैयार किया एवं ठंडे बुर्ज की ओर रवाना हो गए। परंतु महल के अंदर सिपाहियों ने प्रवेश देने से साफ इनकार कर दिया। मोतीराम जी ने अपने घर के सभी जेवर और मूल्यवान गहने इन सिपाहियों को रिश्वत में दिए, तब कहीं जाकर महल में प्रवेश की इजाजत मिली थी। भाई मोती राम मेहरा ने बुर्ज में प्रवेश कर माता जी के सम्मुख नतमस्तक होकर निवेदन किया कि माता जी मैं आप ही का बेटा हूँ। पाँच प्यारों में से एक भाई हिम्मत सिंह जी रिश्ते में मेरे चाचा जी लगते हैं और हरा सिंह मेरे पिता हैं। मुझे आपकी सेवा करने का अवसर प्राप्त हुआ है। माता जी आप से निवेदन है कि इन बच्चों को जल्द ही गर्म दूध पिलाएँ, जिसे इतिहास में ऐसे अंकित किया गया है –

पिथ कै प्रेम मोती सौ केरा॥

माता जी कहै भलै हुए तेरा॥

अर्थात मोती राम तेरा भला हो और लगातार तीन दिनों तक भाई मोतीराम मेहरा जी साहिबज़ादों को ठंडे बुर्ज़ में दुग्ध पान करवाते रहे थे। इसे इतिहास में ऐसे अंकित किया गया है –

धन मोती जीन पुन कमाईआ।

गुरु लालां ताई दूधं पिलाईआ॥

छोटे साहिबजादों का बलिदान

26 दिसंबर सन् 1704 ई. को छोटे साहिबजादों की शहादत हुई थी। एक व्यक्ति  की ओर से वजीर खान को शिकायत की गई थी कि भाई टोडरमल के साथ इस मोती राम मेहरा ने गुरु परिवार का साथ साथ था। वजीर खान के हुक्म अनुसार भाई मोती राम मेहरा के पूरे परिवार को बाँधकर दरबार में हाजिर किया गया। मोती राम मेहरा को वजीर खान के समक्ष पेश किया गया। वजीर खान ने मोती राम मेहरा से पूछा कि तुझे मौत से डर नहीं लगता है क्या ? तुम्हें यह पता नहीं है क्या ? मेरा हुक्म है जो भी गुरु परिवार की मदद करेगा, उन्हें कोल्हू की चक्की में पीस कर मौत की सजा दी जाएगी। मोती राम मेहरा ने हँसकर उत्तर दिया कि मुझे पता था और मुझे तेरी सजा भी मंजूर है। मैं जानता था कि दूध की कीमत का मूल्य मुझे अपने परिवार की शहीदी देकर चुकाना पड़ेगा, परंतु मैं डरता नहींं हूँ। कारण मेरे पिता हरा सिंह ने भी श्री गुरु गोविंद सिंह साहिब के साथ युद्ध करते हुए मैदान-ए-जंग में शहीदी का जाम पिया है।

वजीर खान की बर्बरता

वजीर खान के द्वारा पूरे परिवार को कोल्हू में पीसकर मौत की सजा का ऐलान किया गया। परंतु एक शर्त रखी गई कि यदि तुम अपना धर्म बदल लो तो तुम्हें माफ कर दिया जाएगा। इस पूरे परिवार ने धर्म परिवर्तन से इंकार कर दिया था। मोती राम मेहरा से कहा गया कि तेरे बेटे को तेरी आँखों के सामने कोल्हू की चक्की में पीस दिया जाएगा। क्या कभी तुमने कोल्हू की चक्की से तिलों के तेल को निकलते हुए देखा है? मोतीराम ने अटल इरादों से उत्तर दिया था कि तेरी आँखों के सामने 7 और 9 वर्ष की आयु के साहिबजादे शहीदी दे सकते हैं तो क्या मेरा बेटा शहीदी देने के लिए पीछे रहेगा? इसको भी तुम आजमा कर देख लो!

नारायण को कोल्हू में पीसा

उस समय 7 वर्ष के मोतीराम मेहरा के बेटे नारायण को कोल्हू की चक्की में पिसने के लिए चक्की में प्रथम उसके पैरों को रखा गया और मोती राम मेहरा की आँखों के सम्मुख कोल्हू के पहियों को चलाना प्रारंभ किया था। जब इस पुत्र नारायण को कोल्हू की चक्की में पिसा जा रहा था तो उपस्थित लोगों की चीखें निकल रही थीं। परंतु धन्य है मोती राम मेहरा जो प्रभु के इस भाणे को मीठा मानकर स्वीकार कर रहा था। इस छोटे बालक को कोल्हू की चक्की में ऐसे पीस दिया गया, जैसे गन्ने को चरखी में डालकर उसका रस निकाला जाता है। अपने बेटे नारायण की शहीदी के पश्चात् मोती राम मेहरा की माता जी, माता लधो जी को भी इसी तरह बर्बरता से मोतीराम की आँखों के सम्मुख कोल्हू की चक्की में पीस कर शहीद किया गया था। मोती राम मेहरा की पत्नी बीबी भोई जी को भी इसी प्रकार से मोती राम मेहरा की आँखों के सम्मुख बर्बरता से शहीद किया गया।

इस प्रकार पूरा परिवार कोल्हू की चक्की में पीस कर शहीद कर दिया गया था। अंत में मोती राम मेहरा का समय भी आ चुका था। मोती राम मेहरा को पुन: लालच दिया गया कि तेरा सारा परिवार कोल्हू की चक्की में पीस कर बर्बरता से शहीद कर दिया गया है। यदि तुम अभी भी धर्म परिवर्तन की शर्त को मान लोगे तो तुम्हें रिहा कर दिया जाएगा। मोती राम ने मौत के भय से अपना प्रिय हिंदू धर्म छोड़ा अस्वीकार कर दिया और अमर शहीद भाई मोती राम मेहरा को भी अंत में कोल्हू की चक्की में पीस कर शहीद किया गया।

आज देश स्वतंत्र है और हिन्दुत्व पुन: उत्थान पर की राह पर अग्रसर हो रहा है तो यह उपलब्धियां यूं ही प्राप्त नहीं हुईं। इनके पीछे असंख्य मोती राम मेहरा के बलिदान छिपे हैं। धन्य है भारत की वह धरा जिसने मोती राम मेहरा जैसे लाखों सपूतों को जन्म दिया जिन्होंने देश-धर्म की रक्षा के लिए अपना तो अपना, अपने परिवारों को भी बलिदान कर दिया।

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