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होम भारत झारखण्‍ड

प्रकृति के साथ चलने की शिक्षा देता है करमा पर्व

Written byरितेश कश्यपरितेश कश्यप
Sep 4, 2025, 01:58 pm IST
inझारखण्‍ड
पारंपरिक नृत्य करती हुईं लड़कियां

पारंपरिक नृत्य करती हुईं लड़कियां

भारत के सांस्कृतिक वैभव में त्योहारों और धार्मिक अनुष्ठानों की गहरी छवि है, जो न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक होते हैं, बल्कि सामाजिक एकता, प्राकृतिक संरक्षण और पारिवारिक बंधनों के भी द्योतक हैं। करमा पूजा, जो मुख्य रूप से झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, बिहार, मध्य प्रदेश, असम और बांग्लादेश के जनजातीय समुदायों में बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है, ऐसा ही एक पर्व है। यह त्योहार न केवल प्रकृति और कृषि से जुड़ा है, बल्कि इसमें हिंदू संस्कृति के धार्मिक और सामाजिक तत्वों का भी समावेश पाया जाता है।

भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी को करम वृक्ष की डाली को पूजा स्थल पर गाड़ा जाता है, और करम देवता की कथा सुनाई जाती है। इस दिन महिलाएं निर्जला उपवास रखकर भाई-बहनों के लिए मंगलकामना करती हैं। पूजा के बाद सामूहिक नृत्य (करमा नृत्य) और गीतों के साथ सामाजिक एकता का उत्सव मनाया जाता है।

करमा पूजा की पौराणिक कथा और सामाजिक परिदृश्य

करमा पूजा की उत्पत्ति से जुड़ी लोककथाएं इस पर्व की सांस्कृतिक गहराई को दर्शाती हैं। एक प्रमुख कथा में सात भाई और उनकी पत्नियों की कहानी शामिल है, जहाँ करम वृक्ष (करमा देवता का प्रतीक) को अपमानित करने पर एक परिवार पर विपत्तियाँ आती हैं। अंततः करमा देवता की पूजा से समृद्धि लौटती है और परिवार खुशहाल होता है। यह कथा कर्म (कठिन परिश्रम) और भाग्य (सौभाग्य) के संतुलन की शिक्षा देती है, जो जीवन के आध्यात्मिक दर्शन के लिए मूलभूत है।

इस कथा से ही करमा पूजा की धार्मिक परंपराएं विकसित हुईं, जहां करम वृक्ष की डाली को पूजा का केंद्र माना जाता है और युवतियां ‘जावा’ नामक अनाज उगाने की पूजन-पद्धति अपनाती हैं। यह परिवार और समुदाय में भाई-बहन के प्रेम, सामाजिक सामंजस्य और प्रकृति के साथ रिश्ते की संस्कृति को जीवित रखता है।

हिंदू संस्कृति से करमा पूजा का सम्बंध

करमा पूजा की परंपरा जनजातीय समाज की होती हुई भी सनातन संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। जनजातीय समाज अपने देवताओं को प्रकृति रूप में मानता है, जहां करमा देवता को यौवन, शक्ति, और प्रकृति के रक्षक के रूप में पूजा जाता है। यह अवधारणा हिंदू धर्म की ‘पूजा आराधना’ के व्यापक सिद्धांत से जुड़ी हुई है जिसमें देवताओं का प्राकृतिक तत्वों से गहरा संबंध है।

भाई-बहन के प्रेम को सशक्त करने वाले पर्व हिन्दू धर्म में रक्षाबंधन के समान ही करमा पूजा में बहनें अपने भाइयों की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए व्रत करती हैं। इस प्रेम और स्नेह का सांस्कृतिक महत्व हिंदू धार्मिक ग्रंथों में भी अनेक बार वर्णित है।

पूजा विधि: परंपरा और आध्यात्मिकता का संगम

करमा पूजा की विधि अत्यंत प्रकृतिपूर्ण और सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में समृद्ध है। पूजा से पहले 7-9 दिनों तक ‘जावा उठाने’ की प्रक्रिया होती है जिसमें विभिन्न प्रकार के अनाज बोए जाते हैं। यह अनाज ब्रह्म मुहूर्त में बालू में बोए जाते हैं और पूजा के दौरान उनका विशेष ध्यान रखा जाता है।

यहां नृत्य, संगीत और लोकगीत आत्मा की शुद्धि का माध्यम होते हैं, जो ऋग्वेद और पुराणों में वर्णित धार्मिक अनुष्ठानों से गहरे जुड़े हैं।

पर्यावरण और प्राकृतिक तत्व की पूजा का संदेश

करमा पर्व की सबसे बड़ी विशिष्टता यह है कि यह पूर्णतः प्रकृति पूजक है। करम वृक्ष का पूजन यह प्रतीक करता है कि मानव जीवन का अस्तित्व प्रकृति पर ही निर्भर है। यह पर्व हमें पर्यावरण संरक्षण की शिक्षा देता है, जो आज के समय में अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह याद दिलाता है कि हमें प्रकृति के साथ संतुलित और सम्मानजनक संबंध बनाना चाहिए, जो हिंदू धर्म के ‘अहिंसा’ और ‘प्रकृति पूजन’ के सिद्धांतों का सार है।

करमा पूजा का एक सामाजिक पहलू यह भी है कि यह सामाजिक भेदभाव को समाप्त कर सबको एक साथ जोड़ता है। पारंपरिक रूप से यह त्योहार सभी वर्गों, उम्र और लिंग के लोगों को एकजुट करता है।

इस पर्व की पूजा विधि, लोककथाएं, नृत्य और उपवास हिंदू धार्मिक अनुष्ठानों के समानांतर एक सांस्कृतिक पुल बनाती हैं, जो हमें हमारी परंपरा, पर्यावरण और सामाजिक मूल्यों से जोड़ती है। करमा पूजा का संदेश आज की वैश्विक संस्कृति में भी प्रासंगिक है — प्रकृति के सम्मान और मानव संबंधों की गरिमा।

करमा पूजा एक जीवंत उदाहरण है कि कैसे भारत की विविध सांस्कृतिक परंपराएं एक-दूसरे से जुड़ती हैं और एक समृद्ध आध्यात्मिक सांस्कृतिक ताना-बाना रचती हैं, जो सभी के लिए एकता, प्रेम और शांति का संदेश लेकर आती हैं।

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रितेश कश्यप
रितेश कश्यप
डेढ़ दशक से पत्रकारिता में सक्रिय। राजनीति, सामाजिक और सम-सामायिक मुद्दों पर पैनी नजर। कर्मभूमि झारखंड।   [Read more]
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