छत्तीसगढ़ की गोंडी भाषा में सलवा जुडूम का अर्थ है ‘शांति मार्च’। छत्तीसगढ़ 1 नवंबर 2000 को एक नया राज्य बना। नया राज्य बनते ही यहां वर्ष 2001 से 2005 तक नक्सली हिंसा चरम पर थी। नया राज्य बना लेकिन सुरक्षा से जुड़ी नई चुनौतियां आ गईं। बस्तर क्षेत्र में सबसे ज्यादा हिंसा हुई। इस क्षेत्र में बस्तर, बीजापुर, दंतेवाड़ा, कांकेर, कोंडागांव, नारायणपुर और सुकमा जिले शामिल हैं।
डॉ. रमन सिंह दिसंबर 2003 में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री बने, जिससे राज्य में पहली भाजपा सरकार की शुरुआत हुई। वह दिसंबर 2018 तक लगातार तीन बार सीएम बने रहे। मुख्यमंत्री के रूप में उनके कार्यकाल के दौरान, शुरुआती दौर में बड़े पैमाने पर नक्सलियों ने उपद्रव मचाया। नए राज्य में राज्य पुलिस के पास पर्याप्त संसाधन नहीं थे और नक्सलियों ने बस्तर क्षेत्र के अधिकांश हिस्से पर लगभग अपना नियंत्रण कर लिया। इसका अर्थ है कि राज्य और जिला प्रशासन का हुक्म यहां नहीं चलता था। इन क्षेत्रों को नक्सलियों द्वारा शासित किया जाता था।
सलवा जुडूम का गठन 2005 में हुआ
सलवा जुडूम का गठन छत्तीसगढ़ राज्य में वर्ष 2005 में नक्सलियों से निपटने के लिए स्थानीय बल के रूप में किया गया था। भारी हथियारों से लैस आतंकवादियों का मुकाबला करने के लिए, राज्य पुलिस को स्थानीय लोगों की आवश्यकता थी जो इस क्षेत्र को अच्छी तरह से जानते थे। अनिवार्य रूप से, सलवा जुडूम को मिट्टी के एक पुत्र की अवधारणा (Son of Soil Concept) से प्रभावित एक मिलिशिया बल के रूप में स्थापित किया गया जो नक्सलियों के खिलाफ पुलिस और अर्धसैनिक अभियानों का पूरक था।
वनवासी युवाओं को बनाया गया एसपीओ
सलवा जुडूम के तहत बस्तर क्षेत्र के वनवासी युवाओं को विशेष पुलिस अधिकारी (Special Police Officer,एसपीओ) के रूप में नियुक्त किया गया । एसपीओ को हथियारों का प्रशिक्षण दिया गया था और वे पुरानी राइफलों से लैस थे। धीरे-धीरे और लगातार एसपीओ छत्तीसगढ़ में सक्रिय सुरक्षा बलों के लिए उपयोगी साबित हुए। अपने चरम पर, छत्तीसगढ़ में एसपीओ की कुल संख्या 4000 कर्मियों से ऊपर थी।
स्थानीय पुलिस के मददगार एसपीओ
एसपीओ की अवधारणा भारत में नई नहीं है। एसपीओ लंबे समय से जम्मू-कश्मीर में कार्यरत हैं और आज भी जम्मू-कश्मीर पुलिस की रीढ़ माने जाते हैं। स्थानीय लोगों के अलावा, बड़ी संख्या में स्थानीय पूर्व सैनिकों को जम्मू-कश्मीर में एसपीओ के रूप में नियुक्त किया गया है। अपने सैन्य करियर के दौरान, मैंने असम और मणिपुर में भी एसपीओ की नियुक्ति देखी। मैंने पाया कि एसपीओ बेहतर आसूचना और स्थानीय जनता के साथ घुलने-मिलने की क्षमता के साथ स्थानीय पुलिस की मदद करने में ज्यादा सक्षम थे।
कथित मानाधिकारों की आड़ ली गई
एसपीओ सुरक्षा बलों के लिए उपयोगी तो साबित हुए, लेकिन आलोचकों ने अक्सर एसपीओ द्वारा कथित मानवाधिकारों के उल्लंघन के बारे में चिंता जताई। कई मानवाधिकार संगठनों ने उन्हें राज्य प्रायोजित भाड़े के सैनिक कहा। अपने सैन्य करियर के दौरान, मैंने कई सशस्त्र संघर्ष देखे जहां आश्चर्यजनक रूप से सशस्त्र आतंकवादियों के मानवाधिकारों को उठाया जाता था। आम जनता और सुरक्षा बलों के मानवधिकारों की बात कम ही होती थी। इन राज्यों में सुरक्षा की स्थिति चिंताजनक थी और सुरक्षा बलों के हाथ में एक कठिन चुनौती थी। चूंकि आतंकवादियों द्वारा मुठभेड़ के दौरान आम जनता को ढाल के रूप में इस्तेमाल किया जाता था, इसलिए सुरक्षा बलों को न्यूनतम बल का उपयोग करने के लिए विवश होना पड़ता था।
हमने यह भी देखा कि आतंकवादी सुरक्षा बलों को मुखबिर होने के संदेह में किसी भी व्यक्ति को मार डालते हैं। निर्दोष होने पर भी कई बार इस तरह की हत्याओं के लिए एसपीओ को जिम्मेदार ठहराया गया। लेकिन विशेष पुलिस अधिकारियों सहित सुरक्षा बल मानवाधिकारों के प्रति अधिक सचेत हैं। 2000 से 2015 के अंतराल में, मानवाधिकार संगठनों ने भारत में बुद्धिजीवियों को बहुत प्रभावित किया। ये संगठन जनमत को पलटने में सक्षम थे।
स्थानीय प्रशासन रखता था नियंत्रण
मैंने वर्ष 2008 में छत्तीसगढ़ राज्य का दौरा किया जब हमें राज्य में एसपीओ के कार्यकरण के बारे में प्रत्यक्ष जानकारी मिली । स्थानीय पुलिस और अर्धसैनिक अधिकारियों के साथ बातचीत से संकेत मिला कि वे एसपीओ के प्रदर्शन से खुश हैं। स्थानीय प्रशासन ने एसपीओ द्वारा शक्ति के किसी भी दुरुपयोग को रोकने के लिए कदम भी उठाए थे।
केवल छत्तीसगढ़ में लागू हुआ प्रतिबंध
व्यक्तिगत रूप से मुझे यह जानकर आश्चर्य हुआ कि भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने जुलाई 2011 में एसपीओ पर प्रतिबंध लगा दिया था। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने सलवा जुडूम को भंग कर दिया और छत्तीसगढ़ सरकार से एसपीओ को दिए गए सभी हथियार और गोलाबारूद वापस लेने को कहा। एसपीओ पर इस तरह का प्रतिबंध केवल छत्तीसगढ़ राज्य पर लागू हुआ था और अन्य राज्यों पर यह लागू नहीं था। इसमें कोई संदेह नहीं है कि सलवा जुडूम के विघटन ने नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई पर प्रतिकूल प्रभाव डाला।
नक्सलियों ने कांग्रेस के काफिले पर किया हमला
मई 2013 में नक्सलियों ने कांग्रेस पार्टी के काफिले पर घात लगाकर हमला किया था और कई प्रमुख नेताओं की हत्या कर दी थी। यह सुनियोजित हमला जगदलपुर से 50 किलोमीटर दूर दरभा घाटी में हुआ। एक दौर फिर लौट आया जब नक्सली अपना प्रभाव बढ़ाने में सफल रहे। सुरक्षा बल कमजोर दिखाई दिए और कुछ वर्षों तक उन्होंने नक्सलवाद का मुकाबला करने में बहुत धीमी प्रगति की।
तत्कालीन सीएम रमन सिंह का नेतृत्व
छत्तीसगढ़ राज्य की मेरी अगली यात्रा वर्ष 2015 के उत्तरार्ध में हुई थी। राष्ट्रीय रक्षा कॉलेज, नई दिल्ली प्रतिनिधिमंडल के हिस्से के रूप में, मुझे नक्सलवाद के खिलाफ राज्यों की लड़ाई का अध्ययन करने का काम सौंपा गया था। हमारे प्रतिनिधिमंडल ने डॉ. रमन सिंह के साथ दो घंटे लंबी बैठक की। अपने सेवा करियर में मुझे ऐसा कोई मुख्यमंत्री नहीं मिला, जिसे नक्सलवाद की समस्या की इतनी विस्तृत जानकारी हो। उन्होंने स्वीकार किया कि सलवा जुडूम का भंग होना नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई में एक झटका था। लेकिन उनके नेतृत्व में छत्तीसगढ़ राज्य में नक्सलवाद को काफी हद तक कमजोर कर दिया। इसके लिए उनके द्वारा किए गए विकास के कार्य जिम्मेवार थे।
पीएम मोदी ने नक्सलवाद को माना गंभीर खतरा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नक्सलवाद को 2014 के बाद से देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे गंभीर खतरा माना। वर्ष 2019 से गृह मंत्री अमित शाह ने भारत से नक्सलवाद के खतरे को समाप्त करने पर विशेष ध्यान दिया है। पिछले दो सालों में नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई निर्णायक दौर में पहुंच चुकी है, जिसका मकसद है कि पिछले साठ साल से जारी हिंसा को साल 2026 तक खत्म किया जाए।
अपने योद्धाओं के समर्थन में हों एकजुट
इस संदर्भ में, यह कल्पना करना कठिन नहीं है कि यदि देश के सभी अंग एकजुट होकर कार्य करते तो नक्सलवाद के विरुद्ध भारत की लड़ाई इस खतरे को बहुत पहले समाप्त कर सकती थी। नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई ग्रे जोन वारफेयर के समान है, जहां ब्लैक एंड व्हाइट में कुछ भी नहीं है। हां, देरी तो हुई है लेकिन अब हम भारतीयों को नक्सलियों के खिलाफ और अपने योद्धाओं के समर्थन में एकजुट होना चाहिए।
















