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CSDS की कांग्रेस से नजदीकी और समाज को तोड़ने का खेल

सीएसडीएस, जो सामाजिक विज्ञान अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए बना था, अब इसपर जनता का पैसा लेकर समाज को बांटने का आरोप है। इसकी डेटा नीतियां, कांग्रेस से नजदीकी और विभाजनकारी सर्वे भारत की एकता और लोकतंत्र को नुकसान पहुंचा रहे हैं

Written byआशीष कुमार 'अंशु'आशीष कुमार 'अंशु'
Aug 21, 2025, 10:29 am IST
inभारत, विश्लेषण

सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) का स्थापना (1963) के साथ से ही सामाजिक विज्ञान के क्षेत्र में बड़ा नाम रहा है। लेकिन अब इसके कामकाज, फंडिंग और कथित तौर पर कांग्रेस से नजदीकी पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि यह संस्थान सरकारी पैसे से चलता है, लेकिन इसके सर्वे समाज में जाति और धर्म के आधार पर फूट डालते हैं। यह रिपोर्ट सीएसडीएस की फंडिंग, डेटा की गुप्तता और कांग्रेस के साथ इसके कथित रिश्ते को उजागर करती है, जो भारत के सामाजिक ढांचे और लोकतंत्र को नुकसान पहुंचा सकता है।

सरकारी पैसा: जनता के टैक्स का दुरुपयोग?

सीएसडीएस को केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के तहत भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएसएसआर) से भारी फंड मिलता है। 7 अगस्त, 2023 को संसद में बताया गया कि तीन साल में सीएसडीएस को 13 करोड़ रुपये दिए गए। इसकी 67% फंडिंग केंद्र सरकार से आती है। इतने बड़े पैमाने पर जनता का पैसा लगने के बाद यह उम्मीद की जाती है कि सीएसडीएस निष्पक्ष और पारदर्शी होगा। लेकिन, यह अपने सर्वे का कच्चा डेटा सार्वजनिक नहीं करता, जबकि दूसरों से पारदर्शिता की मांग करता है, जैसे कि चुनाव आयोग से।

सामाजिक टिप्पणीकार दिलीप मंडल कहते हैं कि सीएसडीएस जनता के पैसे का इस्तेमाल समाज को बांटने वाले कथानकों को बढ़ाने में करता है। सवाल उठता है कि क्या यह संस्थान वाकई जनता के हित में काम कर रहा है?

कांग्रेस से रिश्ता: रजनी कोठारी से संजय कुमार तक

सीएसडीएस का इतिहास उन लोगों से भरा है, जिन पर कांग्रेस के साथ नजदीकी का आरोप है। संस्थापक रजनी कोठारी कांग्रेस की विचारधारा के करीब माने जाते थे। यह सिलसिला योगेंद्र यादव, अभय कुमार दुबे और संजय कुमार जैसे शोधकर्ताओं तक चला। संजय कुमार, जो सीएसडीएस के लोकनीति कार्यक्रम के सह-निदेशक हैं, हाल ही में विवादों में घिरे। 17 अगस्त, 2025 को उन्होंने एक्स पर महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 2024 के मतदाता आंकड़ों में भारी अंतर का दावा किया। उन्होंने कहा कि नासिक पश्चिम में 47.38% और हिंगना में 43.08% मतदाता बढ़े, जबकि रामटेक और देओलाली में भारी गिरावट आई।

17 अगस्त को राहुल गांधी ने बिहार की यात्रा शुरू की। उसी दिन टाइम्स आफ इंडिया में संजय कुमार का एक लेख, ‘व्हाट ए क्लेश एसआईआरजी, व्हाय द अपोजिशन — ईसी फ्यूड इज अनलाइक एनी बिफोर’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ। इस पूरे लेख में संजय कुमार ने राहुल गांधी की वकालत की है और चुनाव आयोग की आलोचना। इस आलेख को एक्स पर साझा करते हुए संजय कुमार ने वोट चोरी और राहुल एक्सपोज वोट चोरी का हैशटैग लगाया है। यही उस दिन कांग्रेस का भी हैश टैग था। उन्होंने अपने इस लेख को कांग्रेस विचारक योगेन्द्र यादव को टैग भी किया। पोस्ट का समय, जो राहुल गांधी की बिहार यात्रा के दिन था, और ‘वोट चोरी’ जैसे हैशटैग का इस्तेमाल, जो उस दिन कांग्रेस का भी हैश टैग था। यह सवाल उठाता है कि क्या यह सब सुनियोजित था।

कांग्रेस नेताओं, जैसे राहुल गांधी और पवन खेड़ा, ने संजय के कंटेन्ट को “वोट चोरी” का आरोप लगाने के लिए इस्तेमाल किया। लेकिन 19 अगस्त को उन्होंने माफी मांगते हुए पोस्ट हटा ली, यह कहकर कि उनकी टीम ने डेटा गलत पढ़ा। अब ऐसे में संजय कुमार पर भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस के ‘फर्जी कथानक’ को बढ़ावा देने का आरोप लगाती है तो इसमें गलत क्या है?

दोहरा मापदंड

सीएसडीएस पर सबसे बड़ा आरोप है कि यह अपने सर्वे का रॉ डेटा सार्वजनिक नहीं करता। यह चुनाव आयोग से पारदर्शिता मांगता है, लेकिन खुद डेटा देने के लिए मोटी रकम मांगता है। इससे लाखों छात्रों और शोधकर्ताओं को नुकसान होता है, जो इस डेटा पर काम करना चाहते हैं।

बिना रॉ डेटा के, सीएसडीएस के दावों की सत्यता जांचना असंभव है। उदाहरण के लिए, 2024 के सोशल एंड पॉलिटिकल बैरोमीटर प्रीपोल सर्वे में दावा किया गया कि 56.9% भारतीय चाहते हैं कि मुसलमानों को भी अनुसूचित जाति (एससी) आरक्षण मिले। यह सर्वे संवैधानिक ढांचे को कमजोर कर सकता है। सवाल यह है कि यह सर्वे सिखों और बौद्धों को शामिल किए बिना सिर्फ हिंदुओं पर केंद्रित क्यों था? और डेटा क्यों छिपाया गया? इन सवालों का जवाब सीएसडीएस को देना चाहिए और सर्वे का सारा रॉ डेटा सार्वजनिक करना चाहिए।

समाज को बांटने का खेल

सीएसडीएस के सर्वे और खासकर 1997 में सीएसडीएस के ही तत्वावधान में प्रारंभ हुए शोध कार्यक्रम ‘लोकनीति’ के अन्तर्गत हुए सर्वे, पर जाति और धर्म के आधार पर मतदान पैटर्न को उजागर करने का आरोप है। इसके आंकड़े बताते हैं कि जाटव, पासी, यादव या ब्राह्मण कैसे वोट देते हैं, जिससे समुदायों में अविश्वास बढ़ता है। ये आंकड़े अखबारों, किताबों और शोध पत्रों में इस्तेमाल होते हैं, जिससे समाज में फूट पड़ती है। 2024 का सर्वे, जो कहता है कि लोग मुसलमानों को एससी आरक्षण देना चाहते हैं, दलितों के अधिकारों को खतरे में डाल सकता है। सीएसडीएस को बताना चाहिए- यह सवाल, जो कभी चुनावी मुद्दा नहीं था, क्यों पूछा गया? क्या इसका मकसद कांग्रेस की नीतियों को समर्थन देना था?

विदेशी फंडिंग: भारत को तोड़ने की साजिश?

सीएसडीएस को फोर्ड फाउंडेशन और आईडीआरसी (कनाडा) जैसे विदेशी संगठनों से भी फंडिंग हुई है। जिनके पीछे गेट्स फ़ाउंडेशन, डीएफ़आईडी (यूके), नॉराड (नॉर्वे), ह्यूलेट फ़ाउंडेशन और डच एजेंसियां जैसी वैश्विक थिंक टैंक हैं। इनका इतिहास बताता है कि ये किसी सुधार के लिए दान करने वाले दाता नहीं हैं। पैसा देते हुए इनका एजेन्डा स्पष्ट है। ये संगठन भारत को जाति और धर्म के आधार पर बांटना चाहते हैं, क्योंकि भारत एक वैश्विक शक्ति बन रहा है। यह समझना कोई रॉकेट साइंस नहीं है कि ऐसे सर्वे, जो हिंदुओं को जातियों में बांटते हैं और मुसलमानों को एक समूह के रूप में दिखाते हैं, समाज में तनाव पैदा करते हैं।

आईसीएसएसआर का एक्शन: जवाबदेही की मांग

19 अगस्त, 2025 को आईसीएसएसआर ने सीएसडीएस को ‘डेटा हेरफेर’ और ‘चुनाव आयोग की विश्वसनीयता को कमजोर करने’ के लिए कारण बताओ नोटिस जारी किया। संजय कुमार के गलत दावों के बाद नागपुर पुलिस ने उनके खिलाफ एफआईआर भी दर्ज की। अब मांग उठ रही है कि सीएसडीएस का फंड रोका जाए और संस्था को अपना रॉ डेटा सार्वजनिक करने को मजबूर किया जाए।

जनता के विश्वास से खिलवाड़

सीएसडीएस, जो सामाजिक विज्ञान अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए बना था, अब इसपर जनता का पैसा लेकर समाज को बांटने का आरोप है। इसकी डेटा नीतियां, कांग्रेस से नजदीकी और विभाजनकारी सर्वे भारत की एकता और लोकतंत्र को नुकसान पहुंचा रहे हैं। आईसीएसएसआर और चुनाव आयोग के कदमों के बीच जनता जवाब मांग रही है। सरकारी फंड लेने वाला संस्थान डेटा क्यों छिपाता है? और यह किसके हितों की सेवा करता है? जब तक ये सवाल अनुत्तरित हैं, सीएसडीएस की साख खतरे में रहेगी।

Topics: Sanjay Kumarसीएसडीएस फंडिंग और विवादसीएसडीएस और कांग्रेस नजदीकीसंजय कुमार वोट चोरीआईसीएसएसआर और सीएसडीएसफोर्ड फाउंडेशनचुनावी डेटा में हेरफेरझूठा विमर्शCSDS funding and controversy
आशीष कुमार 'अंशु'
आशीष कुमार 'अंशु'
आशीष कुमार अंशु पत्रकार, लेखक व सामाजिक कार्यकर्ता हैं। आम आदमी के सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों तथा भारत के दूरदराज में बसे नागरिकों की समस्याओं पर अंशु ने लम्बे समय तक लेखन व पत्रकारिता की है। अंशु मीडिया स्कैन ट्रस्ट के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं और दस वर्षों तक मानवीय विकास से जुड़े विषयों की पत्रिका सोपान STEP से जुड़े रहे हैं। [Read more]
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