संपूर्ण भारतवर्ष में रक्षाबंधन का यह पर्व विभिन्न नाम और स्वरूप प्रचलित है। रक्षाबंधन को श्रावणी भी कहते हैं। पंजाब में रक्षाबंधन पर्व राखड़ी या राखरी के रूप में, गुजरात में इस त्यौहार को पवित्रोपन्ना के रूप में, पश्चिम बंगाल में झूलन पूर्णिमा, तमिल में राखी विझा, उत्तर प्रदेश, बिहार झारखंड में रक्षाबंधन, उत्तरांचल में श्रावणी, महाराष्ट्र में नाराली या नारियल पूर्णिमा, तमिलनाडु में अवनी अवित्तम, आंध्र प्रदेश तेलंगाना में राखी पूर्णिमा, केरल में सुथा पूर्णिमा और उड़ीसा में गम्हा पूर्णिमा के रुप में मनाई जाती है।
राजस्थान में रक्षाबंधन की लुंबा राखी परंपरा
जबकि राजस्थान में रक्षाबंधन रामराखी चूड़ाराखी और लुंबा राखी के नाम से प्रसिद्ध है। लुंबा राखी की परंपरा अनोखी है इसमें बड़े भाई के साथ-साथ भाई की पत्नी यानि भाभी की कलाई पर भी राखी बांधते हैं, इसे लुंबा राखी कहा जाता है। भाभी, भाई की अर्धांगिनी होती है इसलिए उन्हें भी राखी बांधी जाती है और तभी यह त्यौहार पूरा माना जाता है। वस्तुतः अमरनाथ की यात्रा गुरु पूर्णिमा से प्रारंभ होकर रक्षाबंधन पर समाप्त होती है।
मध्य भारत में कजरी पूर्णिमा का पर्व
मध्य प्रदेश उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कजरी पूर्णिमा के रूप में भी इस उत्सव को मनाया जाता है। बुंदेलखंड में तो रक्षाबंधन के दूसरे दिन कजलियों का त्यौहार मनाया जाता है, जिसका उल्लेख महान् कवि जगनिक के आल्हा खंड में मिलता है, तदनुसार यह पर्व भाई और बहिन के प्रेम और विजय का प्रतीक है। इस दिन बहनें कजलियां (भुजरियां) सिराने जाती हैं और तब तक ना वह भोजन ग्रहण करती हैं, ना ही वह कंघी करती हैं।
जनजातियों में रक्षाबंधन का स्वरूप
भारतीय जनजातियों में भी यह त्यौहार प्रमुखता से मनाया जाता है। जनजाति समाज कुल देवता की उपासना के उपरांत तेंदू के लकड़ी, शतावर और भेलवां के पत्ते की पूजा कर उसे राखी बांधते हैं, इसे राखी खूंटा कहा जाता है। जनजातियों के पुरोहित बैगाओं का विश्वास है कि राखी खूंटा को खेतों में लगाने के से न केवल उन्नत फसल होती है वरन् बुरी नजर नहीं लगती है।
सैनिकों और जैन समाज में रक्षाबंधन
भारत की बहिनें सीमा पर तैनात सैनिकों को अपना भाई मानती हैं और उन्हें प्रतिवर्ष राखी भेजते हैं। यह त्यौहार जैन समाज में भी प्रचलित है, उनके मतानुसार इस दिन विष्णु कुमार नामक मुनिराज ने 700 जैन मुनियों की रक्षा की थी।
रक्षाबंधन का संदेश और महत्व
रक्षाबंधन पर्व हम सभी देशवासियों का प्रमुख पर्व है, और यही प्रेरणा देता है कि हम देश व धर्म की रक्षा के लिए कृत संकल्पित हों। यह धर्मनिरपेक्ष पर्व है, तो आईये रक्षाबंधन के पवित्र और पुनीत पर्व पर जाति – धर्म की बेड़ियों से ऊपर उठकर एक दूसरे को इस संकल्प के साथ रक्षासूत्र बांधें कि भारत को समर्थ भारत-समरस भारत – श्रेष्ठ भारत बनाएंगे। रक्षाबंधन पर्व वसुधैव कुटुम्बकम् के आलोक में संपूर्ण विश्व को यही संदेश देता है कि
“ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै।”
वर्ष 2025 का विशेष संयोग
इस वर्ष भी रक्षाबंधन के त्योहार पर भद्रा काल के प्रभाव पढ़ने की बात की गई है, परंतु आपको चिंता करने की आवश्यकता ही नहीं है, क्योंकि इस वर्ष भद्रा काल 8 अगस्त अपरान्ह 2:12 बजे से लेकर 9 अगस्त रात के 1:52 तक रहेगा। आप 9 अगस्त को पूरे दिन राखी का त्योहार मना सकते हैं। हिंदू धर्म में पंचांग का अधिक महत्व माना जाता है, दरअसल वैदिक पंचांग के अनुसार वर्ष 1930 में 9 अगस्त, दिन शनिवार को राखी का त्योहार मनाया गया था।
वर्ष 2025 में 95 वर्ष बाद वही दुर्लभ संयोग बना है, जैसा सन् 1930 में 9 अगस्त को शनिवार के दिन राखी पर बना था। तब भी पूर्णिमा, श्रवण नक्षत्र, ‘सौभाग्य योग ‘और बव-बालव करण का मेल हुआ था। अब 2025 में वही ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति बन रही है, जो इस दिन को और भी पावन और महत्वपूर्ण बना देती है। यह एक अद्भुत ज्योतिषीय संयोग है, जो आने वाले वर्षों में फिर देखने को दुर्लभ ही मिलेगा।













