संस्कृति

राष्ट्रीय विज्ञान दिवस विशेष : वैदिक मनीषी जिनकी वैज्ञानिक मेधा से चमत्कृत है समूचा विश्व

राष्ट्रीय विज्ञान दिवस पर जानें वैदिक भारत के महर्षि कणाद, अगस्त्य, चरक और सुश्रुत के आश्चर्यजनक आविष्कारों के बारे में, जिन्होंने आधुनिक विज्ञान की नींव रखी। पूरी कहानी पढ़ें।

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पूनम नेगी

आज हमारी वैज्ञानिक उपलब्धियों पर समूचा विश्व चमत्कृत है। समूची दुनिया में भारतीय मेधा की जबर्दस्त मांग है। चाहे अंतरिक्ष की उपलब्धियों की बात हो, सैन्य उपकरणों का क्षेत्र हो या फिर अभियांत्रिकी और चिकित्सा विज्ञान; प्रत्येक क्षेत्र में हमारे वैज्ञानिकों ने सफलता के नये नये प्रतिमान स्थापित किये हैं। विकसित देश हमारी युवा प्रतिभाओं को मोटे पैकेज का प्रलोभन देकर अपनी ओर आकर्षित करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे। हमारे देश को “सोने की चिड़िया” और “देवभूमि” जैसे विशेषण यूं ही नहीं मिले। इसके पीछे हमारे ऋषि-मनीषियों गहन चिंतन और उत्कृष्ट ज्ञान-विज्ञान निहित था। काबिलेगौर हो कि जिस समय यूरोप की घुमक्कड़ जातियां खानाबदोशों जैसा जीवन जी रही थीं, उस समय भारत का ज्ञान विज्ञान व तकनीकी कौशल अपने चरम उत्कर्ष पर पहुंच चुका था। पुरातात्विक उत्खनन इस बात की गवाही देते हैं कि ज्ञान-विज्ञान की दृष्टि से सिंध घाटी की सभ्यता अत्यन्त विकसित सभ्यता थी। प्राचीन भारत में खगोल, गणित, ज्योतिष, भौतिकी, रसायन विज्ञान, चिकित्सा, धातु व भवन निर्माण आदि क्षेत्रों में चंहुमुखी प्रगति हुई थी। राष्ट्रीय विज्ञान दिवस (28 फरवरी) के अवसर पर आइए चर्चा करते हैं वैदिक भारत के ऐसे महान आविष्कारक ऋषियों की, जिनकी उपलब्धियों पर आधुनिक वैज्ञानिक प्रगति की आधारशिला टिकी हुई है।

महर्षि कणाद

परमाणु बम के बारे में आज सभी जानते हैं। वर्तमान पीढ़ी के लोग इस बम का आविष्कारक विख्यात अमेरिकी भौतिक विज्ञानी जे. रॉबर्ट ओपनहाइमर को मानते हैं जिन्होंने वर्ष 1945 को इसका सफल परीक्षण किया था; हालांकि परमाणु सिद्धांत का जनक इंग्लैंड के रसायन विज्ञानी जॉन डाल्टन को माना जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि वैदिक भारत के महर्षि कणाद छठी शताब्दी ईसा पूर्व में ही इस बात को सिद्ध कर दिया था कि विश्व का हर पदार्थ परमाणुओं से मिलकर बना है। उन्होंने परमाणुओं की संरचना, प्रवृत्ति तथा प्रकारों पर भी व्यापक शोध की थी। इस बारे में प्राचीन तथा मध्यकालीन भारत के संस्कृत भाषा में विविध ग्रंथों में विस्तृत उल्लेख मिलता है। विख्यात पाश्चात्य इतिहासज्ञ टीएन कोलब्रुक के अनुसार परमाणु सिद्धांत के जनक ऋषि कणाद की गिनती संसार के सबसे प्राचीन वैज्ञानिक चिंतकों में होती है। टीएन कोलब्रुक ने लिखा है कि अणु शास्त्रज्ञ जॉन डाल्टन के 2500 वर्ष पूर्व ही भारतीय चिन्तक आचार्य कणाद ने बता दिया था कि द्रव्य के परमाणु होते हैं। इस तरह कणाद ऋषि के लिखे वैदिक सूत्रों के आधार पर आधुनिक विश्व में परमाणु सिद्धांत का प्रतिपादन हुआ।

महर्षि अगस्त्य

हाँ यह सच है कि आधुनिक विश्व में बिजली के आविष्कारक का श्रेय अमेरिकी विद्वान थॉमस एल्वा एडिसन को जाता है लेकिन महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इस क्रांतिकारी अविष्कार से वर्षों पूर्व भारतभूमि का एक महान ऋषि इसके सूत्र खोज चुका था। यह भारतीय विभूति थी महर्षि अगस्त्य, जिनकी गणना सप्तर्षियों में की जाती है। महर्षि अगस्त्य द्वारा रचित “अगस्त्य संहिता” ग्रंथ में विद्युत उत्पादन से संबंधित आश्चर्यजनक प्रयोग दिया गया है- एक मिट्टी का पात्र लें, उसमें ताम्र पट्टिका डालें तथा शिखिग्रीवा डालें, फिर बीच में गीली काष्ट पांसु लगायें, ऊपर पारा तथा दस्त लोष्ट डालें, फिर तारों को मिलाएंगे तो उससे मित्रावरुणशक्ति (विद्युत) का उदय होगा। अगस्त्य संहिता में विद्युत का उपयोग इलेक्ट्रोप्लेटिंग के लिए करने का भी विवरण मिलता है। उन्होंने बैटरी द्वारा तांबा या सोना या चांदी पर पॉलिश चढ़ाने की विधि भी खोजी थी।

आचार्य चरक

आयुर्वेद के आचार्य महर्षि चरक की गणना भारतीय औषधि विज्ञान के मूल प्रवर्तकों में होती है। ऋषि चरक ने 300-200 ईसा पूर्व आयुर्वेद का महत्वपूर्ण ग्रंथ ‘चरक संहिता’ की रचना की थी। आचार्य चरक ने शरीरशास्त्र, गर्भशास्त्र, रक्ताभिसरण शास्त्र, औषधि शास्त्र इत्यादि विषय में गंभीर शोध किया था तथा मधुमेह, क्षयरोग, हृदयविकार आदि रोगों के निदान एवं औषधोपचार का अमूल्य ज्ञान दिया था। उन्होंने रोगों के निदान का उपाय और उससे बचाव का तरीका बताया, साथ ही उन्होंने अपने ग्रंथ में इस तरह की जीवनशैली का भी वर्णन किया जिसमें कि कोई रोग हो ही न। बताते चलें कि आठवीं शताब्दी में चरक संहिता का अरबी भाषा में अनुवाद हुआ और वहां से होता हुआ यह शास्त्र पश्चिमी देशों तक जा पहुंचा।

महर्षि सुश्रुत

महर्षि सुश्रुत सर्जरी के आविष्कारक माने जाते हैं। आज से 2600 साल पहले ही उन्होंने प्रसव, मोतियाबिंद, कृत्रिम अंग लगाना, पथरी का इलाज और प्लास्टिक सर्जरी जैसी कई तरह की जटिल शल्य चिकित्सा के सिद्धांत प्रतिपादित किये थे। आधुनिक विज्ञान केवल 400 वर्ष पूर्व ही शल्य क्रिया करने लगा है; लेकिन सुश्रुत ने 2600 वर्ष पर यह कार्य करके दिखा दिया था। सुश्रुत के पास अपने बनाए उपकरण थे जिन्हें वे उबालकर प्रयोग करते थे। महर्षि सुश्रुत द्वारा लिखित ‘सुश्रुत संहिता’ में शल्य चिकित्सा से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है। इस ग्रंथ में चाकू, सुइयां, चिमटे इत्यादि 125 से भी अधिक शल्य चिकित्सा उपकरणों के नाम मिलते हैं और इस ग्रंथ में लगभग 300 प्रकार की शल्य क्रियाओं का उल्लेख मिलता है।

महर्षि नागार्जुन

वैदिक भारत के आचार्य महर्षि नागार्जुन ने रसायन शास्त्र और धातु विज्ञान पर बहुत गहन शोध कार्य किया था। रसायन शास्त्र पर इन्होंने कई पुस्तकों की रचना की जिनमें “रस रत्नाकर” और “रसेन्द्र मंगल” बहुत प्रसिद्ध हैं। रसायनशास्त्री व धातुकर्मी होने के साथ-साथ इन्होंने अपनी चिकित्सकीय सूझ-बूझ से अनेक असाध्य रोगों की औषधियां तैयार कीं। चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में इनकी प्रसिद्ध पुस्तकें हैं-‘कक्षपुटतंत्र’, ‘आरोग्य मंजरी’, ‘योग सार’ और ‘योगाष्टक’। नागार्जुन द्वारा विशेष रूप से सोना एवं पारे पर किए गए शोध चर्चा में रहे। उन्होंने पारे पर संपूर्ण अध्ययन कर सतत 12 वर्ष तक संशोधन किया। नागार्जुन पारे से सोना बनाने का फॉर्मूला जानते थे। पश्चिमी देशों में नागार्जुन के पश्चात जो भी प्रयोग हुए उनका मूलभूत आधार नागार्जुन के सिद्धांत ही रहे।

गणितज्ञ ब्रह्मगुप्त

महान वैज्ञानिक बंट्रेंड रसेल से जब यह पूछा गया कि विज्ञान के क्षेत्र में भारत की सबसे महत्वपूर्ण देन क्या है, तो उन्होंने सीधा उत्तर दिया ‘जीरो’। ‘जीरो’ यानी शून्य युक्त दाशमिक स्थानमान अंक पद्धति भारतीय गणितज्ञ ब्रह्मगुप्त का सबसे बड़ा मौलिक आविष्कार माना जाता है। शून्य से दाशमिक स्थानमान अंक पद्धति निकली। शून्ययुक्त यह अंक पद्धति भारत की विश्व को सबसे बड़ी बौद्धिक देन है। आज सम्पूर्ण विश्व में इसी अंक पद्धति का उपयोग होता है। यह अंक पद्धति अरबों के माध्यम से यूरोप पहुंचकर ‘अरबी अंक पद्धति बन गयी और अंततः ‘अन्तर्राष्ट्रीय अंक पद्धति बन गयी। भारतीय संविधान में इस अंक पद्धति को ‘भारतीय अन्तर्राष्ट्रीय अंक पद्धति’ कहा गया है।

आचार्य भास्कराचार्य

न्यूटन से 500 वर्ष पूर्व भारतीय मनीषी आचार्य भास्कराचार्य ने गुरुत्वाकर्षण के नियम को जान लिया था। अपने ग्रंथ “सिद्धांत शिरोमणि” में गुरुत्वाकर्षण के नियम के संबंध में उन्होंने लिखा है, “पृथ्वी अपने आकाश का पदार्थ स्वशक्ति से अपनी ओर खींच लेती है। इस कारण आकाश का पदार्थ पृथ्वी पर गिरता है। इससे सिद्ध होता है कि पृथ्वी में गुरुत्वाकर्षण की शक्ति है।” इसी तरह भास्कराचार्य के ग्रंथ “लीलावती” में गणित और खगोल विज्ञान संबंधी विषयों पर प्रकाश डाला गया है। सर्वप्रथम भास्कराचार्य ने ही बताया कि जब चन्द्रमा सूर्य को ढक लेता है तो सूर्यग्रहण तथा जब पृथ्वी की छाया चन्द्रमा को ढंक लेती है तो चन्द्रग्रहण होता है। लोगों को गुरुत्वाकर्षण, चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण की सटीक जानकारी मिलने का यह पहला लिखित प्रमाण था। जानना दिलचस्प हो कि आज प्राचीन भारत के सुप्रसिद्ध खगोलशास्त्री भास्कराचार्य द्वारा लिखित ग्रंथों का अनुवाद अनेक विदेशी भाषाओं में किया जा चुका है। इन ग्रंथों ने अनेक विदेशी विद्वानों को भी शोध का नया रास्ता दिखाया है।

ऋषि बोधायन

भले ही आज दुनिया भर में यूनानी ज्यमितिशास्त्री पाइथागोरस और यूक्लिड के सिद्धांत पढ़ाए जाते हैं लेकिन यह जानना दिलचस्प होगा कि भारत के प्राचीन गणितज्ञ बोधायन ने पाइथागोरस के सिद्धांत से पहले यानी 800 ईसा पूर्व शुल्ब तथा श्रौत सूत्र की रचना कर रेखागणित व ज्यमिति के महत्वपूर्ण नियमों की खोज की थी। उस समय भारत में रेखागणित, ज्यामिति या त्रिकोणमिति को शुल्व शास्त्र कहा जाता था। वैदिक साक्ष्य बताते हैं कि शुल्व शास्त्र के आधार पर विविध आकार-प्रकार की यज्ञवेदियां बनायी जाती थीं। दो समकोण समभुज चौकोन के क्षेत्रफलों का योग करने पर जो संख्या आएगी उतने क्षेत्रफल का ‘समकोण’ समभुज चौकोन बनाना और उस आकृति का उसके क्षेत्रफल के समान के वृत्त में परिवर्तन करना; इस प्रकार रेखागणित व ज्यमिति की विभिन्न कठिन गुत्थियों को ऋषि बोधायन ने ही सर्वप्रथम सुलझाया था।

आचार्य पतंजलि

आचार्य पतंजलि को भारत का पहला मनोवैज्ञानिक चिकित्सक माना जाता है। योगसूत्र के रचनाकार पतंजलि के ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में लिखे तीन प्रमुख ग्रंथ हैं- योगसूत्र, पाणिनी के अष्टाध्यायी पर भाष्य और आयुर्वेद पर ग्रंथ। आचार्य पतंजलि संभवत: पुष्यमित्र शुंग (195-142 ईपू) के शासनकाल में थे। राजा भोज ने इन्हें तन के साथ मन का भी चिकित्सक कहा है। पतंजलि ने योगशास्त्र को चिकित्सा और मनोविज्ञान से जोड़ा। आज जिस तरह दुनियाभर में लाखों लोग योग से लाभ पा रहे हैं उसका श्रेय पतंजलि को जाता है। पतंजलि रसायन विद्या के विशिष्ट आचार्य थे- अभ्रक, धातुयोग और लौहशास्त्र इन्ही की देन है।

आचार्य पाणिनी

दुनिया का पहला व्याकरण पाणिनी ने लिखा। 500 ईसा पूर्व पाणिनी ने भाषा के शुद्ध प्रयोगों की सीमा का निर्धारण किया। उन्होंने भाषा को सबसे सुव्यवस्थित रूप दिया और संस्कृत भाषा का व्याकरणबद्ध किया। इनके व्याकरण का नाम है अष्टाध्यायी जिसमें आठ अध्याय और लगभग चार सहस्र सूत्र हैं। व्याकरण के इस महनीय ग्रंथ में पाणिनी ने संस्कृत भाषा के 4000 सूत्र बहुत ही वैज्ञानिक और तर्कसिद्ध ढंग से संग्रहीत किए हैं। अष्टाध्यायी मात्र व्याकरण ग्रंथ नहीं है। इसमें तत्कालीन भारतीय समाज का पूरा चित्र मिलता है। उस समय के भूगोल, सामाजिक, आर्थिक, शिक्षा और राजनीतिक जीवन, दार्शनिक चिंतन, खान-पान, रहन-सहन आदि के प्रसंग स्थान-स्थान पर अंकित हैं। यूरोप के एक भाषा विज्ञानी फ्रेंज बॉप (14 सितंबर 1791- 23 अक्टूबर 1867) ने पाणिनी के कार्यों पर शोध किया। उन्हें पाणिनी के लिखे हुए ग्रंथों तथा संस्कृत व्याकरण में आधुनिक भाषा प्रणाली को और परिपक्व करने के सूत्र मिले। आधुनिक भाषा विज्ञान को पाणिनी के लिखे ग्रंथ से बहुत मदद मिली।

 

 

 

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