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हिंदुओं के कुम्भ के अवसर पर जारी है कम्युनिस्ट मीडिया का प्रपंच

महाकुंभ 2025 पर विदेशी मीडिया ने इसे अपने प्रपंच का रंग देने की कोशिश की। बीबीसी और अन्य मीडिया ने नागा साधुओं के इतिहास को गलत संदर्भ में पेश किया। जानिए प्रयागराज के ऐतिहासिक महत्व और महाकुंभ की महत्ता

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा
Jan 19, 2025, 10:00 pm IST
in भारत, विश्लेषण

विश्व के सबसे बड़े धार्मिक मेले अर्थात कुम्भ के अवसर पर जहां एक तरफ हिन्दू तथा सनातन को मानने वाले विदेशी लगातार कुम्भ को लेकर श्रद्धा से भरे हुए हैं, स्नान कर रहे हैं एवं उस विशाल और समृद्ध इतिहास का अंग बनकर स्वयं को कृतज्ञ अनुभव कर रहे हैं, कि उन्हें इस विशाल इतिहास बनने का अवसर प्राप्त हुआ तो वहीं विदेशी मीडिया इस भव्य आयोजन की महत्ता को निम्न करने के लिए नए-नए प्रपंच कर रहा है।

हालांकि ऊपर से यह सब यही दिखता है कि वे कुम्भ की प्रशंसा कर रहे हैं और हिंदुओं के विशाल धार्मिक जमावड़े की युगों पुरानी परंपरा का आदर कर रहे हैं, मगर उनकी कवरेज को ध्यान से पढ़ने पर यह ज्ञात होता है कि वे इस कुम्भ की व्यवस्था को राजनीतिक जामा पहना रहे हैं।

सबसे पहले बात बीबीसी की। बीबीसी की पत्रकार गीता पांडेय ने महाकुंभ के कवरेज को लिखते हुए नागा साधुओं को “Naked ash-smeared ascetics to lead India bathing spectacle” अर्थात बीबीसी ने उन नागा साधुओं को नग्न, और राख से सने बताया, जिनकी साधना और जीवन अत्यंत कठोर होता है। नागा साधुओं का इतिहास भी समृद्ध रहा है और उन्होनें कुतुबउद्दीन ऐबक, अहमद शाह अब्दाली और औरंगजेब सहित कई आतताइयों का सामना किया था और उन्हें घुटने टेकने पर विवश कर दिया था। 1260 में गुलाम वंश की सेना ने जब कनखल पर हमला किया था, तो नागा साधुओं की सेना गुलाम वंश की सेना पर टूट पड़ी थी और 5,000 से अधिक नागा साधुओं ने अपने प्राणों का बलिदान दिया था और 22 हजार नागा साधुओं की सेना ने वीरता से युद्ध करके विजय प्राप्त की थी।

अहमद शाह अब्दाली की सेना ने जब 1756-57 में मथुरा पर हमला करके हिंदुओं को मारना शुरू किया था, तो नागा साधुओं ने अब्दाली की सेना को मथुरा से खदेड़ा था और इसमें भी लगभग दो हजार नागा साधुओं ने अपने प्राणों का बलिदान दिया था।

जिन नागा साधुओं का इतना समृद्ध इतिहास रहा है, जिनकी वीरता और बलिदानों से भारत का इतिहास भरा हुआ है, उनके विषय में बीबीसी ने naked लिखा, यह हिंदुओं के प्रति घृणा की पराकाष्ठा है। और उससे भी बढ़कर कुम्भ को नहाने वाला तमाशा बताया। बीबीसी की इस घृणा की जब आलोचना हुई तो बीबीसी ने चुपके से holy men कर दिया था, मगर इसने यह अवश्य बताया कि बीबीसी की हिंदुओं के प्रति घृणा किस सीमा तक है।

ऐसा नहीं है कि केवल बीबीसी ही रहा हो कुम्भ के प्रति घृणा पैदा करने में। कम्युनिस्ट विदेशी मीडिया ने कुम्भ की तो प्रशंसा की, मगर इसके साथ ही कुम्भ को राजनीतिक जामा पहनाया।

न्यूयॉर्क टाइम्स ने कुम्भ मेले के विषय में लिखा है कि महा कुम्भ मेला हमेशा ही हिन्दू धर्म का महत्वपूर्ण प्रतीक रहा है, मगर हिन्दू राष्ट्र के विचार के उभरने तक इसका राजनीतिक प्रयोग नहीं किया गया था। इसमें इलाहाबाद के प्रयागराज नाम को लेकर भी लिखा है कि अकबर द्वारा दिए गए मुस्लिम नाम को भाजपा के हार्ड लाइन हिन्दू पुजारी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रयागराज से बदल दिया था।

The Washington Post ने भी नागा साधुओं को  naked, ash-smeared monks लिखा है। हालांकि वाशिंगटन पोस्ट ने यह अवश्य लिखा है कि महा कुम्भ विश्व का सबसे बड़ा ऐसा मेला है। इसने लिखा है कि “अधिकारियों के अनुसार, अगले 45 दिनों में प्रयागराज में कम से कम 400 मिलियन लोगों के आने की उम्मीद है – जो संयुक्त राज्य अमेरिका की जनसंख्या से भी ज़्यादा है। यह संख्या पिछले साल वार्षिक हज यात्रा के लिए सऊदी अरब के मुस्लिम पवित्र शहरों मक्का और मदीना में आए 2 मिलियन तीर्थयात्रियों से लगभग 200 गुना ज़्यादा है।“

मगर इसमें भी राजनीतिक लाभ उठाने की बात करते हुए लिखा है कि यह धार्मिक पर्व मोदी के समर्थन आधार को बढ़ाएगा। यह लिखता है कि हालांकि भारत में पहले भी राजनेता हिंदुओं के साथ संबंध मजबूत करने के लिए त्योहारों का सहारा लेते रहे हैं, मगर प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में यह पर्व हिन्दू राष्ट्रवाद की वकालत करने का अभिन्न अंग बन गया है। मोदी और उनकी पार्टी के लिए भारतीय सभ्यता हिन्दू धर्म से अलग नहीं है, हालांकि आलोचक कहते हैं कि पार्टी का दर्शन हिन्दू श्रेष्ठतावाद का है।

इसमें भी इलाहाबाद के प्रयागराज होने का उल्लेख है और यह भी लिखा है कि मोदी सरकार ने हिन्दू धार्मिक नेताओं की आलोचना के डर के कारण 2021 में हरिद्वार में कोरोना के मामलों में वृद्धि के बाद भी कुम्भ रद्द करने से इनकार कर दिया था।

पाकिस्तान के tribune ने भी इसकी प्रशंसा की है, मगर साथ ही यह भी लिखा है कि इस वर्ष का यह आयोजन राजनीतिक है। इस पर्व को हिन्दू एकता का प्रतीक माना जाता है और मोदी के नेतृत्व में इस पर्व का आयोजन बहुत भव्य हुआ है और यह राजनीतिक महत्व और राजनीतिक प्रतीकवाद दोनों ही मामलों मे बहुत बड़े पैमाने पर है।

इसमें लिखा गया है कि इस बार के कुम्भ में विवाद भी हैं क्योंकि पहली बार मुस्लिमों को वहाँ पर स्टॉल लगाने से रोका गया है और कथित रूप से मुस्लिम टैक्सी ड्राइवर्स को निर्देश दिया गया है कि वे तीर्थयात्रियों को न लेकर आएं।

dw,com में भी संवाददाता आदिल भट ने यह तो बताया कि प्रयागराज में माहौल बहुत ही जीवंत और उत्साह से भरा हुआ है, मगर हर ओर प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री योगी के बिलबोर्डस लगे हुए हैं, जो भारतीय जनता पार्टी के हैं। कई आलोचकों का तर्क यह है कि इससे यह बताने का प्रयास किया जा रहा है कि वही इस धार्मिक उत्सव के मामलों के केंद्र में है।

.reuters ने भी अपनी रिपोर्ट में यह कहा है कि इस मेले का प्रयोग प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री योगी अपनी हिन्दू राजनीति की छवि के लिए कर सकते हैं और कर रहे हैं।

सीएनएन ने इलाहाबाद का नाम प्रयागराज करने को मोदी सरकार द्वारा हिन्दू मत के लिए और हिन्दू मत का देश बनाने की तरफ कदम के रूप में बताया है और यह भी लिखा है कि अकबर द्वारा दिए गए नाम इलाहाबाद को बदलकर मोदी सरकार ने भारत की बहुलवादी एवं धर्मनिरपेक्ष देश को हिन्दू राष्ट्र में बदलने की तरफ कदम बढ़ाया था।

कम्युनिस्ट मीडिया इस बात पर बहस क्यों नहीं करता कि आखिर हिंदुओं के इतने प्राचीन नगर प्रयागराज का नाम अकबर को इलाहाबाद करने की आवश्यकता क्यों पड़ी थी? क्या अकबर द्वारा हिंदुओं के प्राचीन नगर प्रयागराज को अलाहाबाद करते हुए यह बात ध्यान में नहीं आई थी कि वह हिंदुओं की पहचान पर सबसे बड़ा आक्रमण कर रहा है और क्यों कम्युनिस्ट मीडिया को यह दिखाई नहीं दे रहा है कि बहुलवाद पर हमला प्रयागराज का नाम अलाहाबाद(इलाहाबाद) करके किया गया था।

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