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लीगी नेहरू, तब्लीगी राहुल

मुस्लिम लीग के साथ कांग्रेस का रिश्ता 1947 से है। मुस्लिम लीग ने 1937 में काउंसिल में जब वंदे मातरम् का विरोध किया, तब नेहरू ने ही इस मुद्दे पर समझौता किया था कि पहले के दो अंतरे ही गाए जाएं

Written byप्रो. कपिल कुमारप्रो. कपिल कुमार
Apr 24, 2024, 07:12 am IST
in भारत, विश्लेषण
केरल की चुनावी सभाओं में राहुल की कांग्रेस हिन्दुओं को धोखा देने की गरज से अपने झंडे का प्रयोग नहीं कर रही है

केरल की चुनावी सभाओं में राहुल की कांग्रेस हिन्दुओं को धोखा देने की गरज से अपने झंडे का प्रयोग नहीं कर रही है

केरल में वायनाड संसदीय सीट से जीतने के लिए राहुल गांधी का मुस्लिम लीग की बैसाखी पर खड़ा होना नई बात नहीं है। उन्होंने तो कांग्रेस-मुस्लिम लीग के संबंधों की परंपरा का ही पालन किया है, जो जवाहर लाल नेहरू ने 1947 से स्थापित की थी। कितने लोगों को यह मालूम है कि स्वयं को ‘दुर्घटनावश हिंदू’ बताने वाले ‘चाचा’ ने पाकिस्तान बनने के बाद भी मुस्लिम लीग के 27 सदस्यों को भारत की संविधान सभा में काम करने दिया था। इनमें से कई 1950 में संविधान पर हस्ताक्षर करने के बाद ही पाकिस्तान गए। यह भारतीयों के साथ एक धोखा था।

‘चाचा’ ने ऐसा क्यों किया?

मुस्लिम लीग के उक्त सदस्यों में से एक को उन सात सदस्यों में शामिल किया गया था, जिनकी कमेटी संविधान का मसौदा बना रही थी। जो मुस्लिम लीगी पाकिस्तान नहीं गए, उन्हें कांग्रेस में बड़े पद दिए गए। सरदार लुतफुर रहमान को एमएलए, सैयद जाफर इमाम और सैयद मजहर इमाम को राज्यसभा का सदस्य बनाया गया। बेगम एजाज रसूल 1935 से ही मुस्लिम लीग की सदस्य थीं और उसके टिकट पर ही संविधान सभा में चुनी गई थीं। 1950 में वे कांग्रेसी हो गईं। ऐसे ढेरों उदाहरण हैं। क्या रातों-रात इनकी मानसिकता बदल गई थी या ये भी उस षड्यंत्र का हिस्सा थे, जिसके तहत ‘लड़ कर लिया है पाकिस्तान, हंस कर लेंगे हिंदुस्तान’ का नारा लगाया गया था?

यही नहीं, जब कश्मीरी पंडितों ने अल्पसंख्यक संरक्षण अधिकारों को सुरक्षित करने में मदद के लिए नेहरू से संपर्क किया था, तब भी उन्होंने यह सलाह थी कि वे ‘सांप्रदायिक मानसिकता वाले’ न बनें और नेशनल कान्फ्रेंस में शामिल हो जाएं।

1947 में जो मुस्लिम पाकिस्तान चले गए थे, उनके घर खाली पड़े हुए थे। लेकिन पाकिस्तान से आए हिंदू और सिख शरणार्थियों को जब ये खाली घर देने का प्रस्ताव आया तो नेहरू ने यह कह कर उसे रद्द कर दिया कि ‘‘हम मुसलमानों के वापस आने का इंतजार करेंगे।’’ इसी दौरान लगभग कई हजार मुस्लिम भोपाल नवाब के क्षेत्र में पहुंच गए थे, यह कहते हुए कि वे जहां जा रहे हैं वह भी पाकिस्तान ही है। लगभग यही स्थिति हैदराबाद में भी थी।

इसी तरह नेहरू ने हिंदुओं को धमकी दी थी कि यदि उन्होंने बिहार के मुजफ्फरपुर में हिंसा नहीं रोकी तो उन पर वायुसेना बम गिराएगी। लेकिन जहां मुसलमान हिंसा कर रहे थे, उन्हें नेहरू ने कभी धमकी नहीं दी। 1947 के बाद नूंह में मेवातीस्तान की मांग उठाने वाले एक छुटभैये नेता को जब पंजाब के मुख्यमंत्री गोपीचंद भार्गव ने दिल्ली पुलिस से गिरफ्तार करवाया तो नेहरू ने सवाल उठाते हुए उन्हें पत्र लिखा। उन्होंने लिखा, ‘‘मैंने श्री प्रकाश को जेल में मिलने भेजा था और उसने वापस आकर बताया कि हमें जेल से बाहर ऐसे लोगों की आवश्यकता है।’’ साथ ही, गोपीचंद भार्गव को उसके मदरसे और बैंक खाता पुन: खोलने के लिए बाध्य किया।

1937 में जब मुस्लिम लीग ने काउंसिल के अंदर वंदे मातरम् गान का विरोध किया, तब नेहरू ने ही समझौता किया था कि केवल पहले के दो अंतरे गाए जाएं। हालांकि सुभाषचंद्र बोस ने नेहरू को साफ-साफ लिखा था, ‘‘साम्प्रदायिक मुसलमानों ने समय-समय पर बेकार के मुद्दे उठाने की आदत बना ली है। कभी मस्जिदों के सामने संगीत, कभी मुसलमानों के लिए उपयुक्त नौकरियां न होना और अब वंदे मातरम्। यद्यपि मैं खुशी से राष्ट्रवादी मुसलमानों द्वारा उठाए गए संशयों और कठिनाइयों से जूझने के लिए तैयार हूं, मेरी उन विषयों की ओर ध्यान देने की तनिक भी अभिलाषा नहीं है, जो सांप्रदायिक लोग उठाते हैं। यदि आप आज उन्हें वंदे मातरम् के मुद्दे पर संतुष्ट भी कर देते हैं, तो वह समय दूर नहीं, जब कल वे कोई नया सवाल लेकर उठ खड़े होंगे, क्योंकि उनका उद्देश्य मात्र साम्प्रदायिक भावनाओं को भड़का कर कांग्रेस को परेशान करना है।’’

मुस्लिम लीग से कांग्रेस का समझौता

नेहरू का यह निर्णय मुस्लिम लीग के प्रति कांग्रेस की उस तुष्टीकरण की नीति को और आगे ले जाना ही था, जो कांग्रेस ने 1916 में लखनऊ में मुस्लिम लीग से समझौता कर अपनाई थी। इस समझौते के अंतर्गत मुसलमानों की पृथक निर्वाचन के आरक्षण की मांग के अलावा यह मांग भी मान ली गई थी कि जब तक किसी सम्प्रदाय विशेष के तीन चौथाई सदस्य काउंसिल में स्वीकृति नहीं देंगे, तब तक उनसे संबंधित कोई भी प्रस्ताव पारित नहीं किया जा सकता।

इसी प्रकार, हिंदू-मुस्लिम एकता के नाम पर खिलाफत को समर्थन देकर कांग्रेस ने यह स्वीकार कर लिया था कि ऐसे इस्लामिक मुद्दे, जिनका भारत से कोई संबंध नहीं है, वे भारतीय मुसलमानों के लिए प्रखर हैं। ऐसे अनेक उदाहरण मौजूद हैं। जैसे- राजगोपालाचारी द्वारा पाकिस्तान पर योजना देना या गांधी जी द्वारा जिन्ना को ‘कायदे आजम’ कहकर संबोधित करना, जबकि उसकी लोकप्रियता नीचे गिर रही थी। इससे पहले भी गांधी एक ‘कमाल’ कर चुके थे।

उन्होंने शुद्धि आंदोलन के नेता स्वामी श्रद्धानंद के हत्यारे अब्दुल रशीद को अपना भाई बताया था। यह भी कहा था कि ‘‘उसने जो भी कुछ किया, वह इस्लाम को बचाने के लिए किया।’’ वह तो अदालत में उसकी पैरवी भी करना चाहते थे। गांधी जी ने कभी भी इस्लाम में कन्वर्जन का विरोध नहीं किया। क्या एक संन्यासी द्वारा इस्लाम अपनाने वाले हिंदुओं को वापस हिंदू धर्म में लाने का प्रयास अपराध था?

सिंध के नेता अल्लाह बख्श सामरू ने जब मुस्लिम लीग के विरुद्ध 13 दलों का संघ बनाकर पाकिस्तान और मुस्लिम लीग का विरोध किया, तो कांग्रेस ने उसे महत्व नहीं दिया और जिन्ना को मनाने के लिए बातचीत जारी रखी। मुस्लिम लीग ने सोमरू की हत्या करा दी, पर कांग्रेस चुप रही। इसी प्रकार खाकसारों ने पाकिस्तान की मांग और जिन्ना का विरोध ही नहीं किया, बल्कि दो बार जिन्ना पर हमले भी करवाए। लेकिन कांग्रेस खाकसारों के साथ अरहर दाल का भी विरोध करती रही।

मुस्लिम लीग को रोकने के लिए कांग्रेस न तो प्रजा कृषक पार्टी को समर्थन देने को तैयार थी और न ही यूनियनिस्ट पार्टी को। बजाए इसके कि आम जनता को साथ लेकर पाकिस्तान की मांग के विरोध में आंदोलन छेड़ा जाए, कांग्रेस ने अंग्रेजों के साथ मिलकर विभाजन स्वीकार किया। यही नहीं, भारत को बांटने वाले माउण्टबेटन को भारतीय डोमीनियन का आमंत्रण देकर पहला गवर्नर जनरल बना दिया। मत भूलिए कि जिन्ना ने पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान के बीच एक गलियारा मांगा था, जिसका गांधी जी ने समर्थन किया था। उन्होंने तो पाकिस्तान में हिंदुओं और सिखों पर हिंसा की अनदेखी कर उन्हें वहीं रहने की नसीहत भी दी थी।

कश्मीर का मुद्दा नेहरू की देन

1948 में सेना के सुझाव की अनदेखी कर एडविना माउण्टबेटन के आग्रह पर पाकिस्तान से युद्ध विराम कर तथाकथित आजाद कश्मीर बनवाने का श्रेय भी नेहरू को ही जाता है। उन्होंने शेख अब्दुल्ला से साठगांठ कर अनुच्छेद-370 लगवाया, लेकिन पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से हिंदू शरणार्थी ही नहीं, मुस्लिम घुसपैठिए भी आकर बसते रहे। 1950 के बाद लगभग दो लाख पाकिस्तानी वीजा पर भारत आए और ‘गायब’ हो गए। लेकिन कांग्रेस की सरकारों ने उन्हें ‘ढूंढकर’ वापस भेजने की कोशिश तक नहीं की। संप्रग के शासनकाल में तो रोहिंग्या जम्मू की छावनी के ठीक पीछे तक बस गए थे।

1955 में गणतंत्र दिवस पर नेहरू ने पाकिस्तान के गवर्नर जनरल मलिक गुलाम मुहम्मद को मुख्य अतिथि बनाया। केरल में नंबूदीरीपाद का मंत्रिमंडल बर्खास्त करने के बाद भी कांग्रेस ने प्रदेश में मुस्लिम लीग के साथ गहरी दोस्ती बनाए रखी। उसके सदस्यों को केंद्र में मंत्री भी बनाया। यह संबंध आज भी कायम है। क्या मुस्लिम लीग एक पंथनिरपेक्ष पार्टी हो गई थी, जो पंथनिरपेक्षता का ढोल बजाने वाली कांग्रेस उसके साथ मिलकर चुनाव लड़ती है और सरकारें बनाती है? मुस्लिम लीग साम्प्रदायिक और कट्टरपंथी विचारधारा से कभी दूर नहीं गई। यह कांग्रेस ही है, जिसने मुस्लिम लीग को राजनीति में सशक्त बनाया। केरल इसका प्रमाण है।

कांग्रेस की नीति केवल तुष्टीकरण तक सीमित नहीं है। मुस्लिम विरोध के कारण समान नागरिक संहिता नहीं बनाना क्या दर्शाता है? वक्फ बोर्ड को असीमित शक्तियां देना और मुस्लिम पर्सनल बोर्ड को सिर पर बैठाना कांग्रेस का डीएनए है। 1986 में स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट आफ इंडिया (सिमी) का गठन हुआ, जिसका उद्देश्य ‘इस्लाम द्वारा भारत को स्वतंत्र कराना’ था, जो गजवा-ए-हिंद का दूसरा रूप है। वे भारत को दार-उल-हर्ब की जगह दार-उल-इस्लाम बनाना चाहते हैं। सब कुछ जानते हुए भी कांग्रेस ने सिमी पर प्रतिबंध नहीं लगाया। 2001 में राजग सरकार ने उसे प्रतिबंधित किया।

इसी प्रकार, संप्रग के काल (2006) में पीएफआई का गठन हुआ, जिसका उद्देश्य सिमी से भी घातक था। पाकिस्तान की गुप्तचर एजेंसी आईएसआई, अलकायदा, आईएसआईएस से संबंधों की जानकारी होने के बाद भी कांग्रेस सरकार ने पीएफआई प्रतिबंध नहीं लगाया था। सितंबर 2022 में राजग सरकार ने इस पर प्रतिबंध लगाकर इसके गुर्गों को गिरफ्तार किया। मुंबई हमले में कांग्रेसी हिंदुत्व में आतंकवाद ढूंढ रहे, वह तो तुकाराम आंबले थे, जिन्होंने कसाब को जिंदा पकड़ा, नहीं तो चिदंबरम जैसे कांग्रेसी मुंबई हमले को ‘हिंदू आतंकी’ हमला ही कहते रहते।

कश्मीरी पंडितों को नेहरू की धमकी!

कश्मीर के श्रीनगर में क्रालखुद स्थित प्राचीन शीतलनाथ भैरव मंदिर और इसके आसपास का बड़ा परिसर कभी कश्मीरी पंडितों की राजनीतिक अभिव्यक्ति का केंद्र हुआ करता था। इसी परिसर में नेशनल कान्फ्रेंस के निमंत्रण पर 7 अगस्त, 1945 को जवाहर लाल नेहरू ने कश्मीरी पंडित युवाओं को संबोधित करते हुए कहा था, ‘‘यदि गैर-मुस्लिम कश्मीर में रहना चाहते हैं, तो उन्हें नेशनल कान्फ्रेंस में शामिल हो जाना चाहिए या देश को अलविदा कह देना चाहिए। नेशनल कान्फ्रेंस ही असली राष्ट्रीय संगठन है और अगर एक भी हिंदू इसका सदस्य नहीं बनेगा, तो भी यह बना रहेगा। यदि पंडित इसमें शामिल नहीं होते हैं, तो कोई भी सुरक्षा उपाय और प्रभाव उनकी रक्षा नहीं कर पाएगा।’’ (स्ट्रगल फॉर फ्रीडम इन कश्मीर, प्रेमनाथ बजाज, पृ. 248)

दिग्विजय सिंह और मणिशंकर जैसे कांग्रेसी नेता पाकिस्तान का राग तो अलापते हैं, पर कांग्रेस में जाते ही सिद्धू ने भी यही किया। आतंकी प्रचारक जाकिर नाईक दिग्विजय सिंह का आदर्श है और वह बढ़-चढ़ कर यह दिखाता भी है। कांग्रेस खुद को महिला अधिकारों का पक्षधर बताती है, लेकिन शाहबानो प्रकरण में राजीव गांधी ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बावजूद कानून नहीं बनाया। कश्मीर में पाकिस्तान का शोर मचाने वाले अब्दुल्लाओं से इनका गठबंधन है।

क्या इन कांग्रेसी नेताओं के मुंह से ‘सर तन से जुदा’ का विरोध सुना है? ये तो भारत में हज सब्सिडी, इमाम व मदरसों के मौलवियों को वेतन दिलाने में लगे रहते हैं और गैर-कानूनी मदरसों को सही ठहराते हैं। लेकिन हिंदू मंदिरों पर ‘जजिया’ के मुद्दे चुप रहते हैं। मुस्लिम अपराधी इनके चहेते होते हैं। ऐसा नहीं होता तो अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी जैसे कुख्यात अपराधी राजनीति में नहीं आते। कांग्रेस की सर्वेसर्वा बटला हाउस में आतंकियों के मारे जाने पर आंसू बहाती हैं। इस बार वायनाड में कांग्रेस द्वारा अपने झंडे का प्रयोग नहीं करना यह बताता है कि वह मुस्लिम लीग के साथ मिलकर चुनाव लड़ रही है। लेकिन हिंदू मतदाता नाराज न हो जाएं, इसलिए चुनावी सभाओं में झंडे का इस्तेमाल नहीं कर रही है।

Topics: सांप्रदायिक मानसिकतामुस्लिम लीग से कांग्रेस का समझौताकांग्रेसहिंदू-मुस्लिम एकतापाकिस्तानKashmir issue is Nehru's contributionराहुल गांधीcommunal mentalityजवाहरलाल नेहरूIndia will take it laughingमुस्लिम लीगCongress's agreement with Muslim Leagueतब्लीगी जमात'Hindu-Muslim unityपाञ्चजन्य विशेषकश्मीर का मुद्दा नेहरू की देन
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