पुस्तक 'Key To Total Happiness', जो सिखाती है, कैसे एक खुश, शांतिपूर्ण और व्यवहारपूर्ण अस्तित्व जिया जाए
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पुस्तक ‘Key To Total Happiness’, जो सिखाती है, कैसे एक खुश, शांतिपूर्ण और व्यवहारपूर्ण अस्तित्व जिया जाए

'एकीकृत मानव दर्शन' यह प्रदर्शित करने का प्रयास करता है कि मानवता इन सभी चिंताओं का स्वीकार्य समाधान प्रदान करके कैसे जीवन जी सकती है।

Written byडॉ. पंकज जगन्नाथ जयस्वालडॉ. पंकज जगन्नाथ जयस्वाल
Mar 16, 2024, 07:43 pm IST
inविश्लेषण

भारत सरकार ने 2022 से 2047 तक की 25 वर्ष की अवधि को “अमृत काल” घोषित किया है।  इस दौरान देश की हर महिला, पुरुष और युवा को यह दिखाना होगा कि 2047 तक भारत एक विकसित देश बनेगा।

इस शुभ समय के दौरान, भारत को ‘शाश्वत सुख की तलाश में आगे बढ़ने’ की कठिन चुनौती का सामना करना होगा। हालांकि, वर्तमान समय में एक तरफ आश्चर्यजनक तकनीकी प्रगति और दूसरी तरफ पूरी मानवता गहरे संकट में है।  मानव इतिहास में सबसे आकर्षक प्रयास यह है कि धरती पर हर कोई आदिकाल से ही खुशी के लिए प्रयास करता रहा है।  यह कार्य इतना कठिन क्यों प्रतीत होता है?  क्या हमें व्यक्ति, समाज और शांति के बीच संबंधों के बारे में कोई गलतफहमी है?  पीढ़ियों के संघर्ष के बाद, हमने भौतिक विकास हासिल किया है,  फिर भी पैसे की प्यास कम नहीं हुई है।  प्रौद्योगिकी उन्नत हो गई है, लेकिन अभी भी व्यापक तौर पर उथल-पुथल है।  हम यह कैसे सुनिश्चित कर सकते हैं कि एक ओर, सतत विकास हो और साथ ही जीवन आसान और अधिक शांतिपूर्ण हो?

‘एकीकृत मानव दर्शन’ यह प्रदर्शित करने का प्रयास करता है कि मानवता इन सभी चिंताओं का स्वीकार्य समाधान प्रदान करके कैसे एक खुश, शांतिपूर्ण और व्यवहारपूर्ण अस्तित्व जी सकती है।

पश्चिमी विचार प्रक्रिया का परिणाम 

अब महत्वपूर्ण सवाल यह है कि इस मिथक को फैलाने से क्या हासिल हुआ है कि पश्चिमी विचार भारतीय दर्शन से श्रेष्ठ और पुरातन है?  पिछली शताब्दी में दो विश्व युद्ध, प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक उपयोग, गरीब देशों का शोषण, सामाजिक असंतुलन, नक्सलवाद, समाज में मानसिक और शारीरिक तनाव की समस्या, आतंकवाद, नशीली दवाओं का अत्यधिक उपयोग, आत्महत्या, राजनीतिक शक्ति का ध्रुवीकरण, धर्म परिवर्तन की साजिश, पारिवारिक व्यवस्था के अवमूल्यन के कारण तलाक की दरों में वृद्धि, क्या  इन चिंताओं का कोई समाधान है? क्या वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति के कारण हो रहा हैं, क्या यह वास्तविक विकास है?  जब भारत में सनातन धर्म अपनाया गया तब समाज में शांति थी।  सम्पूर्ण दुनिया परस्पर सहजीवन का आनन्द ले रहा था।  पर्यावरण का ख्याल रखा जा रहा था। साथ ही, वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति भी हासिल की जा रही थी। यह कैसे प्राप्त किया जा सका, इसका अध्ययन अभी भी भारत और दुनिया भर में किया जा रहा है।  1965 में पंडित दीनदयाल उपाध्याय द्वारा प्रस्तावित ‘एकात्म मानव दर्शन’ ऐसे अध्ययन का एक अच्छा उदाहरण है।

 एकात्म मानव दर्शन विजन: एक आसान उत्तर 

पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने मानवता के सभी पहलुओं को संरक्षित करने के उद्देश्य से विभिन्न विचार प्रणालियों का गहराई से अध्ययन किया।  राजशाही, समाजवाद, साम्यवाद और धर्मनिरपेक्षता कुछ राजनीतिक व्यवस्था के प्रयोग हैं जिनका पिछली कुछ शताब्दियों में प्रयोग किया गया है।  भारत को 1947 में आज़ादी मिली। इससे पहले, दुनिया में इन सभी राजनीतिक चिंतन धाराओं की उत्पत्ति, दुनिया भर के कई देशों में उनके व्यावहारिक अनुप्रयोग और उनके परिणामों की जांच की गई थी।  दीनदयालजीने 1965 तक स्वतंत्र भारत द्वारा अपनाई गई नीतियों का मूल्यांकन किया। सभी सीखों की परिणति के रूप में, उन्होंने अप्रैल 1965 में मुंबई में चार वार्ताओं में अपने विचार प्रस्तुत किए। उस विचार को बाद में एकात्म मानववाद (‘एकात्म मानव दर्शन’) के रूप में अपनाया गया, जिससे भारत को मदद मिल सकती थी।  न केवल अपनी राजनीतिक यात्रा के मार्ग की पहचान करें, बल्कि उस टिप्पणी का उपयोग उन नीतियों को क्रियान्वित करने के लिए भी करें जो मानवता को हमेशा के लिए प्रसन्न करेंगी।  हालांकि, इस दृष्टि के जन्म के तीन साल बाद, पंडित दीन दयाल का जीवन समाप्त हो गया और ‘एकात्म मानव दर्शन’ की अवधारणा का प्रसार प्रतिबंधित हो गया।  इसके अलावा, भारत में राजनीतिक माहौल इस विचारधारा पर विचार करने के लिए अनुकूल नहीं था।  अगले 50 वर्षों में गठबंधन सरकारें देखी गईं।  स्वाभाविक रूप से, कार्रवाई की दिशा कई विचारधाराओं के मिश्रण से निर्धारित होती थी।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के माहौल का प्रभाव वैश्विक परिदृश्य पर पड़ा।  दुनिया भर में कई घटनाएं घटीं, जिनमें सोवियत संघ का 15 संप्रभु राज्यों में विभाजन, बर्लिन की दीवार का गिरना और समाजवाद और साम्यवाद के मिश्रण पर आधारित नीति की स्थापना शामिल है।  जापान, जर्मनी, फ्रांस और अन्य देशों ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के पुनर्निर्माण प्रयासों के दौरान अपनी एकता का परीक्षण किया।  इसकी तुलना में भारत इन सभी देशों से काफी पीछे रह गया।  इक्कीसवीं सदी की शुरुआत में पश्चिमी देशों में उभरी सोच की प्रवृत्ति के प्रभावों की सही मायने में जाचं 1995 में शुरू हुई थी। तब तक, इन अवलोकन अध्ययनों का विवरण देने वाले कई पत्र प्रकाशित हो चुके थे।  उनमें से कुछ का उल्लेख पडित दीन दयाल के दर्शन में मिलता है,  पश्चिमी लेखकों के विचार क्या हैं, प्रोफेसर नारायण गुने ने 2018 में इंग्लैंड के न्यूकैसल नॉनडुम्ब्रिया विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी में अध्ययन किया।  ये सभी “द की टू टोटल हैप्पीनेस” पुस्तक में समाहित हैं। पुस्तक की संरचना और उद्देश्य

पंडित दीन दयाल के चार व्याख्यानों से 61 अंक लिये गये हैं।  इन्हें निम्नलिखित सात भागों में विभाजित किया गया है।

1. दिशा

2. व्यक्ति एवं समाज का सहजीवन

3. राज्य और राष्ट्र एक दूसरे से जुड़े हुए हैं

4. रिलीजन, धर्म और मजहब अलग-अलग हैं

5. खुशी के लिए आर्थिक संरचनाएं

6. कल्याणकारी राज्य एवं समाज कल्याण

7.  विराट जागृती

इसमें प्रत्येक विषय की व्याख्या, भारतीय दर्शन पर पश्चिमी दार्शनिकों का शोध और “एकात्म मानव दर्शन” के आदर्शों पर वर्तमान परिप्रेक्ष्य के साथ-साथ भविष्य के कार्यान्वयन के प्रस्ताव भी शामिल हैं।  प्रत्येक ट्रैक में सारांश के साथ-साथ महत्वपूर्ण शब्द भी शामिल हैं।

यह पुस्तक व्यक्तियों, समाजों, प्रकृति और अदृश्य शक्तियों के गुणों की पड़ताल करती है।  कई बुद्धिजीवियों के अनुसार, छात्र, शिक्षक, समुदाय के नेता और राजनीतिक नेता लगातार इस बात पर विचार कर रहे हैं कि कैसे लोग और समाज मानव जाति को स्थायी खुशी, संतुष्टि और खुशहाली प्रदान कर सकते हैं।  यदि उन्हें यह पुस्तक उपयोगी लगती है तो हम मानेंगे कि हमारा कार्य पूरा हो गया।

Topics: Prime Minister Narendra Modiभारत सरकारपुस्तक समीक्षाBook ReviewAmrit Kaalएकीकृत मानव दर्शनIntegrated Human PhilosophyGovernment of Indiaप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीअमृत काल
डॉ. पंकज जगन्नाथ जयस्वाल
डॉ. पंकज जगन्नाथ जयस्वाल
डॉ पंकज जगन्नाथ जयस्वाल, शिक्षाविद्, लेखक और स्तंभकार हैं [Read more]
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