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होम भारत

तीर्थस्थलों और आर्थिक गतिविधियों का पुनर्जागरण

मंदिर केवल आध्यात्मिक और धार्मिक अनुष्ठान के केंद्र ही नहीं होते, बल्कि ये स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करने में बहुआयामी भूमिका निभाते हैं। ये अनुष्ठान और तीर्थाटन आस्था की अभिव्यक्ति से कहीं अधिक, आर्थिक इंजन भी हैं

Written byउमेश कुमार अग्रवालउमेश कुमार अग्रवाल
Feb 21, 2024, 07:35 am IST
in भारत, विश्लेषण, धर्म-संस्कृति, तमिलनाडु
तमिलनाडु में श्रीपुरंथन बृहदेश्वर मंदिर से चुराई गई नटराज की प्रतिमा को आस्ट्रेलिया के तत्कालीन प्रधानमंत्री टोनी एबॉट ने 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सौंपा था

तमिलनाडु में श्रीपुरंथन बृहदेश्वर मंदिर से चुराई गई नटराज की प्रतिमा को आस्ट्रेलिया के तत्कालीन प्रधानमंत्री टोनी एबॉट ने 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सौंपा था

भारत स्वाभिमान योजना भारत की खोई हुई विरासत को पुन: वापस लाने की दिशा में निजी स्तर पर चलाई जा रही एक बड़ी योजना है। इसी परियोजना के तहत पहले अमेरिका ने भारत से तस्करी करके लाए गए 105 पुरावशेषों को वापस किया था। 

इंडिया प्राइड प्रोजेक्ट यानी भारत स्वाभिमान योजना भारत की खोई हुई विरासत को पुन: वापस लाने की दिशा में निजी स्तर पर चलाई जा रही एक बड़ी योजना है। इसी परियोजना के तहत पहले अमेरिका ने भारत से तस्करी करके लाए गए 105 पुरावशेषों को वापस किया था। इसके तीन महीने बाद अक्तूबर 2023 में अमेरिका ने 1400 से अधिक प्राचीन मूर्तियां और कलाकृतियां लौटाने की पेशकश की। यह अब तक की सबसे बड़ी क्षतिपूर्ति है। इन पुरावशेषों में न्यूयॉर्क के मेट्रोपॉलिटन म्यूजियम आफ आर्ट (मेट संग्रहालय) में प्रदर्शित वस्तुएं भी शामिल हैं। ये सभी अवैध रूप से भारत से ले जाई गई थीं। इस प्रकार यह परियोजना ऐतिहासिक संरक्षण, आस्थावानों के लिए आध्यात्मिक अर्थ, पर्यटन से आर्थिक विकास, सद्भावना को बढ़ावा देने वाले विश्वव्यापी सहयोग और सांस्कृतिक बहाली में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है।

तमिलनाडु में मंदिरों के शहर श्रीपुरंथन से चोरी हुई कांस्य की नटराज की बहुमूल्य मूर्ति की वापसी और पुनर्स्थापना न केवल शहर की भव्यता को पुनर्जीवित करेगी, बल्कि एक महत्वपूर्ण बदलाव, प्राचीन गौरव को फिर से जाग्रत करने और पावन सांस्कृतिक जड़ों की रक्षा का भी प्रतिनिधित्व करेगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 13 दिसंबर, 2021 को काशी विश्वनाथ गलियारे का उद्घाटन किया था। इसके बाद 6 दिसंबर, 2023 तक लगभग 13 करोड़ तीर्थ यात्री काशी विश्वनाथ मंदिर में दर्शन के लिए आए। इसी तरह, 11 नवंबर, 2022 को श्री महाकालेश्वर मंदिर गलियारे के उद्घाटन के बाद श्रद्धालु उज्जैन में उमड़ पड़े।

भारत के आर्थिक विकास में मंदिरों के महत्त्व को निर्धारित करने के लिए काशी और उज्जैन के आध्यात्मिक तीर्थस्थलों के भाग्य का मूल्यांकन किया जा सकता है। इन मंदिरों की ऊर्जा, इनके द्वारा प्रदान किए जाने वाले रोजगार, व्यापार और सामुदायिक समर्थन वैदिक अर्थव्यवस्था को सनातन आध्यात्मिक प्रथाओं के अनुरूप बनाने में मदद देते हैं। कालजयी मंदिरों ने न केवल पवित्र शहरों के आर्थिक परिदृश्य को बदला है, बल्कि क्षेत्र के लोगों के आर्थिक जीवन में बहुत योगदान दिया है। अब बदलाव की हवा चलनी शुरू हो गई है

यहां सामान्य दिनों में श्रद्धालुओं की दैनिक संख्या बढ़कर एक लाख और सप्ताह के अंत व अवकाश वाले दिनों में डेढ़ से दो लाख से भी अधिक हो गई। अब इस वर्ष 22 जनवरी को अयोध्या में जन्मभूमि पर बने भव्य मंदिर में श्रीरामलला के विराजमान होने के बाद देश-विदेश से प्रतिदिन दो लाख से अधिक श्रद्धालु अयोध्या पहुंच रहे हैं। प्राण-प्रतिष्ठा के अगले 11 दिनों में 25 लाख श्रद्धालुओं ने रामलला के दर्शन किए। व्यापार संगठन कन्फेडरेशन आफ आल इंडिया ट्रेडर्स ने राम मंदिर से जनवरी 2024 में 50,000 करोड़ रुपये का व्यापार होने की उम्मीद जताई है। अयोध्या में नवनिर्मित एवं पुनर्निर्मित रेलवे स्टेशन ‘अयोध्या धाम’ और महर्षि वाल्मीकि अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे से क्षेत्रीय संबंधों में भी सुधार आएगा। बुनियादी ढांचे के विकास से पर्यटन, आर्थिक गतिविधयों को बढ़ावा तो मिलेगा ही, रोजगार के भी अवसर भी बढ़ेंगे।

2014 के बाद से भाजपा के राष्ट्रवादी दृष्टिकोण की परिणति आध्यात्मिक केंद्रों के पुनरुत्थान, अधिक आर्थिक गतिविधि और बेहतर बुनियादी ढांचे और कनेक्टिविटी रूप में हुई है। सनातन सिद्धांतों पर केंद्रित वैदिक अर्थव्यवस्था धन के समान वितरण और पारिस्थितिक स्थिरता पर जोर देती है, ईएसजी (पर्यावरण, सामाजिक शासन) सिद्धांतों से जुड़ती है तथा आर्थिक विकास, आध्यात्मिक लोकाचार व पर्यावरणीय चिंता के स्वस्थ संतुलन को प्रोत्साहित करती है। सनातन आध्यात्मिक प्रथाओं के अनुसार, वैदिक अर्थव्यवस्था ने आध्यात्मिकता और वाणिज्य के बीच एक सामंजस्यपूर्ण संबंध प्रदर्शित किया है, जिसने सदियों से अर्थव्यवस्थाओं को आकार दिया है।

क्या है भारत स्वाभिमान परियोजना?

भारत स्वाभिमान परियोजना उत्साही कला प्रेमियों का एक समूह है, जो सोशल मीडिया के जरिए भारत के मंदिरों से चुराई गई मूर्तियों और कलाकृतियों की पहचान कर उनकी स्वदेश वापसी सुनिश्चित करता है। यह वैश्विक संस्था #ब्रिंगआवरगॉड्सहोम नाम से दुनियाभर में अभियान चलाती है। इसकी शुरुआत सिंगापुर में बसे दो भारतीयों एस. विजय कुमार और अनुराग सक्सेना ने 2014 में की थी, जो इस पहल का वित्त पोषण भी करते हैं। इसी संस्था के प्रयासों के परिणामस्वरूप 2014 में आस्ट्रेलिया की नेशनल गैलरी से 50 लाख अमेरिकी डॉलर की भगवान शिव की हजारों वर्ष पुरानी कांस्य प्रतिमा को भारत वापस लाया जा सका।

इस संस्था ने दुनियाभर में मौजूद भारत से चोरी की गई लगभग 4,900 सांस्कृतिक धरोहर का पता लगाया है। इसके अनुसार, बीते एक वर्ष में भारत से 15,000 से 17,000 मूर्तियां चोरी की गई हैं। प्राइड इंडिया टीम ने इनमें से 2,000 मूर्तियां ढूंढ निकाली हैं, जिनमें से 5 भारत लाई जा चुकी हैं। तमिलनाडु के श्रीपुरंथन गांव में चोल कालीन बृहदेश्वर मंदिर से 2006 में कांस्य की भगवान नटराज की बहुमूल्य मूर्ति को चुरा कर विदेश में बेच दिया गया था। बाद में यह मूर्ति विभिन्न देशों से होती हुई लंदन के सोथबी नीलामीघर में पहुंची। वहां से आस्ट्रेलिया सरकार ने इस मूर्ति को खरीदा और कुछ दिन बाद ही इसे भारत को सौंप दिया। इसे पुन: श्रीपुरंथन मंदिर में स्थापित किया गया है।

परियोजना के संस्थापक अनुराग सक्सेना कहते हैं, ‘‘सबसे पहले ब्लॉगर और कलाप्रेमी विजय कुमार ने चोरी की गई नटराज की मूर्ति को देखा था। इसके बाद हमने साक्ष्य ढूंढना शुरू किया ताकि हम बता सकें कि चोरी से पहले यह मूर्ति श्रीपुरंथन मंदिर में थी। हमने कैनबरा जाकर कुछ लोगों से मूर्ति की तस्वीर लेने के लिए कहा ताकि असली मूर्ति से उसका मिलान किया जा सके। इसके बाद हमने नीलामीघर के डीलर द्वारा प्रस्तुत फर्जी दस्तावेज और रसीद को ढूंढना शुरू किया, जिससे हम यह साबित कर सकें कि मूर्ति चुराई गई थी।’’

वैदिक अर्थशास्त्र मंदिरों के इर्द-गिर्द विकसित होता है। इसमें कई आर्थिक गतिविधियां शामिल होती हैं, जो मंदिरों के आसपास उत्पन्न और केंद्रित होती हैं। यह तथ्य दर्शाता है कि किस प्रकार मंदिर पारंपरिक रूप से भोजन, वित्त और सामुदायिक कल्याण के केंद्र के रूप में काम करते हैं। इस प्रकार मंदिर केवल आध्यात्मिक और धार्मिक अनुष्ठान के केंद्र ही नहीं हैं, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करने में भी बहुआयामी भूमिका निभाते हैं। ये अनुष्ठान और तीर्थाटन आस्था की अभिव्यक्ति से कहीं अधिक, आर्थिक इंजन भी हैं। मंदिर धन के सृजन और पुनर्वितरण को शक्ति प्रदान करते हैं और एक चक्र को बनाए रखते हैं, जिसमें भक्ति और व्यवसाय आपस में जुड़े हुए हैं।

हमारे पूर्वजों ने अपनी बुद्धिमत्ता से एक ऐसी प्रणाली तैयार की थी, जो आध्यात्मिक और आर्थिक आवश्यकताओं को संतुलित करती थी। भारत के आर्थिक विकास में मंदिरों के महत्त्व को निर्धारित करने के लिए काशी और उज्जैन के आध्यात्मिक तीर्थस्थलों के भाग्य का मूल्यांकन किया जा सकता है। इन मंदिरों की ऊर्जा, इनके द्वारा प्रदान किए जाने वाले रोजगार, व्यापार और सामुदायिक समर्थन वैदिक अर्थव्यवस्था को सनातन आध्यात्मिक प्रथाओं के अनुरूप बनाने में मदद देते हैं। कालजयी मंदिरों ने न केवल पवित्र शहरों के आर्थिक परिदृश्य को बदला है, बल्कि क्षेत्र के लोगों के आर्थिक जीवन में बहुत योगदान दिया है। अब बदलाव की हवा चलनी शुरू हो गई है। पावन नगरी अयोध्या में श्रीरामलला का अभिषेक राम राज्य की प्रतीकात्मक बहाली का प्रतीक है, जिससे मंदिरों के शहर अयोध्या में आध्यात्मिक सनातन प्रथाओं के अनुसार वैदिक अर्थव्यवस्था का पुनरुत्थान होगा।

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