सरयू तट पर उपवन मनोहर

राम और लक्ष्मण सरयू किनारे चलते हुए महर्षि विश्वामित्र के साथ यहां पहुंचे थे। यहां वे एक रात रुके और राक्षसों पर विजय हेतु भैरव देव की पूजा की। भौगोलिक परिवर्तनों के कारण आज सरयू यहां से कुछ दूर हटकर बहती है।

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अमिय भूषण

उत्तर प्रदेश के मऊ जिले में सरयू और तमसा नदी का संगम है। यहां से बहने वाली पुरानी सरयू धारा तमसा के साथ मिलती है, दोनों मिलकर टोंस नदी बनाती हैं। इसी के किनारे महर्षि वाल्मीकि का आश्रम था

श्याम गौर सुंदर दोऊ भाई
गतांक के बाद

अमिय भूषण, भारतीय संस्कृति परंपरा के अध्येता

प्रभु श्रीराम की प्रथम यात्रा में ऋषि श्रृंगी आश्रम के उपरांत अगला महत्वपूर्ण पड़ाव भैरव देव का एक प्रसिद्ध मंदिर था। यह स्थान उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले में महराजगंज में अवस्थित है। राम और लक्ष्मण सरयू किनारे चलते हुए महर्षि विश्वामित्र के साथ यहां पहुंचे थे। यहां वे एक रात रुके और राक्षसों पर विजय हेतु भैरव देव की पूजा की। भौगोलिक परिवर्तनों के कारण आज सरयू यहां से कुछ दूर हटकर बहती है। वैसे यह स्थल पौराणिक मान्यताओं के अनुसार दक्ष प्रजापति और देवी सती से जुड़ी कथा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है।

जनश्रुतियां कहती हैं कि यह दक्ष प्रजापति का वही यज्ञ स्थल है जहां माता सती ने आत्मदाह किया था। इसके साक्ष्य के तौर पर मंदिर प्रांगण में कभी न भरने वाला एक यज्ञ कुंड है। इसे लेकर मान्यता है कि यहां कितनी भी समिधा डले, यह कुंड सदैव खाली ही दिखता है। वैसे इस घटना के साक्षी स्थल के तौर पर हरिद्वार का कनखल और बिहार के सारण जिले का आमी भी प्रसिद्ध हैं। मनवन्तर और कल्प भेद के आधार पर इस जगह को पौराणिक कथा से जुड़ा मानना चाहिए। यहां शिव स्वरूप भैरव देव अपने तीन अलग रूपों में विराजते हैं। एक ही प्रतिमा में काल भैरव, बटुक भैरव और वीरभद्र भैरव, ये तीन रूप हैं।

यहां मंदिर प्रवेश के लिए तीन दिशाओं में एक-एक द्वार है, जबकि मुख्य द्वार दक्षिणमुखी है। पास में एक शमशान घाट है, जहां पाताल गंगा नामक एक सरोवर भी है। इसका स्रोत एक भूमिगत जल सोता है किंतु समुचित साफ-सफाई के अभाव में अब यह बंद हो चला है। इस देवालय के आसपास कभी 365 कुएं थे। ये भी उचित देख-रेख के अभाव में भग्न होने को हैं। ये सब निश्चित ही इस स्थान के पुरातन एवं सिद्ध होने की पुष्टि करते हंै। इसे श्रीराम की इस यात्रा पड़ाव स्थली से जोड़ कर प्रचार एवं विकास करने की आवश्यकता है।

इस मंदिर प्रांगण में भगवान भोलेनाथ के शिवलिंग के अलावा राम, लक्ष्मण और महर्षि विश्वामित्र की प्रतिमाएं स्थापित हैं। इस शिव मंदिर से जुड़ी एक और मान्यता है कि यहां आने वाला झूठ नहीं बोलता। इसीलिए यहां सच और झूठ का निर्णय करने के लिए पंचायत लगा करती है। यहां भगवान भोलेनाथ के समक्ष सदैव सत्य की ही विजय होती है।

इस यात्रा का चौथा महत्वपूर्ण पड़ाव अजमतगढ़ का सलोना ताल है। यह उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले में अवस्थित है। कभी पुरानी सरयू धारा यहीं से होकर बहती थी। अब यहां एक विशाल तालाब है जो मीलों तक फैला है। इसे सरयू नदी का पेटा भी कहते हैं। यह स्थान आजमगढ़ जिला मुख्यालय से लगभग 25 कि.मी. उत्तर- पूर्व में अवस्थित है।

यहां सलोना ताल के पास एक पुराना खंडहरनुमा भवन और मंदिरों का एक समूह दिखता है। यहां एक ही स्थान पर भगवान शिव, श्री राम और माता काली के पुराने मंदिर मौजूद हैं, जिन्हें यहां के पूर्ववर्ती राज परिवार ने बनवाया था। यहां सामने सड़क पर विश्वामित्र मार्ग का एक सूचनापट लगा है, पास ही श्रीराम वाटिका नाम से एक सुंदर उपवन भी है। बेशक, यह स्थल निश्चित ही श्रीराम-लक्ष्मण के यात्रा मार्ग का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है।

अगले पड़ाव स्थल की बात करें तो यह बारदुवारिया नामक प्रसिद्ध शिव मंदिर है। उत्तर प्रदेश के मऊ जिले का यह स्थान सरयू और तमसा नदी का संगम रहा है। इन दिनों यहां से होकर बहने वाली पुरानी सरयू धारा तमसा के साथ मिलती है, जिसके आगे इसे आज टोंस के नाम से पुकारा जाता है। यह वही नदी है जिसके किनारे महर्षि वाल्मीकि का आश्रम हुआ करता था। अपने दोहद काल अर्थात गर्भावस्था में भगवती सीता इसी नदी के तट पर बने आश्रम में रही थीं। ऐसी चर्चा रामायण के सीता वनवास प्रसंग में है।

वाल्मीकि रामायण के इस प्रसंग का महाकवि भवभूति ने अपने उत्तर रामचरित नाटक में भावपूर्ण चित्रण किया है। प्रभु राम की इस प्रथम यात्रा के मार्ग में सरयू के इस घाट पर भगवान शिव का बारह द्वारों वाला एक पुराना मंदिर है। मंदिर में जाने के लिए चारों दिशाओं में तीन-तीन द्वार हैं।

इन बारह द्वारों की वजह से इसे बारह द्वार मंदिर कहा गया, जो समय के साथ अपभ्रंश होकर स्थानीय लोगों द्वारा बारदुवारिया मंदिर के नाम से पुकारा जाता है। महर्षि विश्वामित्र श्री राम और लक्ष्मण के साथ यहीं से अपने अगले पड़ाव के लिए निकले थे। यहां कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर एक बड़ा मेला लगता है।

इस मंदिर प्रांगण में भगवान भोलेनाथ के शिवलिंग के अलावा राम, लक्ष्मण और महर्षि विश्वामित्र की प्रतिमाएं स्थापित हैं। इस शिव मंदिर से जुड़ी एक और मान्यता है कि यहां आने वाला झूठ नहीं बोलता। इसीलिए यहां सच और झूठ का निर्णय करने के लिए पंचायत लगा करती है। यहां भगवान भोलेनाथ के समक्ष सदैव सत्य की ही विजय होती है। (क्रमश:)

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