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लोकतंत्र में शव गणना!

आमतौर पर माना जाता है कि जिस राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति लचर हो, वहां उजागर होने वाले मामले कुल मामलों का अधिकतम 10 प्रतिशत ही होते हैं।

Panchjanyaहितेश शंकरWritten byPanchjanyaandहितेश शंकर
Jul 18, 2023, 12:13 pm IST
in सम्पादकीय, पश्चिम बंगाल

वास्तव में हत्याओं का सामान्यीकरण करना इस लोकतंत्र की और भारत की सभ्यता की हत्या का सामान्यीकरण करने के तुल्य है। हाल ही में बिहार और झारखंड में भारतीय जनता पार्टी के नेताओं की चुनिंदा ढंग से हत्याएं की गईं। अतीत में इन्हें यह कहकर सामान्य बात स्थापित करने की कोशिश की जाती थी कि बिहार में तो ‘गनतंत्र’ है या यह तो बाहुबलियों का तरीका है।

पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र से आशय क्या है? पंचायत चुनावों में वहां मतों की गणना होनी थी या शवों की? उतनी ही शर्मनाक बात यह भी है कि इस नरसंहार पर देशभर के कथित मुख्यधारा के मीडिया, कथित मानवाधिकारों को लेकर उछल-कूद करने वाले संगठन और मोहब्बत की दुकानों के सारे दुकानदार ऐसे चुप्पी साध कर बैठे हैं, जैसे कुछ हुआ ही न हो। या जो भी कुछ हुआ हो, वह सामान्य ही हो। उनकी यह चुप्पी और चुनाव के नाम पर हत्याओं के इस खुले खेल को सामान्य बनाने की कोशिश इन हत्याओं में उनकी परोक्ष संलिप्तता का साक्ष्य क्यों न मानी जाए?

कुछ हुआ ही न हो… वास्तव में हत्याओं का सामान्यीकरण करना इस लोकतंत्र की और भारत की सभ्यता की हत्या का सामान्यीकरण करने के तुल्य है। हाल ही में बिहार और झारखंड में भारतीय जनता पार्टी के नेताओं की चुनिंदा ढंग से हत्याएं की गईं। अतीत में इन्हें यह कहकर सामान्य बात स्थापित करने की कोशिश की जाती थी कि बिहार में तो ‘गनतंत्र’ है या यह तो बाहुबलियों का तरीका है। होते-होते इसे खास तौर पर बिहार की राजनीति का एक अनिवार्य और अपरिहार्य पहलू ठहरा दिया गया।

आज भी इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन पर तरह-तरह के आक्षेप लगाना वास्तव में इसी हत्यातंत्र की ओर लौटने के लिए अवसर की तलाश की कसमसाहट भर है। इस तरह की हिंसा को किसी भी ढंग से राजनीति के औजार के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। वास्तव में यह मत्स्य न्याय की अवधारणा है, जो कहीं से भी मनुष्यों की बस्ती के साथ मेल नहीं खा सकती। ऐसा प्रतीत होता है जैसे हत्याएं तो पूर्वनिश्चित ही थीं, इन हत्याओं को अंजाम देने के लिए चुनाव या चुनावी माहौल की प्रतीक्षा भर की जा रही थी। यह निराधार नहीं है।

पिछले काफी समय से पश्चिम बंगाल में बड़े पैमाने पर हथियारों और विस्फोटकों के पकड़े जाने की खबरें आती रही हैं। आमतौर पर माना जाता है कि जिस राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति लचर हो, वहां उजागर होने वाले आपराधिक मामले कुल मामलों का अधिकतम 10 प्रतिशत ही होते हैं। इसका अर्थ तो यही हुआ कि बहुत बड़े पैमाने पर तैयारी के साथ चुनाव का सिर्फ इंतजार किया जा रहा था, ताकि लक्षित ढंग से हत्याएं की जा सकें।

अगर कोई व्यक्ति अपने ही देश में राज्य पुलिस और केंद्रीय बलों की व्यवस्था होने के बावजूद इतना असुरक्षित हो कि उसके प्राणों की भी रक्षा न की जा सके, तो यह एक समाज के लिए कलंक की स्थिति है। इसे लोकतंत्र कहना या इसे सामान्य घटना जताना शर्मनाक ही नहीं आपराधिक भी है।

यही स्थिति राजस्थान में तब देखी गई थी, जब चुनाव में जीत का जश्न मनाने के लिए निकले विजय जुलूस ने हत्यारी भीड़ का रूप ले लिया था। और यह हत्याएं किनकी की जाती हैं? निश्चित रूप से उन लोगों की जो न केवल निशाने पर हैं, बल्कि वे लोग जो एक सहज शिकार साबित होते हैं, जिनके बारे में यह निश्चित होता है कि उनकी रक्षा करने न तो कानून आएगा और न ही कानून का अनुपालन कराने का वेतन लेने वाला तंत्र। जो मारे गए, उनका दोष सिर्फ यह था कि वह ऐसे मनुष्य थे, जिनकी चिंता सत्ता को नहीं थी।

प्रकारांतर से सरकार के लिए वे सौतेले या पराये नागरिक थे। यह सौतेलापन किसी राजनीतिक विचार के कारण नहीं था, बल्कि दंगाई और बहुत अंश जिहादी मानसिकता की तुष्टि-पुष्टि के लिए था। इसका संकेत इस तरह की अन्यत्र घटी कुछ समानांतर घटनाओं में देखा जा सकता है। जैसे-बांग्लादेश में एक विशेष दल के चुनाव जीतने पर जश्न मनाने के लिए हिंदुओं का नरसंहार किया गया। या जैसे इंग्लैंड के साथ क्रिकेट मैच में पाकिस्तान के एक खिलाड़ी के आउट होने पर श्रीनगर में कश्मीरी हिंदुओं के घर जला दिए गए। अथवा जैसे फुटबॉल के एक मैच का परिणाम आने पर फ्रांस में हिंसा करके जश्न मनाया गया। इन घटनाओं के जितने गहरे सरोकार बाकी बातों से हैं, उतना ही गहरा सरोकार भारत की सभ्यता के बिंदु से भी है।

अगर कोई व्यक्ति अपने ही देश में राज्य पुलिस और केंद्रीय बलों की व्यवस्था होने के बावजूद इतना असुरक्षित हो कि उसके प्राणों की भी रक्षा न की जा सके, तो यह एक समाज के लिए कलंक की स्थिति है। इसे लोकतंत्र कहना या इसे सामान्य घटना जताना शर्मनाक ही नहीं आपराधिक भी है।

संविधान, न्यायालयों और बाकी चीजों की बाध्यताएं चाहे हो भी हों, मानव जीवन की कीमत पर मत्स्य न्याय को जारी नहीं रहने दिया जा सकता है। सभी संबंधित पक्षों को एकमत से पश्चिम बंगाल को, बिहार को उन लोगों से बचाने के लिए निर्णायक कदम उठाने होंगे, जिन्होंने इन राज्यों को मानव जीवन के प्रतिकूल बना दिया है।
@hiteshshankar

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