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हरियाली अमावस्या क्यों है खास, जानें…

वैदिक मंत्रों के उदघोष हमारे जीवन में वृक्ष-वनस्पतियों की महत्ता को परिलक्षित करते हैं।

Written byपूनम नेगीपूनम नेगी
Jul 16, 2023, 10:46 pm IST
inभारत, धर्म-संस्कृति

पर्यावरण संरक्षण की चेतना हमारे सनातन वैदिक चिन्तन का प्राण तत्व है। वैदिक मनीषा  के “औषधय: शांति वनस्पतय: शांति:” जैसे वैदिक मंत्रों के उदघोष हमारे जीवन में वृक्ष-वनस्पतियों की महत्ता को परिलक्षित करते हैं। ऋषि वाणी कहती है कि वृक्ष वनस्पति भगवान नीलकंठ का स्वरूप हैं क्योंकि वे वायुमंडल की विषाक्त गैसों को पीकर हमें अमृतमयी प्राणवायु द्वारा जीवन का वरदान देते हैं। अतः वृक्षरोपण करना और पेड़-पौधों का संरक्षण-संवर्धन भगवान शिव को जलाभिषेक के समान ही पुण्यफलदायी है। वृक्षों का महिमामंडन करते हुए मत्स्य पुराण के ऋषि कहते हैं- “दश कूप समा वापी, दशवापी समोहद्रः। दशहृद समः पुत्रो, दशपुत्रो समो द्रुमः।” अर्थात दस कुएं खुदवाने से अधिक पुण्य एक बावड़ी खुदवाने से मिलता है, दस बावड़ियों के बराबर फल एक तालाब से, दस तालाबों के बराबर पुण्य एक योग्य पुत्र से और दस पुत्रों के बराबर पुण्य एक वृक्ष के रोपण से मिलता है। श्रावण मास में मनाया जाने वाला हरियाली अमावस्या का पर्व महादेव व मां पार्वती के पूजन-अर्चन के साथ विशेष रूप से पर्यावरण संरक्षण के महत्व को रेखांकित करता है। ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार इस वर्ष हरियाली रोपने का यह पर्व  उदया तिथि के आधार पर 17 जुलाई को पड़ रहा है।

हरियाली अमावस्या पर ग्रामीण मेलों का आयोजन भी किया जाता है। इन मेलों में उदयपुर का हरियाली अमावस्या का मेला सबसे खास है। इस मेले की खास बात यह है कि दो दिवसीय मेले का दूसरा दिन केवल महिलाओं के लिए आरक्षित होता है। सवा सौ सालों से चली आ रही यह परम्परा आज भी कायम है।

श्रावण मास में पड़ने के कारण  प्रकृति पूजन का यह पर्व श्रावणी अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन प्रातः काल स्नान के बाद भगवान शिव व मां पार्वती के पूजन-अर्चन नदियों व जलाशयों के किनारे बाद शुभ मुहूर्त में आम, आंवला, पीपल, वटवृक्ष, शमी और नीम आदि वृक्षों तथा तुलसी पौधे के रोपण की अत्यंत प्राचीन परम्परा है। सनातनधर्मी श्रद्धालु इस दिन विशेष रूप से वट, पीपल, आंवला और तुलसी की पूजा कर इन देव वनस्पतियों से आरोग्य का वरदान मांगते है। शास्त्रों में कहा गया है कि बरगद के पेड़ में त्रिदेवों ( ब्रह्मा, विष्णु और महेश) और आंवले में भगवान श्री लक्ष्मीनारायण, केले में श्री हरि विष्णु , बिल्व में त्रिपुरा सुंदरी, तुलसी में लक्ष्मी तथा वटवृक्ष अर्थात बरगद में देवाधिदेव शिव और शनिदेव का वास होता है। इसलिए इस दिन इन वृक्ष वनस्पतियों का पूजन का अत्यधिक फलदायी माना जाता है।  मान्यता है कि इस दिन कुछ विशेष वृक्षों की पूजा करने से ग्रह दोष दूर होते हैं और सुख और सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

ज्योतिषाचार्य डॉ. अनीष व्यास  के अनुसार इस वर्ष सावन के दूसरे सोमवार को हरियाली अमावस्या पड़ रही है। नकारात्मकता शक्तियों से बचने के लिए इस तिथि पर रुद्राभिषेक कराना बहुत शुभ फलदायी माना जाता है। शास्त्र कहते हैं कि इस दिन पवित्र नदी में स्नान करके पितरों के लिए पिंडदान, श्राद्ध कर्म करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस पर्व पर शिव पूजा से पितृ दोष, शनि दोष और कालसर्प दोष से मुक्ति का विधान भी हमारे शास्त्रों में बताया गया है। हरियाली अमावस्या के दिन देश भर के शिव मंदिरों के साथ ही वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर व द्वारकाधीश मंदिर में विशेष पूजा और दर्शन के कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। हरियाली अमावस्या का यह पर्व किसानों के लिए भी महत्वपूर्ण होता है। इस दिन किसान अपने खेती में उपयोग होने वाले विविध उपकरणों की पूजा कर तथा एक दूसरे को गुड़ और धानी की प्रसाद देकर ईश्वर से अच्छी फसल की कामना करते हैं।

शास्त्रों में कहा गया है कि बरगद के पेड़ में त्रिदेवों ( ब्रह्मा, विष्णु और महेश) और आंवले में भगवान श्री लक्ष्मीनारायण, केले में श्री हरि विष्णु , बिल्व में त्रिपुरा सुंदरी, तुलसी में लक्ष्मी तथा वटवृक्ष अर्थात बरगद में देवाधिदेव शिव और शनिदेव का वास होता है। इसलिए इस दिन इन वृक्ष वनस्पतियों का पूजन का अत्यधिक फलदायी माना जाता है।  मान्यता है कि इस दिन कुछ विशेष वृक्षों की पूजा करने से ग्रह दोष दूर होते हैं और सुख और सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

वर्षा ऋतु में मां प्रकृति की धानी चूनर के नैसर्गिक सौन्दर्य को बढ़ाने और निखारने वाला हरियाली अमावस्या का यह त्योहार देश  के राजस्थान, उत्तर प्रदेश,  मालवा, मध्य प्रदेश बिहार, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, उड़ीसा केरल व कर्णाटक जैसे विभिन्न राज्यों में स्थानीय लोक संस्कृतियों और परंपराओं के अनुसार मनाया जाता है। महाराष्ट्र में इसे ‘गतारी अमावस्या’, आंध्र प्रदेश में इसे ‘चुक्कल अमावस्या’ और उड़ीसा में इसे ‘चितलगी अमावस्या’, कर्णाटक में  ‘भीमाना अमावस्या’ केरल में  ‘कर्किदाका वावू बाली’  के रूप में जाना जाता है। इसका मूल संदेश धार्मिक परम्पराओं के माध्यम से लोगों के बीच प्रकृति को बचाने की जागरूकता पैदा करना है। हर्ष का विषय है कि बीते कुछ वर्षों में पर्यावरणीय जन चेतना जगाने वाली ‘लोकभारती’ जैसी सामाजिक संस्थाओं द्वारा इस पर्व पर वृहद स्तर पर पौधरोपण अभियान भी चलाये जा रहे हैं।

बताते चलें कि कई राज्यों में हरियाली अमावस्या पर ग्रामीण मेलों का आयोजन भी किया जाता है। इन मेलों में उदयपुर का हरियाली अमावस्या का मेला सबसे खास है। इस मेले की खास बात यह है कि दो दिवसीय मेले का दूसरा दिन केवल महिलाओं के लिए आरक्षित होता है। सवा सौ सालों से चली आ रही यह परम्परा आज भी कायम है। गौरतलब हो कि इस मेले की शुरूआत तात्कालिक महाराणा फतहसिंह के कार्यकाल के दौरान सन 1898 में हुई थी। महाराणा फतहसिंह ने दुनिया में पहली बार महिलाओं को अकेले मेले का आनंद उठाने का अधिकार दिया था। इसके लिए उन्होंने फतहसागर झील जिसे पहले देवाली तालाब कहा जाता था, उस पर पाल बनवाई और वहां महिलाओं का मेला आयोजित किया था। यह परंपरा तब से अभी तक चली आ रही है।

 

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