खून करो और माफी मांग लो
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खून करो और माफी मांग लो

भारत को सोचना होगा यहां ‘खून करो और माफी मांग लो’ की जो नई राजनीतिक परिपाटी पैदा हो रही है, वह न केवल राजनीति को, बल्कि एक समाज के तौर पर हम सभी को अंदर से खोखला, निर्लज्ज और अराजक बनाती चली जा रही है

Written byहितेश शंकरहितेश शंकर
Mar 1, 2023, 08:09 am IST
inभारत, सम्पादकीय

राजनीति की बेढंगी दलीलों से या सिर्फ एक माफीनामा लिख-पढ़ देने से कोई अपराध क्षम्य हो जाता है, तो व्यवहार में वह उसे एक मान्य राजनीतिक हथकंडे के तौर पर स्थापित करता जाता है। चंद व्यक्तियों के इस रोग को पूरी प्रक्रिया और समाज का रोग बनने से तुरंत रोकना होगा।

बड़े दुख की बात है कि भारत की राजनीतिक प्रतियोगिता में अब ऐसे पक्ष जुड़ते जा रहे हैं, जहां अराजकता को बढ़ावा और अपराध को अंतत: निरंतरता प्रदान करने की प्रवृत्ति बढ़ती नजर आती है। महत्वपूर्ण यह भी है कि जब इन अपराधों के लिए राजनेताओं की ओर उंगली उठी तो प्रथमत: अटपटी दलीलें देने या फिर माफी मांग लेने का स्वांग भी कर दिया गया।

वास्तव में उस माफी का भी कोई वास्तविक महत्व नहीं था, क्योंकि उसमें किसी तरह का अपराधबोध निहित नहीं था। यह इससे भी साफ दिखा कि वही अपराध दुबारा-तिबारा किया गया और फिर अजीब दलील देने या माफी मांग लेने का स्वांग भी दोहरा दिया गया। इस संबंध में एक स्पष्ट उदाहरण आम आदमी पार्टी का है।

  • उत्तर प्रदेश में कथित भड़काऊ भाषण के मामले में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को सर्वोच्च न्यायालय से फौरी राहत मिल गई है। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय के जस्टिस के.एम. जोसेफ और बी.वी. नागरत्ना की पीठ ने 2014 के इस भाषण के लिए केजरीवाल की आलोचना भी की है।

    दरअसल, यह दल अराजकता के नए प्रतिमान बनाता जा रहा है। अपराधबोध से परे अपराध को बार-बार दोहराने की बढ़ती आदत को उजागर करते कितने उदाहरणों की बात की जाए? दिवंगत अरुण जेटली पर हर तरह के आरोप लगाने के बाद अंतत: इस पार्टी के नेता उन्हीं के पास माफी मांगने पहुंचे थे, और बिना शर्त माफी मांगने की औपचारिकता पूरी करके बरी हो गए थे। लेकिन फिर यही स्थिति नितिन गडकरी पर लगाए गए आरोपों के संदर्भ में बनी।

    ताजा मामले में भी दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने अपने वकील के जरिए से सर्वोच्च न्यायालय में इस केस की कार्रवाई पर रोक लगाने की गुहार लगाई थी। वकील ने केजरीवाल की तरफ से कहा, ‘‘अब मैं मुख्यमंत्री हूं, कृपया कार्रवाई पर रोक लगा दीजिए।’’

    क्या विचित्र तर्क है कि चूंकि अब मैं मुख्यमंत्री हूं, इसलिए मुझे अदालत की कार्रवाई राहत दी जाए। मुख्यमंत्री ने तो शपथ ही संविधान के अनुरूप व्यवहार करने की ली होती है। यह सिर्फ अपराध नहीं, आदतन अपराध का मामला है।

    क्या लोकतंत्र जुबानी जमा खर्च के आधार पर चलेगा? राजनीति में चालाकी भरे प्रयोग हमेशा से होते रहे हैं, लेकिन धूर्तता और निर्लज्जता का यह स्तर स्वस्थ लोकतंत्र के अनुरूप नहीं है। जिनमें सत्य को स्वीकार कर सकने का साहस नहीं है, वे सत्य से मुंह छिपाने के लिए इस किस्म के तरीके अपनाते हैं और इस तरह अराजकता को बड़ी से बड़ी मान्यता दिलाते चले जा रहे हैं। नियम और मर्यादा को ही चुनौती देने वाला कोई भी राजनीतिक हथकंडा अपनाया जाए और जब उसे कसौटी पर कसने की नौबत आए, तब माफी मांग ली जाए, कहा जाए कि मेरा आशय यह नहीं था, यह तो गलती से मुंह से निकल गया था – यह एक नया चलन चल पड़ा है।

  •  आज स्वयं को कट्टर ईमानदार कहने वाली पार्टी के कितने नेता भ्रष्टाचार के कितने मामलों में अभियोगी, आरोपी या संदिग्ध हैं, इसकी गिनती करना सरल नहीं है।
  •  पंजाब में बढ़ती अराजकता और राजनीतिक चुप्पी के निहितार्थ का अनुमान लगाना आसान नहीं है।
  •  इसी तरह, जेल में बंद भ्रष्टाचार के आरोपी नेता को मंत्री पद से बर्खास्त करने के बजाए, उसे जेल में हर तरह की सुविधा देना और आरोपों के मसले पर यह कह देना कि उनकी तो याद्दाश्त खत्म हो चुकी है, अपने आप में एक हास्यास्पद विडंबना नहीं, बल्कि इस देश के कानूनों का मखौल बनाने की निर्लज्जता है।

    प्रश्न फिर वही है- आप कानून के शिकंजे से भले ही फिसल कर निकल जाते हों, जिस पर भौतिक या राजनीतिक अनुचित प्रहार हुआ, उसे तो न्याय नहीं मिला। यह लोकतंत्र, संस्कृति, सभ्यता और राजनीति की क्षति है। वास्तव में यह स्थिति आदिम युग से भी गई बीती है। कबीलों का न्याय भी न केवल मर्यादित हुआ करता था, बल्कि अपराध की स्वीकारोक्ति उसका सबसे महत्वपूर्ण अंश होता था। जिसका स्पष्ट अर्थ यह है कि किसी भी स्थिति में अपराध दोहराया नहीं जा सकता। अन्यथा उसका दंड और बढ़ता जाता है। कई देशों में तो न्याय प्रणाली भी इसी सिद्धांत पर टिकी है कि अगर कोई अपराधी अपनी सजा को टालने या उससे बचने की कोशिश करता है, तो न्यायपालिका उसकी सजा का परिमाण और बढ़ा देती है।

    भारत को सोचना होगा यहां ‘खून करो और माफी मांग लो’ की जो नई राजनीतिक परिपाटी पैदा हो रही है, वह न केवल राजनीति को, बल्कि एक समाज के तौर पर हम सभी को अंदर से खोखला, निर्लज्ज और अराजक बनाती चली जा रही है। राजनीति की बेढंगी दलीलों से या सिर्फ एक माफीनामा लिख-पढ़ देने से कोई अपराध क्षम्य हो जाता है, तो व्यवहार में वह उसे एक मान्य राजनीतिक हथकंडे के तौर पर स्थापित करता जाता है। चंद व्यक्तियों के इस रोग को पूरी प्रक्रिया और समाज का रोग बनने से तुरंत रोकना होगा।
    @hiteshshankar

Topics: Civilization and Politicsआम आदमी पार्टीAam Aadmi Partyअरविंद केजरीवालArvind Kejriwalलोकतंत्रDemocracyसंस्कृतिCulture‘खून करो और माफी मांग लो’सभ्यता और राजनीति
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हितेश शंकर पत्रकारिता का जाना-पहचाना नाम, वर्तमान में पाञ्चजन्य के सम्पादक [Read more]
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