प्रश्न मुफ्त की रेवड़ी नहीं, उसे दे पाने का है - निर्मला सीतारामन
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प्रश्न मुफ्त की रेवड़ी नहीं, उसे दे पाने का है – निर्मला सीतारामन

पाञ्चजन्य के 75 वर्ष पूरे होने पर हुए कार्यक्रम में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारामन ने विभिन्न ज्वलंत प्रश्नों के बेबाक उत्तर दिए। उन्होंने साफ कहा कि मुफ्त की रेवड़ी विषय नहीं है, विषय उसे दे पाने की क्षमता का है। उन्होंने कहा कि मध्यम वर्ग की परेशानियां सरकार के ध्यान में हैं। प्रस्तुत है पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर और तृप्ति श्रीवास्तव के साथ निर्मला सीतारामन की बातचीत के संपादित अंश : -

Written byहितेश शंकरहितेश शंकर
Jan 26, 2023, 10:07 pm IST
in भारत, साक्षात्कार
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारामन

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारामन

निर्मला जी! सभी लोग आपको सुनने के लिए इस सभागार में और बाहर व्यग्र हैं क्योंकि आप देश का पांचवां बजट पेश करने वाली हैं। पिछले पांच बजटों में आपको सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण बजट कौन-सा लगा?
सर्वप्रथम धन्यवाद कि मुझे आज पाञ्चजन्य का 75वां वर्ष पूरा होने के समारोह में आपके समक्ष बात करने का अवसर मिल रहा है। मैं आपके प्रश्न का नीरस जवाब देने वाली हूं। हर बजट चुनौतीपूर्ण होता है। हर साल का बजट उनकी अपनी चुनौती के साथ ही आता है।

अगर एनपीए की बात करें तो पिछले 7-8 सालों में काफी सुधार आया है। ऐसा क्या था कि पिछली सरकारों में उनका प्रदर्शन उतना अच्छा नहीं रहा और ऐसा क्या किया गया है कि अब ये सुधार की तरफ दिखाई दे रहा है।
पिछले सरकार और इस सरकार में फर्क बैंकों के साथ व्यवहार करने के तरीके में है। जमीन-आसमान का फर्क है और सैद्धांतिक रूप से वैचारिक फर्क भी है। एक पेशेवर संस्था के रूप में बैंकों का देश की अर्थव्यवस्था में बहुत बड़ा योगदान है और उनको पेशेवराना रुख के साथ चलाने की स्वतंत्रता देनी चाहिए। ये है मोदी जी का पक्ष। विभिन्न पूर्ववर्ती सरकारों का रवैया यह था कि हमारी अपनी पार्टी के कार्यकर्ता, भतीजा, भाई, बहन, जीजा जी सब, कैसे उनसे अवैध लाभ ले सकते हैं, इसके लिए पूरी बेशर्मी के साथ बैंकों का उपयोग करना। यही है मौलिक अंतर।

हम 2014 से कैसे सुधार ले आये, तो हमने 2014 में संपत्ति गुणवत्ता समीक्षा की। उस समय ही हमारी सरकार ने पहचाना कि चार कदम उठाने पड़ेंगे। पहला, मानना होगा कि बैंक में एनपीए की समस्या है। यह बहुत ही कठिन काम है क्योंकि हरेक एकाउंट देखना पड़ता था कि कितना बचा है और इसमें उनके कागजातों का मूल्य क्या है। एनपीए है कि नहीं है, और एनपीए है तो इसका वास्तव में क्या असर पड़ेगा। पैसा वापस मिलने की गुंजाइश है कि नहीं। दूसरा, समस्या को कैसे सुलझाना है? इसके लिए तुरंत कार्रवाई करना है, बैंक के स्तर पर निर्णय लेना है, अगर सतर्कता विभाग से जुड़ा विषय है तो सीवीसी के साथ तालमेल रख के उसको कैसे सुधारना है, यह करना पड़ता है। तीसरा, बैंक का पुनर्पूंजीकरण करना, उसके लिए सरकार की ओर से पैसा देना। चौथा, ये सब करने के बाद बैंक के पेशेवर संचालन के लिए सुधार लागू करना। ये सुधार के चरण हमने लागू किए। इसी कारण से आज सार्वजनिक बैंकों की सेहत इतनी अच्छी है कि बाजार भी उन्हें पैसा देने को तैयार है। तो यही है इस सरकार का कदम, पहले बैंक को पेशेवर ढंग से चलने देना और दूसरा, अब तक शेष पैसे को धीरे-धीरे वापस लाना। ये ही है फर्क।

इस देश की वित्त मंत्री के तौर पर फ्रीबीज की राजनीति के बारे में आप क्या सोचती हैं? यह राजनीति की कौन सी दिशा है? इसने कितना उबाल पैदा किया है, उत्साह पैदा किया है और कौन सी चिंताएं पैदा की हैं?
फ्रीबीज की चर्चा तो सभी बहुत तेजी से कर रहे हैं। इसमें एक-दूसरे को फंसाने के लिए ये प्रश्न उठाते हैं कि कौन सा आइटम फ्रीबी है, कौन सा नहीं। परंतु मुद्दा ये है कि अगर आप चुनाव के समय कोई वादा करते हैं और सरकार में आने के बाद पता चलता है कि राज्य की वित्त व्यवस्था ठीक है, तो वादा पूरा कीजिए, उसके खर्च को बजट में शामिल कीजिए। यानी बजट में प्रावधान करके वादा पूरा कर सकते हैं तो वह फ्रीबी नहीं है। हम उदाहरण देख रहे हैं कि बहुत सारे राज्यों में ये नहीं होता। वादा कर दिया और बिजली भी दे दी। मगर भुगतान मोदी जी करें। वादा आप करेंगे, वोट आप लेंगे, मगर जब भुगतान की बारी आती है तो वह कोई और करे। अब वो बकाया संचित होता जाता है। पता नहीं, कौन, कब उसका भुगतान करेगा। ऊर्जा क्षेत्र में आज यही दिक्कत हो रही है। अगर आपके राज्य में इतना राजस्व है और आप वादा पूरा कर रहे हैं तो भुगतान करें। मुख्य मुद्दा यही है।

अभी कोविड के समय सरकार राजस्व व्यय पर ज्यादा जोर दे रही थी। अभी पूंजीगत व्यय पर ज्यादा जोर दे रही है। तो ये अंतर क्यों है और इसको कैसे समझे?
तब भी पूंजीगत व्यय ज्यादा था। मगर जो खर्च उस समय उठाना था, जैसे वैक्सीन के लिए पैसा देना है, तो देना है। बाद में हमने बजट में प्रावधान किया। इसलिए राजस्व व्यय जहां खर्च करना है, वहां करना होगा। चैरिटी के लिए, समाज कल्याण के लिए जो खर्च उठाना है, वो अभी भी उठा रहे, तब भी उठाए। उसमें कोई कटौती नहीं है। मगर 2020 से फर्क यह है कि सार्वजनिक बुनियादी ढांचा निर्माण के लिए पूंजीगत व्यय को हम लगातार बढ़ा रहे हैं। एक ही साल में 35 प्रतिशत बढ़ा दिया। ऐसे ही लगभग 35 प्रतिशत पिछले साल भी बढ़ाया। पिछले साल जो 5.54 लाख करोड़ था, इस साल 7.50 लाख करोड़ है। इसमें सभी अर्थशास्त्री सहमत होंगे कि राजस्व व्यय से आपको 1 रुपये खर्च करने में सिर्फ 45 पैसा फायदा मिलेगा। मगर जब बुनियादी ढांचे और पूंजीगत व्यय में 1 रुपया खर्च करेंगे तो अल्पकाल और दीर्घकाल, दोनों में 3.45 रुपये तक उसका लाभ मिलेगा। इसीलिए हम पूंजीगत व्यय के रास्ते पर चलते हुए 7.5 लाख करोड़ का खर्च कर रहे हैं।

मैं भी मध्यम वर्ग की हूं। मध्यम वर्ग के दबावों को मैं समझती हूं। परंतु सरकार के अब तक के काम को मैं आपके सामने रखना चाहती हूं। अब तक मध्यम वर्ग पर कोई नया कर नहीं लगा। दूसरे, पांच लाख रुपये तक की आमदनी को आयकर मुक्त किया। तीसरे, शहरी सुविधाओं को देखिए। आवागमन के लिए सार्वजनिक परिवहन पर ज्यादा निर्भर मध्यम वर्ग ही रहता है। हम 27 शहरों में मेट्रो लेकर आए। क्या वो मध्यम वर्ग के लिए उपयोगी नहीं है? चौथे, मध्यम वर्ग ज्यादातर गांवों से शिफ्ट कर के आज शहरों में अपने व्यवसाय या रोजगार के लिए आता है। सरकार ने 100 शहरों को स्मार्ट सिटी बनाने के लिए पैसा दे दिया। यह कदम क्या मध्यम वर्ग के जीवन को आसान करने के लिए नहीं है? 111 लाख घरों तक पेयजल पहुंचा। मगर बात सही है कि हां, और कर सकते हैं। इस देश में मध्यम वर्ग की संख्या बहुत बड़ी होती जा रही है। मैं मध्यम वर्ग की समस्याओं को अच्छी तरह देख रही हूं। इतना ही कहूंगी, कर रहे हैं, करेंगे भी।

कुछ अलग मुद्दे भी हैं। देश में काफी ड्रग्स पकड़ी जा रही है। डीआरआई के कार्यक्रम में आपने कहा था कि अगर ड्रग्स पर लगाम लगानी है तो बड़ी मछलियों को पकड़ो। तो ये बड़ी मछलियां कौन हैं?
हरेक एजेंसी को ज्यादातर मालूम है। वे पूरी कोशिश करती हैं कि अंतिम व्यक्ति जो फंड करता है, उन तक पहुंचे। मगर इतना सीधा रास्ता भी नहीं है और पकड़ने में भी बहुत मेहनत करनी पड़ती है। मगर इसमें सेकंड ओपिनियन होने की संभावना नहीं है कि छोटे स्तर पर छोटे-छोटे पैकेट के साथ बिक्री करने वाले छोटे लोगों को पकड़ना आसान है। मगर उनसे सूचना निकाल कर उनके पीछे कौन-कौन है, उन तक पहुंचना ही इस सिस्टम को रोकने में हमें सफल बनाएगा।

वर्ष 2013 से पहले विश्व की आर्थिक व्यवस्था में भारत की गिनती फ्रेजाइल फाइव में होती थी। और, अब भारत चमकता हुआ सितारा दिखता है। भारत की अर्थव्यवस्था में बहुत उम्मीदें दिखती हैं। यह परिवर्तन कैसे हुआ, इसका कारण क्या है?
हां, 2008-09 में वित्तीय संकट के चलते जिन देशों की अर्थव्यवस्थाओं को बहुत क्षति हुई, उन्हें फ्रेजाइल फाइव कहा गया। इंडोनेशिया, दक्षिण अफ्रीका, टर्की, ब्राजील के साथ पांचवें देश हम भी एक थे। उस समय हमारी महंगाई दर दहाई में थी। और भ्रष्टाचार के कारण विदेशी निवेशक भी भारत से निकलने लगे। हमारे बहुत सारे उद्योग भी कोई उम्मीद न होने से देश छोड़ कर निकल गए। आर्थिक व्यवस्था में किसी सुधार या प्रक्रिया सरलीकरण का कोई प्रयत्न नहीं था। हमारा विदेशी मुद्रा भंडार एकदम से घटकर नाजुक स्थिति में आ गया था। मैक्रो इकनॉमिक फंडामेंटल्स के सभी सूचकांक कमजोर हो गए। मगर उसके बाद जब 2014 में माननीय मोदी जी के नेतृत्व में हमारी सरकार बनी, तो पहले दो वर्षों में एक-एक करके उन सबको सही करने के बहुत प्रयत्न हुए। बैंकों को मजबूत किया। एफडीआई नीति को बदला, जिसका तीव्र प्रत्युत्तर मिला। जीएसटी ले आये, आईबीसी कोड ले आए। ऐसे बहुत सारे कदम उठाने से हम फ्रेजाइल फाइव से बाहर आ सके। आज हमारा विदेशी मुद्रा भंडार अच्छी स्थिति में है। हमारी अर्थव्यवस्था का सम्मान है। स्थायी सरकार है। डॉलर को छोड़ कर बाकी सब देशों की मुद्राओं के सामने भारत का रुपया मजबूत स्थिति में है। विश्व बैंक ने पूरा दुनिया के अमाउंट ग्रोथ नंबर को कम करने के समय हमारा भी कम किया। इसके बावजूद हम सबसे तेज बढ़ रही अर्थव्यवस्था बने हुए हैं। यही फर्क है।

अर्थव्यवस्था को जो सबसे ज्यादा मजबूती देते हैं, वो हैं युवा जो उभरती अर्थव्यवस्था के तौर पर देखे जाते हैं। जब युवा रोजगार ढूंढने जाता है और अगर वह उद्यमिता जैसा कोई जोखिम भरा काम करता है तो उसको भरोसा चाहिए होता है। तो जो युवा रोजगार के लिए उद्यमिता का रुख करते हैं तो सरकार की तरफ से किस तरह का प्रोत्साहन है। रोजगार के लिए सरकार का प्रोत्साहन क्या है?
इसमें बहुत हिस्से हैं। जब युवा स्टार्टअप के लिए आता है तो वह आइडिया तक सीमित रहता है। उसका पेटेंट लेने, उसका मैन्युफैक्चरिंग करने या वाणिज्यिक बिक्री के लिए उसका पैमाना बढ़ाने की क्षमता उनके पास नहीं होती। तो जब तक आइडिया पर काम होना है, उसमें भी सरकार फंडिंग के जरिए मदद देती है। सरकार मदर आफ फंड सिडबी के जरिए मदद करती है। आइडिया परिपक्व होने के बाद उसके परीक्षण के समय भी सरकार से सहयोग मिलता है। स्टार्टअप का टैक्स लाभ भी मिलता है। स्टार्टअप को फंडिंग करने वाले निवेशक को भी कर लाभ मिलता है। इसके अलावा एमएसएमई को भी ब्याज में सब्सिडी देते हैं और जब कोविड के समय पर उनको बहुत ही दिक्कत आई। बिना अतिरिक्त जमानत के सरकार ने फेवरेबल व एमरजेंसी लिक्विडिटी क्रेडिट गारंटी स्कीम दी जिससे कोविड के समय और उसके बाद भी, उनका व्यवसाय बंद नहीं हुआ और उनके कर्मचारियों को नौकरी से नहीं हटाना पड़ा।

पाकिस्तान, श्रीलंका के हालात हम देख रहे हैं। उसके बावजूद कई विदेशी संस्थाएं इन सबको पीछे छोड़ते हुए भारत की छवि को बहुत नकारात्मक दिखाती हैं। रोटी के लिए पाकिस्तान परेशान है और हंगर इंडेक्स में भारत सबसे नीचे है। इसी तरह गरीबी, बेरोजगारी पर सर्वे आते हैं। इस पर आप क्या कहेंगी?
ये सूचकांक बनाने वाली संस्थाएं किसी देश की सरकारी संस्थाएं नहीं हैं बल्कि एनजीओ हैं। हमारे देश में भी ऐसे वर्ग हैं जो उनके सूचकांक का उपयोग करते हुए हमारी ही सरकार को पीटना चाहते हैं। उनके लिए वह अस्त्र है। आजकल ये एनजीओ कैसे गलत सूचकांक तैयार कर रहे हैं, उसके ऊपर बार-बार बहुत सारे लोग लिखते हैं। भारत का अगर एक एनजीओ दूसरे देश के खिलाफ लिखे कि उन देशों में कितनी बंदूकों से हिंसा होती है। बच्चे स्कूल में जाकर मरते हैं। उनके टीचर मरते हैं। लेकिन हमारे यहां के एनजीओ की रिपोर्ट को उन देशों में कोई ट्रैक्शन नहीं मिलेगा। मगर हम उन एनजीओ के रिपोर्ट पर अपने देश में ट्रैक्शन देते हैं। उसके आधार पर अपनी सरकार पर हमले होते हैं। हमको सही सटीक जवाब के साथ पूछना चाहिए कि आप डेटा निकालो, जमीन पर कितने आपके शोधकर्ता हैं। कितनी जमीनी हकीकत का परीक्षण किया। कोई जवाब नहीं मिलेगा।

आपको लगता है कि उन लोगों के कुछ स्लीपर सेल जैसे लोग यहां पर मीडिया में, अकादमिक जगत में हैं?
हां, हो सकते हैं। उनके पेरोल पर भी हो सकते हैं। भारत में कुछ लोग उनके पेरोल पर हैं जो शायद उनके लिए काम करते हैं।

ऐसे ही प्रोपगेंडा का शिकार कृषि कानून भी हुआ। उन्होंने जो माहौल बनाया, उससे प्रधानमंत्री जी को वह बिल वापस लेने पड़े। इससे क्या किसानों की आय पर असर पड़ेगा?
मैं ऐसा नहीं मानती हूं। किसान के लिए जो भी करना है, प्रधानमंत्री जी उस पर अड़े रहे हैं, वो काम चलता रहेगा। उसमें कोई पीछे होने की संभावना नहीं है क्योंकि किसानों की आय दुगुनी होनी है। मगर उस कानून पर प्रधानमंत्री जी उस समय सही बोले कि शायद हम कुछ वर्गों को समझा नहीं पा रहे।

इस समय भारत के मध्यम वर्ग को काफी उम्मीदें हैं आपके बजट से। लोग पीपीएफ की सीमा, 80-सी, के बारे में उत्सुक हैं। आपकी क्या राय है।
मैं भी मध्यम वर्ग की हूं। मध्यम वर्ग के दबावों को मैं समझती हूं। परंतु सरकार के अब तक के काम को मैं आपके सामने रखना चाहती हूं। अब तक मध्यम वर्ग पर कोई नया कर नहीं लगा। दूसरे, पांच लाख रुपये तक की आमदनी को आयकर मुक्त किया। तीसरे, शहरी सुविधाओं को देखिए। आवागमन के लिए सार्वजनिक परिवहन पर ज्यादा निर्भर मध्यम वर्ग ही रहता है। हम 27 शहरों में मेट्रो लेकर आए। क्या वो मध्यम वर्ग के लिए उपयोगी नहीं है? चौथे, मध्यम वर्ग ज्यादातर गांवों से शिफ्ट कर के आज शहरों में अपने व्यवसाय या रोजगार के लिए आता है। सरकार ने 100 शहरों को स्मार्ट सिटी बनाने के लिए पैसा दे दिया। यह कदम क्या मध्यम वर्ग के जीवन को आसान करने के लिए नहीं है? 111 लाख घरों तक पेयजल पहुंचा। मगर बात सही है कि हां, और कर सकते हैं। इस देश में मध्यम वर्ग की संख्या बहुत बड़ी होती जा रही है। मैं मध्यम वर्ग की समस्याओं को अच्छी तरह देख रही हूं। इतना ही कहूंगी, कर रहे हैं, करेंगे भी।

Topics: फ्रीबीज की राजनीतिबेरोजगारीeconomic systemवित्त मंत्रीप्रोपगेंडा का शिकार कृषि कानूनIndia shining starमध्यम वर्गपीपीएफ की सीमाentrepreneurshipस्मार्ट सिटी80-सीhunger indexआर्थिक व्यवस्थाFifth Budgetcovidfunding startupsभारत चमकता हुआ सिताराNPAyouth employmentpovertyउद्यमिताNirmala jiकोविडunemploymentयुवा रोजगारpolitics of freebiesपांचवां बजटvictim of propaganda Agriculture Lawहंगर इंडेक्सfinance ministerएनपीएLimit of PPFस्टार्टअप को फंडिंगmiddle classनिर्मला जी80-Cगरीबीsmart city
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हितेश शंकर पत्रकारिता का जाना-पहचाना नाम, वर्तमान में पाञ्चजन्य के सम्पादक [Read more]
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