गुजरात का गर्जन
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गुजरात का गर्जन

राजनीतिक इतिहास में कभी ऐसी घटना नहीं घटी, जो 8 दिसंबर को गुजरात में घटी। सभी राजनीतिक पंडितों के अनुमानों को ध्वस्त करते हुए भाजपा ने विधानसभा चुनाव में प्रचंड जीत प्राप्त की।

Written byपंकज रावल एवं शैलेष सावलिया, गुजरात सेपंकज रावल एवं शैलेष सावलिया, गुजरात से
Dec 12, 2022, 12:30 pm IST
in भारत, विश्लेषण, गुजरात
नतीजे आने के बाद कार्यकर्ताओं के साथ जीत का जश्न मनाते हुए मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल

नतीजे आने के बाद कार्यकर्ताओं के साथ जीत का जश्न मनाते हुए मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल

गुजरात विधानसभा चुनाव में भाजपा को अभूतपूर्व जीत मिली। उसने 182 विधानसभा क्षेत्रों में से 156 पर जीत दर्ज की। ऐसी जीत कभी किसी पार्टी को नहीं मिली थी। गुजरात की जनता ने एक बार फिर से विकास का दामन थामा

आज तक के राजनीतिक इतिहास में कभी ऐसी घटना नहीं घटी, जो 8 दिसंबर को गुजरात में घटी। सभी राजनीतिक पंडितों के अनुमानों को ध्वस्त करते हुए भाजपा ने विधानसभा चुनाव में प्रचंड जीत प्राप्त की। 1960 में गुजरात राज्य के गठन के बाद से आज तक के इतिहास में कभी किसी भी पार्टी को गुजरात में इतनी भव्य जीत नहीं मिली थी।1985 में माधवसिंह सोलंकी के नेतृत्व में कांग्रेस ने 148 सीटें जीती थीं। कांग्रेस के कीर्तिमान को 2022 में भाजपा ने तोड़ दिया। भाजपा ने 182 में 156 सीट पर जीत दर्ज की। 27 साल से राज कर रही भाजपा के विरुद्ध सत्ता विरोधी लहर भी नहीं दिखी और उसने 16वीं विधानसभा के लिए हुए चुनाव को बहुत ही दमदार तरीके से जीत लिया। मतदाताओं ने राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस का यह हाल किया कि वह विपक्ष में बैठने लायक भी नहीं रही।
इस चुनाव ने कई आशंकाओं को समाप्त किया है और अनेक प्रश्नों के उत्तर भी दिए हैं।

2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद आशंका पैदा हुई थी कि गुजरात को कौन संभालेगा? राज्य में भाजपा का भविष्य क्या होगा? मोदी की जगह जो भी नेता मुख्यमंत्री बनेगा, वह लोगों की अपेक्षाओं पर खरा उतर पाएगा या नहीं? रुपाणी के बाद 2017 में पहली बार विधायक बने भूपेंद्र पटेल को मुख्यमंत्री बनाया गया। कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दलों ने इसे मुद्दा भी बनाया और कहा कि भाजपा ने हार के डर से सरकार बदली है। पर इन बातों का गुजरात के लोगों पर कोई असर नहीं हुआ और उन्होंने एक बार फिर से भाजपा को राज्य की सत्ता दे दी। दरअसल, भूपेंद्र पटेल ने प्रधानमंत्री और गृह मंत्री अमित शाह के मार्गदर्शन में कुछ ही समय में कई सकारात्मक कार्य किए। इससे जो थोड़ी-बहुत सत्ता विरोधी लहर थी, वह पूरी तरह खत्म हो गई। इस कारण पूरे राज्य में भाजपा की ऐसी लहर चली कि उसने अमदाबाद, सूरत, वडोदरा और राजकोट की 55 में से 53 सीटों पर जीत दर्ज की। कच्छ की छह में से छह सीटों पर भाजपा को जीत मिली। हालांकि कुछ जगहों पर कुछ कमी का सामना करना पड़ा। इस कारण वहां भाजपा को हार भी मिली। इसका उदाहरण है पाटन जिला। इस जिले की तीनों सीटों पर भाजपा हार गई।

पाटीदार आंदोलन के कारण 2017 में जिन 54 सीटों पर भाजपा को नुकसान हुआ था, उनमें से 40 पर भाजपा को जीत मिली। गोधरा नरसंहार के बाद हुए चुनाव में भाजपा के पास इनमें से 38 सीटें आई थी।

भाजपा की आंधी के सामने विधानसभा में विपक्ष के नेता परेश धानानी भी नहीं टिक पाए। वे अमरेली से भाजपा के कौशिकभाई वेकरिया से हार गए तो आम आदमी पार्टी के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार इशुदान गढवी खंभालिया से और प्रदेश अध्यक्ष गोपाल इटालिया सूरत से चुनाव हार गए। जबकि अरविंद केजरीवाल चुनावी सभाओं में कहा करते थे, ‘‘लिखकर ले लो, इशुदान गढवी और गोपाल इटालिया चुनाव जीत रहे हैं। साथ ही आम आदमी पार्टी की सरकार बन रही है। सरकार बनते ही भाजपा के नेताओं को जेल भेजा जाएगा।’’ अब उनके बड़बोलेपन का लोग मजाक उड़ा रहे हैं।

दक्षिण गुजरात की 35 में से 30, मध्य गुजरात की 40 में से 36, उत्तर गुजरात की 53 में से 42 और सौराष्ट्र-कच्छ की 54 में से 45 सीटों पर भाजपा ने जीत दर्ज की है। भाजपा से बगावत कर वडोदरा से चुनाव लड़ने वाले मधुभाई श्रीवास्तव चुनाव हार गए। भाजपा ने जनजाति-बहुल दाहोद-पंचमहाल क्षेत्र की सारी सीटें भी जीत ली हैं। भाजपा के सिर्फ दो मंत्री चुनाव हारे। सौराष्ट्र की राजधानी राजकोट में शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में आठ सीटें हैं। इन सभी पर भाजपा को जीत मिली। आजादी के बाद 2017 तक बोरसद सीट पर कांग्रेस का कब्जा था। इस बार वह सीट भाजपा की झोली में चली गई। पूर्व मुख्यमंत्री विजय रुपाणी की सीट राजकोट पश्चिम मेें कीर्तिमान टूट गया। पिछली बार रुपाणी ने यहां 70,000 मतों से जीत दर्ज की थी। इस बार भाजपा ने उनकी जगह दर्शिता शाह को टिकट दिया। उन्होंने 1,05,000 मत से इस सीट पर विजय पाई। मोरबी, जहां पिछले दिनों पुल हादसा हुआ, वहां से कान्तिलाल अमृतिया भारी बहुमत से चुनाव जीत गए हैं।

गुजरात के लोगों ने रचा इतिहास : नरेंद्र मोदी

नई दिल्ली स्थित भाजपा मुख्यालय में (बाएं से) राजनाथ सिंह, नरेंद्र मोदी, जे.पी. नड्डा और अमित शाह

गुजरात विधानसभा चुनाव में भाजपा की प्रचंड जीत के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नई दिल्ली स्थित भाजपा के केंद्रीय कार्यालय में कार्यकर्ताओं को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि जनता के सामने नतमस्तक हूं। गुजरात की जनता का आभार। हिमाचल के मतदाता का भी बहुत-बहुत आभारी हूं। भाजपा के कार्यकर्ताओं ने जो परिश्रम किया है, उसकी महक आज हम चारों तरफ अनुभव कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश के रामपुर में भाजपा को जीत मिली है। बिहार के उपचुनाव में भाजपा ने जैसा प्रदर्शन किया है, वह आने वाले दिनों का संकेत है। हिमाचल प्रदेश की जनता को विश्वास दिलाता हूं कि भले एक प्रतिशत से पीछे रहे, लेकिन विकास के लिए हम 100 प्रतिशत आगे रहेंगे। उन्होंने कहा कि हिमाचल में कभी कमी नहीं आने देंगे। भाजपा का बढ़ता जनसमर्थन दिखाता है कि परिवारवाद और भ्रष्टाचार के खिलाफ जनाक्रोश बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि गुजरात ने इस बार कमाल ही कर दिया। जहां भाजपा प्रत्यक्ष नहीं जीती, वहां भाजपा का मत प्रतिशत भाजपा के प्रति स्नेह का साक्षी है। मैं गुजरात, हिमाचल प्रदेश और दिल्ली की जनता का विनम्र भाव से आभार व्यक्त करता हूं। गुजरात के लोगों ने रिकॉर्ड का भी रिकॉर्ड तोड़ दिया है। सबसे प्रचंड जनादेश देकर गुजरात के लोगों ने नया इतिहास बना दिया है। उन्होंने कहा कि भाजपा अपने कार्यकर्ताओं की संगठन शक्ति पर भरोसा करती है। इसी के बल पर पार्टी अपनी रणनीति बनाती है और उसमें सफल भी होती है। उन्होंने कहा कि युवा तभी वोट देते हैं जब उन्हें भरोसा होता है और सरकार का काम सबके सामने नजर आता है। आज युवाओं ने जब भाजपा को भारी संख्या में वोट दिया है तो इसके पीछे का संदेश बहुत स्पष्ट है कि युवाओं ने हमारे काम को जांचा, परखा और उस पर भरोसा किया है।

जीत के कारण
इस चुनाव में भाजपा की जीत के अनेक कारण रहे। मुख्य कारण रहा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का करिश्माई चेहरा। लोगोें ने सभी तरह के समीकरणों से ऊपर उठकर नरेंद्र मोदी के कार्यों को देखकर मतदान किया। गुजरात के लोगों ने अरविंद केजरीवाल की नीति को भी नकार दिया। लोगों ने केजरीवाल के ‘मुफ्त माल’ को लेने से मना कर दिया। केजरीवाल को शायद यह नहीं पता था कि गुजरात के जिन लोगों को वे मुफ्त बिजली देने की बात कर रहे थे, उनमें से 8,00,000 से अधिक लोगों के घरों में सौर ऊर्जा का संयंत्र लगा है। इससे वे लोग इतनी बिजली पैदा कर लेते हैं कि उसे बेचकर पैसा कमा लेते हैं।

ये लोग 8000 मेगावाट बिजली पैदा कर रहे हैं। ऐसे ही केजरीवाल ने कहा कि गुजरात में शिक्षा का बुरा हाल है। उन्हें पता होना चाहिए कि गुजरात में स्कूल-कॉलेज के साथ-साथ पेट्रोलियम विश्वविद्यालय, रेल विश्वविद्यालय, फोरेन्सिक साइंस जैसे संस्थान हैं। देश की पहली ‘चिल्ड्रन यूनिवर्सिटी’ भी गुजरात में ही है। इस तरह के शिक्षण संस्थान और राज्यों में नहीं हैं। स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी गुजरात में बहुत अच्छा कार्य हुआ है। यहां के हर जिले में एक मेडिकल कॉलेज है। अत्याधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित स्वास्थ्य सुविधाएं गांव-गांव तक फैली हैं। गरीब लोगों को आयुष्मान कार्ड के जरिए मुफ्त में स्वास्थ्य सुविधाएं मिल रही हैं। इन सबका विस्तार लगभग दो दशक में हुआ है। जीडीपी में 8.17 प्रतिशत के साथ गुजरात नौ साल से देश में पहले स्थान पर है। औद्योगिक विकास में भी गुजरात आगे है। इस कारण यहां 1000 लोगों में से केवल आठ लोग बेरोजगार हैं, जबकि देश में 1000 पर 36 लोग बेरोजगार हैं।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार हत्या, चोरी, लूट, बलात्कार जैसे मामलों में गुजरात सबसे अंतिम पायदान पर है। ड्रोन, सेमी कंडक्टर इत्यादि के उद्योग लगाने में भी गुजरात आगे है। इससे रोजगार भी पैदा हो रहा है। गुजरात में हर गांव और हर खेत तक 24 घंटे बिजली और पानी की सुविधा है। इन कारणों से गुजरात के लोग भाजपा के साथ खड़े रहे।

कुछ तत्वों ने गुजरात के जनजाति समाज को भड़काने का प्रयास किया। इस कारण कई जनजाति क्षेत्रों में भाजपा के लिए चुनाव प्रचार करना भी थोड़ा कठिन था। छोटू वसावा जैसे लोग अलग ‘भीलिस्तान’ की मांग को लेकर जनजातीय समाज को भड़का रहे थे। लेकिन उनकी एक नहीं चली। जनजातीय समाज ने भाजपा के राष्टवाद को अपनाया। इस कारण जनजातीय क्षेत्रों में भी भाजपा को विजय मिली।

अभी तक माना जाता था कि भाजपा की पकड़ केवल शहरी मतदाताओं में है। लेकिन चुनाव परिणाम ने बता दिया कि अब भाजपा गांव से लेकर शहर तक और गरीब से लेकर अमीर तक लोकप्रिय हो गई है। इस बार भाजपा ने राजस्थान से सटे उत्तर गुजरात, सौराष्ट्र, कच्छ, जनजाति बहुल मध्य गुजरात और दक्षिण गुजरात में सफलता पाई है। उसके मत प्रतिशत में भी बढ़ोतरी हुई है

घेराबंदी तोड़ भाजपा हुई विजयी

बिहार में कुढ़नी विधानसभा के उपचुनाव ने महागठबंधन को उसकी असली जगह दिखा दी है। भाजपा ने अकेले दम पर सात दलों के गठबंधन का सामना किया और विजय प्राप्त की। इस उपचुनाव से ‘विपक्षी एकता’ के स्वयंभू नेता नीतीश कुमार को सबसे बड़ा झटका लगा है। भाजपा ने सीधे मुकाबले में जदयू को 3,545 मतों से पराजित किया। नीतीश कुमार ने भाजपा के वोट काटने के लिए विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) की ओर से नीलाभ कुमार को उतारा था। बिहार के चुनाव में जाति की प्रमुख भूमिका होती है। नीतीश कुमार ने सवर्ण मतदाताओं को भाजपा से छिटकाने के लिए ही नीलाभ को उतरवाया था। वीआईपी के मुकेश सहनी खुले मंच से कई बार कह चुके थे कि उनका मकसद भाजपा को हराना है। भाजपा को हराने की खुशी में उन्होंने मतगणना के पहले ही दो कुंतल शुद्ध घी के लड्डू बनवाए थे। वे सबको कह रहे थे कि भाजपा के हारने के बाद ये लड्डू बांटे जाएंगे। परंतु उनकी मंशा पूरी नहीं हुई।

भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता निखिल आनंद ने ट्वीट कर के कहा, ‘‘अब दुकान बंद कर दो भाई।’’ कुढ़नी उपचुनाव नीतीश कुमार के लिए प्रतिष्ठा का विषय था। हाल ही में 3 विधानसभा चुनाव हुए- गोपालगंज, मोकामा और अब कुढ़नी। कुढ़नी के विधायक थे राजद के अनिल सहनी। यात्रा भत्ता में किए गए घोटाले के कारण उनकी विधायकी चली गई।

इस कारण वहां उपचुनाव हुआ। इस बार भी राजद का दावा इस सीट पर था। लेकिन नीतीश कुमार ने जबरदस्ती यह सीट राजद से लेकर जदयू के मनोज सिंह कुशवाहा को चुनाव मैदान में उतारा। लेकिन भाजपा के केदार गुप्ता के आगे कोई नहीं टिक पाया। भाजपा प्रत्याशी को 76,653 मत मिले, वहीं जदयू को 73,008 मत प्राप्त हुए तो वीआईपी के नीलाभ कुमार को 9,988 मत हासिल हुए। इस चुनाव में एआईएमआईएम के उम्मीदवार की बड़ी चर्चा थी। महागठबंधन यह प्रचारित कर रहा था कि एआईएमआईएम के मो. गुलाम मुर्तजा से भाजपा को लाभ मिलेगा, लेकिन इस चुनाव में एआईएमआईएम के उम्मीदवार को सिर्फ 3,202 मत मिले। उसको नोटा से भी कम मत प्राप्त हुए। इस उपचुनाव में 13 उम्मीदवार चुनाव मैदान में थे। इनमें 11 की जमानत जब्त हो गई। 10 उम्मीदवारों को तो नोटा से भी कम मत मिले। नोटा पर 4,446 मतदाताओं ने बटन दबाया।
-संजीव कुमार

 

मोदी बने पर्याय
2001 में अचानक नरेंद्र मोदी को मुख्यमंत्री बनाकर गुजरात भेजा गया। इसके बाद तो वे गुजरात का पर्याय बन गए। 2001 में कच्छ में आए विनाशकारी भूकंप के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल पर यह आरोप लगा कि उनकी सरकार स्थिति को संभाल नहीं पा रही है। लोगों में सरकार के प्रति गुस्सा बढ़ रहा था। इसे देखते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अक्तूबर, 2001 में नरेंद्र मोदी को मुख्यमंत्री बनाकर गुजरात भेजा।

नरेंद्र भाई का गुजरात आना भाजपा के लिए इतना शुभ रहा कि वह आज तक गुजरात में राज कर रही है। अब तो उसने अपनी सफलता से इतिहास भी रच दिया है। माना जाता था कि भाजपा की पकड़ केवल शहरी मतदाताओं में है। लेकिन चुनाव परिणाम ने बता दिया कि अब भाजपा गांव से लेकर शहर तक और गरीब से लेकर अमीर वर्ग तक लोकप्रिय हो गई है।

इस बार भाजपा ने राजस्थान से सटे उत्तर गुजरात, सौराष्ट्र, कच्छ, जनजाति बहुल मध्य गुजरात और दक्षिण गुजरात में सफलता पाई है। मत प्रतिशत में भी बढ़ोतरी हुई है। गुजरात के लोगों ने विपक्षी नेताओं द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर किए गए जुबानी हमलों को गुजरात का अपमान माना। इस कारण विपक्ष का बुरा हाल हुआ। भाजपा को जितनी बड़ी जीत मिली है, लोगों की उम्मीदें भी उतनी ही बढ़ गई हैं। मोदी के शब्दों में कहें तो यह जीत नहीं, जिम्मेदारी है। नई सरकार को जनता की उम्मीदों पर खरा उतरना पड़ेगा।

Topics: नरेंद्र मोदीराजनीतिक इतिहासभाजपा की आंधीसौराष्ट्र की राजधानीमोदी बने पर्याय
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