जनजातीय समाज के प्रतिनिधियों ने कहा, ''हम लोग सनातनी ही हैं''
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जनजातीय समाज के प्रतिनिधियों ने कहा, ”हम लोग सनातनी ही हैं”

रांची में आयोजित एक संगोष्ठी में जनजाति समाज के प्रतिनिधियों ने एक स्वर से कहा कि वे सनातनी हैं और सनातनी ही रहेंगे।

Written byरितेश कश्यपरितेश कश्यप
Nov 21, 2022, 05:49 pm IST
inझारखण्‍ड
मंच पर बैठे (बाएं से) सुखराम मुंडा, डॉक्टर आनंद वर्धन, डॉ अशोक वार्ष्णेय और डॉ दिवाकर मिंज

मंच पर बैठे (बाएं से) सुखराम मुंडा, डॉक्टर आनंद वर्धन, डॉ अशोक वार्ष्णेय और डॉ दिवाकर मिंज

आज जहां कुछ तत्व जनजातीय समाज के लोगों को यह कहकर भड़का रहे हैं कि वे सनातनी नहीं हैं, वहीं जनजातीय समाज के प्रतिनिधि कहते हैं कि वे सनातनी ही हैं। उनका कहना है कि भगवान राम और शिव पार्वती उनके आराध्य ही नहीं, बल्कि पूर्वज भी हैं। जनजातीय समाज यह भी मानता है कि अंग्रेजों द्वारा अंग्रेजी में लिखित दस्तावेजों के आधार पर वामपंथी इतिहासकारों ने पूरे भारत के जनजातीय समाज को बांटने का काम किया है। इसी तरह के कई विषयों को लेकर झारखंड की राजधानी रांची में जनजातीय देवलोक एवं उनकी धार्मिक परंपराओं से संबंधित विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। झारखंड में कुल 32 जनजातियां हैं। इनमें से 22 जनजातीय समाज के प्रतिनिधियों ने संगोष्ठी में हिस्सा लिया और अपनी—अपनी संस्कृति और परंपराओं के बारे विस्तार से बताया। इस संगोष्ठी का आयोजन सभ्यता अध्ययन केंद्र दिल्ली, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र रांची और रांची विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में 19 और 20 नवंबर को हुआ।

संगोष्ठी के मुख्य अतिथि और समाजिक कार्यकर्ता पद्मश्री अशोक भगत ने कहा कि जहां पूरा विश्व नारी को उच्च स्थान देने की बात करता है, वहीं नारी सशक्तिकरण का संदेश जनजातीय परंपराओं से ही मिलता है। जनजातीय समाज में नारियों को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। रांची विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ दिवाकर मिंज ने कहा कि जिस समय जनजातीय समाज के लोग अच्छी तरह से हिंदी भी पढ़ना नहीं जानते थे, उस वक्त अंग्रेजों ने अंग्रेजी में जनजाति समाज का इतिहास लिखा। इसके बाद कुछ वामपंथी इतिहासकारों ने इसे अपने हिसाब से तोड़—मरोड़ कर प्रस्तुत कर दिया। अब पूरे भारत में किसी न किसी तरह से जनजातीय समाज को सनातनी समाज के साथ अलग करने का व्यापक षड्यंत्र रचा जा रहा है।

रांची की महापौर आशा लकड़ा ने कहा कि जैसे कोई मुसलमान अपनी मस्जिद को अपना मजहब नहीं बताता, सिख समाज गुरुद्वारे को अपना पंथ नहीं बताता, ईसाई चर्च को अपना मत नहीं कहता, उसी तरह जनजातीय समाज सरना स्थल को अपना धर्म नहीं बता सकता। सरना स्थल जनजातीय समाज के लिए पूजा स्थल है और पूजा स्थल के नाम पर कोई धर्म नहीं हो सकता। इसलिए सरना धर्म बनाने की मांग बेकार है। उन्होंने यह भी कहा कि आधुनिकता के नाम पर भारत का जनजातीय समाज अपनी संस्कृति भूलता जा रहा है।

दिल्ली से आए इतिहासकार डॉ आनंद वर्धन ने कहा कि शिव और पार्वती का जनजातीय समाज से बहुत गहरा संबंध है। उन्होंने बताया कि कई जगहों पर भगवान शिव को झारखंडी के नाम से जाना जाता है। उन्होंने यह भी बताया कि आदिम जनजातियों की कई पूजा—पद्धतियों को ही पूरे देश का हिंदू समाज अपनाए हुए है। कई जगहों पर उनका शासन रहा है। एक शासक के तौर पर कई जगहों पर क्षत्रिय समाज और जनजातीय समाज में वैवाहिक संबंध रहे हैं। सनातन संस्कृति में भगवान राम का वनवासियों के साथ गहरा नाता रहा है। इस इतिहास को एक षड्यंत्र के तहत जनजातीय समाज से छुपाने का प्रयास किया जाता रहा है। इसका नतीजा अब यह देखने को मिल रहा है कि अलग-अलग पंथों और पूजा पद्धतियों को अलग-अलग धर्मों का नाम देकर एक—दूसरे से विभाजित करने का काम किया जा रहा है।

लंबे समय तक झारखंड में प्रांत प्रचारक रहने वाले और आरोग्य भारती के अखिल भारतीय संगठन मंत्री डॉ अशोक वार्ष्णेय ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि झारखंड में जनजातीय समाज के लिए कई संगठन छोटे छोटे स्तर से अच्छा काम कर रहे हैं। लेकिन सभ्यता अध्ययन केंद्र के तहत इस कार्यक्रम का आयोजन उन सभी संगठनों को संबल प्रदान करेगा। कई सारे संगठन एक दूसरे से परिचित तक नहीं थे, आज वे लोग एक मंच पर आकर अपने विचार और अपनी संस्कृति से लोगों को अवगत करा रहे हैं।

संगोष्ठी के समापन सत्र की अध्यक्षता करते हुए पूर्व लोकसभा अध्यक्ष कड़िया मुंडा ने कहा कि सनातन ही देश का प्राचीनतम धर्म है और जनजातीय समाज उसके वाहक हैं। प्रकृति की पूजा ही सनातन है और उसी सनातन से सभी मत—पंथ निकले हैं।

भगवान बिरसा मुंडा के पौत्र सुखराम मुंडा ने कहा कि भगवान बिरसा मुंडा अपनी संस्कृति और जनजातीय समाज को बचाने के लिए अंग्रेजों और पादरियों से लड़ते रहे,लेकिन आज उनके विचारों की उपेक्षा हो रही है। हमारी पूजा—पद्धति और परंपराओं को कुछ विदेशी ताकतों ने समाप्त करने का काम किया है।

महली समाज से आने वाले प्रदीप महली ने बताया कि सांस्कृतिक रूप से हमारा समाज काफी धनी है। वर्ष में हर महीने अलग-अलग गीत और नृत्य के साथ जनजातीय समाज अपनी संस्कृति का आनंद मनाता है। सभी गीतों का अपना एक धार्मिक महत्व है और सबकी अपनी विधि है। महली जनजाति की भी कई दंत कथाएं हैं। उनके अनुसार हर तरह के धार्मिक कार्यक्रम में ढोल और ढाक बजाने का काम महली समाज का ही होता था। बिना इसके किसी भी धार्मिक कार्यक्रम का आयोजन सफल नहीं माना जाता था।

जनजाति वर्ग के इन प्रतिनिधियों की बातों का प्रभाव आज नहीं तो कल अवश्य होगा, क्योंकि इस समाज में अपनी प्राचीन संस्कृति और परम्परा को लेकर एक स्वाभाविक छटपटाहट देखी जा रही है। लोग इस बात से परेशान हैं कि कुछ तत्व उन्हें अपनी संस्कृति से दूर कर रहे हैं।

Topics: Tribal of jharkhandSanatan Dharma
रितेश कश्यप
रितेश कश्यप
डेढ़ दशक से पत्रकारिता में सक्रिय। राजनीति, सामाजिक और सम-सामायिक मुद्दों पर पैनी नजर। कर्मभूमि झारखंड।   [Read more]
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