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‘लंपी’ का कहर, दूध पर असर

देश के 16 राज्यों में लंपी चर्म रोग का संक्रमण फैल गया है। इसके कारण हजारों गोवंश असमय काल का ग्रास बन चुके हैं। राजस्थान की स्थिति सबसे भयावह है। यहां सबसे अधिक गोवंश की मौत हुई है। इसी संकट की वजह से राजस्थान, हरियाणा और पंजाब में दूध उत्पादन में 20-30 प्रतिशत, जबकि गुजरात में 0.25 प्रतिशत की कमी आई है

Written byPanchjanyaPanchjanya
Sep 21, 2022, 04:26 pm IST
inभारत, विश्लेषण, राजस्थान
प्रतीकात्मक चित्र

प्रतीकात्मक चित्र

पशुधन मृत्यु दर नियंत्रण में है। दूध उत्पादन में बहुत अधिक कमी नहीं आई है। उन्होंने कहा कि स्थिति पर नजर रखी जा रही है। राज्यों के लिए केंद्र लगातार परामर्श जारी कर रहा है। उसने गायों को गोटपॉक्स टीका लगवाने की सलाह दी है। राज्य सरकारें टीकाकरण में तेजी लाएं। गुजरात में स्थिति में सुधार हो रहा है। हरियाणा और पंजाब में भी स्थिति पर नियंत्रण है। 

इस समय देशभर में लंपी चर्म रोग फैला हुआ है। यह वायरस गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश सहित 16 राज्यों में पैर पसार चुका है। अभी तक पूरे देश में 75 हजार से अधिक गोवंश की मौत हो चुकी है। सबसे खराब स्थिति राजस्थान की है। अकेले इस राज्य में 53 हजार से अधिक गोवंश की मौत हुई है। स्थिति यह है कि गोवंश को दफनाने के लिए जगह कम पड़ गई है। लंपी चर्म रोग के कारण राज्य में दूध उत्पादन प्रभावित हुआ है। हालात बिगड़ते देख केंद्र सरकार ने सक्रियता दिखाते हुए राज्यों को टीके उपलब्ध कराए हैं।

केंद्रीय मत्स्य पालन, पशुपालन और दुग्ध मंत्री पुरुषोत्तम रूपाला ने प्रभावित जिलों का दौरा किया। उनका कहना है कि पशुधन मृत्यु दर नियंत्रण में है। दूध उत्पादन में बहुत अधिक कमी नहीं आई है। उन्होंने कहा कि स्थिति पर नजर रखी जा रही है। राज्यों के लिए केंद्र लगातार परामर्श जारी कर रहा है। उसने गायों को गोटपॉक्स टीका लगवाने की सलाह दी है। राज्य सरकारें टीकाकरण में तेजी लाएं। गुजरात में स्थिति में सुधार हो रहा है। हरियाणा और पंजाब में भी स्थिति पर नियंत्रण है। पर राजस्थान में यह बीमारी तेजी से पांव पसार रही है। उन्होंने कहा कि हालात का जायजा लेने के लिए वे राजस्थान भी गए थे। प्रदेश सरकार से पूरा सहयोग किया जा रहा है। सभी राज्यों के साथ समन्वय के लिए दिल्ली में नियंत्रण कक्ष शुरू किया गया है। टीके का उत्पादन बढ़ाने के लिए भी इसके निर्माता से बातचीत की गई है।

देश में टीका विकसित

पशु विशेषज्ञों के मुताबिक लंपी चर्म रोग खासतौर से गोवंश को प्रभावित करता है। देसी गोवंश की तुलना में संकर नस्ल के गोवंश में इस बीमारी के कारण मृत्यु दर अधिक है। इस बीमारी से पशुओं में मृत्यु दर 1 से 5 प्रतिशत तक है। इस रोग के लक्षणों में बुखार, दूध में कमी, त्वचा पर गांठ, नाक और आंखों से स्राव आदि शामिल हैं। यह बीमारी मच्छर, मक्खी और परजीवी से फैलती है। हरियाणा के पशुपालन विभाग के उपनिदेशक डॉ. धर्मेंद्र कुमार ने बताया कि शुरुआत में ही यदि बीमारी का इलाज शुरू कर दिया जाए तो 2-3 दिन में गोवंश स्वस्थ हो जाते हैं। संक्रमित पशुधन को अलग-थलग रखना भी जरूरी होता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीते दिनों ग्रेटर नोएडा में संपन्न ‘वर्ल्ड डेयरी समिट’ के उद्घाटन कार्यक्रम में कहा था कि लंपी रोग की स्वदेशी वैक्सीन को तैयार कर लिया गया है। 2025 तक सभी पशुओं का होगा टीकाकरण हो जाएगा। उधर, हरियाणा के पशुपालन मंत्री जेपी दलाल ने भी हिसार स्थित राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र द्वारा टीका विकसित करने की बात कही है, जो इस बीमारी की रोकथाम करने में सहायक साबित होगा। उत्तर प्रदेश के बरेली के इज्जतनगर स्थित भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान ने भी इस बीमारी की रोकथाम का टीका विकसित किया है।

राजस्थान में हालात बेकाबू
देश में लंपी चर्म रोग ने पहले भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे गुजरात के कच्छ, सौराष्ट्र और राजस्थान के जैसलमेर में दस्तक दी। 23 अप्रैल को कच्छ में इसका पहला मामला सामने आया था। मई में इस वायरस का फैलाव तेजी से हुआ और देखते-देखते इसने महामारी का रूप धर लिया और कई जिले इसकी चपेट में आ गए। इसके बाद यह बीमारी राजस्थान, पंजाब और हरियाणा के बाद देश के दूसरे राज्यों में फैली।

सभी राज्य सरकारों ने इसकी रोकथाम के लिए तत्काल कदम उठाए। लेकिन राजस्थान में अशोक गहलोत की अगुआई वाली कांग्रेस सरकार सोती रही। नतीजतन, सूबे में 11 लाख से अधिक गायें संक्रमित हो चुकी हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 53 हजार से ज्यादा गोवंश काल का ग्रास बन चुके हैं। इन्हें दफनाने के लिए जगह कम पड़ रही है। गोवंश के शव जहां-तहां पड़े हैं।

सरकारी आंकड़ों में जितनी मौतें दिखाई जा रही हैं, उससे ज्यादा गायों के शव अकेले पश्चिमी राजस्थान के गांवों में खुले में पड़े हैं। कहने को सरकार ने शवों के उचित निस्तारण के लिए पंचायत स्तर तक सहायता राशि का प्रावधान किया है, पर जमीनी स्तर पर ऐसा कुछ नहीं दिख रहा। गांव-गांव, शहर-शहर गलियों में बेसहारा घूम रही गायों को इस महामारी से रोकने के प्रति भी सरकार गंभीर नहीं है।

लापरवाही का आलम यह है कि कई जगहों पर टीके भी उपलब्ध नहीं हैं। जहां गोवंशों का टीकाकरण किया गया, वहां भी खास असर नहीं दिख रहा है। अधिकांश जगहों पर अभी तक कोरोना की ही तरह लक्षणों के आधार पर गोवंश का इलाज किया जा रहा है। भारतीय किसान संघ के प्रदेश मंत्री तुलसाराम के अनुसार जोधपुर, बीकानेर, नागौर, सीकर, बाड़मेर, चुरू, श्रीगंगानगर और अजमेर जिले की स्थिति अधिक खराब है। इन जिलों में करीब 15 लाख गोवंश संक्रमित हो चुके हैं।

एक आकलन के मुताबिक, महामारी से अभी तक 1.25 लाख से अधिक गोवंश की मौत चुकी है। इस महामारी की चपेट में देसी गायें अधिक हैं। सरकार की ओर से प्रतिदिन जारी किए जाने वाले आंकड़ों के अनुसार, 13 सितंबर तक राजस्थान में 11,85,810 गायें संक्रमित हुर्इं। इनमें 11,59,268 का उपचार किया गया। 6,69,919 गायें स्वस्थ हो गर्इं, जबकि 53,064 की मौत हो गई। राज्य में करीब 9,14,117 गोवंश का टीकाकरण किया गया है। राजस्थान में गोवंश की मौत का सिलसिला अभी थमा नहीं है। जहां पहले रोजाना 2000 से अधिक गोवंश की मौत हो रही थी, अब यह आंकड़ा 1200 से 1400 पर आ गया है।

इन राज्यों ने दिखाई सतर्कता
गुजरात में 58 हजार से अधिक गोवंश संक्रमित हुए और लगभग 1500 की मौत हुई, लेकिन राज्य सरकार ने तत्काल इसकी रोकथाम के लिए कदम उठाए। इसमें केंद्र सरकार ने भी मदद की। राज्य के कृषि मंत्री राघवजी पटेल ने बताया कि पशुपालन विभाग के 222 पशु चिकित्सा अधिकारियों और 713 पशुधन निरीक्षकों ने 20 जिलों में प्रभावित गांवों में सर्वेक्षण, उपचार और टीकाकरण अभियान चलाया। कच्छ, जामनगर, देवभूमि, द्वारका और बनासकांठा जिलों में स्नातक, स्नातकोत्तर और राजकीय पशु चिकित्सा महाविद्यालयों के प्रोफेसरों सहित 107 लोगों को इसमें लगाया गया है।

उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल लगातार इस पर निगाह रखे हुए हैं और मुख्य सचिव द्वारा दैनिक आधार पर इसकी समीक्षा की जा रही है। प्रदेश में पर्याप्त मात्रा में वैक्सीन उपलब्ध है। पशुपालन विभाग ने सभी जिलों में डॉक्टर सहित टीमें तैनात हैं। कामधेनु विश्वविद्यालय के कुलपति नरेश कलावाला की अध्यक्षता में एक पांच सदस्यीय कार्य बल गठित किया गया है। इसके अलावा, पशुपालकों को तत्काल उपचार और जानकारी मुहैया कराने के लिए राज्य स्तर पर एक नियंत्रण कक्ष स्थापित कर टोल फ्री हेल्पलाइन शुरू की गई है। केंद्र सरकार ने तीन वैज्ञानिकों और एक अधिकारी को हालात का जायजा लेने के लिए भेजा था।

इसी तरह, लंपी वायरस ने हरियाणा के 14 जिलों में 31,440 गोवंश को चपेट में ले लिया। सबसे खराब हालात यमुनानगर, अंबाला, सिरसा, पलवल, फरीदाबाद की है। सूबे में रोजाना औसतन 3,186 संक्रमण के मामले सामने आ रहे हैं और प्रतिदिन औसतन 15-20 गायें दम तोड़ रही हैं। लेकिन जिस गति से यह महामारी फैली थी, टीकाकरण के बाद इस पर रोक लगी है। राज्य के पशुपालन मंत्री जेपी दलाल ने बताया कि प्रदेश में पशुधन को लंपी वायरस से बचाने के लिए टीकाकरण अभियान को तेज कर दिया गया है। अभी तक 15 लाख से अधिक गोवंश को टीके लगाए जा चुके हैं। उन्होंने बताया कि बीमारी पर नियंत्रण पाने के लिए हर संभव कदम उठाए जा रहे हैं। पशु चिकित्सकों को नियमित रूप से पशुपालकों के साथ बैठक कर उनसे स्थिति की जानकारी लेते रहने के निर्देश दिए गए हैं। साथ ही, किसानों को भी जागरूक किया जा रहा है।

हरियाणा से लगते पंजाब में भी इस महामारी ने गंभीर रूप धारण कर लिया है। प्रोग्रेसिव डेयरी फार्मर्स एसोसिएशन (पीडीएफए) के अध्यक्ष दलजीत सिंह सदरपुरा ने बताया कि पंजाब में जुलाई से अब तक लंपी संक्रमण के कारण बड़ी संख्या में गोवंश की मौत हो चुकी है। अभी भी 74,325 गोवंश संक्रमित हैं। इसी तरह, उत्तर प्रदेश में संक्रमण के 25 हजार मामले दर्ज किए जा चुके हैं। उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, ओडिशा और बिहार में भी वायरस के प्रकोप को देखते हुए सतर्कता बरती जा रही है।

कहां से आई बीमारी

लंपी चर्म रोग मूल रूप से अफ्रीकी बीमारी है। यह वायरस पॉक्स परिवार का है, जो सबसे पहले 1929 में जांबिया में पाया गया। वहां से यह 1943-45 के बीच बोत्सवाना, जिम्बाब्वे और दक्षिण अफ्रीकी गणराज्य में फैला। दक्षिण अफ्रीका में 1949 में इस वायरस की चपेट में 80 लाख से अधिक मवेशी आए। 2012 के बाद से यह तेजी से फैला। लेकिन यह मध्य पूर्व, दक्षिण पूर्व, यूरोप, रूस, कजाकिस्तान तक ही सीमित रहा। 2019 में यह बांग्लादेश और चीन, भूटान (2020), नेपाल (2020) और अगस्त 2021 में भारत में आया। 2019 में बांग्लादेश में इससे 5 लाख मवेशी प्रभावित हुए। इसी साल पहली बार भारत में भी इसके मामले दर्ज किए गए थे।

दूध उत्पादन में आई कमी
एक अनुमान के अनुसार, लंपी चर्म रोग के कारण राजस्थान में दूध उत्पादन गिर गया है। दुग्ध आपूर्ति में प्रतिदिन आठ लाख लीटर की कमी आई है। सबसे ज्यादा प्रभावित जिलों में 30-32 प्रतिशत दूध कम आ रहा है। बाड़मेर, चुरू और जोधपुर में तो घी बनना ही बंद हो गया है। जयपुर डेयरी में भी घी का उत्पादन गिर कर 10 प्रतिशत रह गया है। इस कारण दूध और घी के दाम बढ़ने लगे हैं। चुरू डेयरी के अध्यक्ष लालचंद मूंड कहते हैं, ‘‘राजस्थान में लंपी बीमारी से पहले केवल पांच जिलों से ही प्रतिदिन 4.64 लाख लीटर दूध आता था, जो घटकर 3.24 लाख लीटर हो गया है।’’

बता दें कि राज्य के सकल घरेलू उत्पाद में पशुपालन का योगदान 10 प्रतिशत है। राज्य की कुल जीडीपी करीब 12 लाख करोड़ रुपये हैं। यानी राज्य को कम से कम 1.20 लाख करोड़ का नुकसान होगा। इधर, हरियाणा और पंजाब में भी दूध का उत्पादन 20 प्रतिशत गिर गया है, जबकि अमूल के प्रबंध निदेशक आरएस सोढ़ी का कहना है कि गुजरात में इसमें 0.25 प्रतिशत की कमी आई है।

हरियाणा प्रोग्रेसिव डेयरी संचालक संघ के प्रदेश अध्यक्ष ओमबीर राणा ने बताया कि प्रदेश में 7840 बड़ी व मध्यम डेयरी हैं। इससे 4.10 लाख किसान सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं। इसके साथ बड़ी संख्या में पशुपालक भी जुड़े हुए हैं। एक मोटे आकलन के मुताबिक, सूबे में प्रतिदिन 3.20 लाख लीटर दूध का उत्पादन होता है। इसमें से 1.70 लाख लीटर दूध बाजार में आता है। लंपी की वजह से बाजार में दूध की आपूर्ति 20 प्रतिशत तक कम हो गई है। प्रोग्रेसिव डेयरी फार्मर्स एसोसिएशन के अनुसार पंजाब में 6000 डेयरी फार्म से 3.5 लाख किसान जुड़े हैं।
(इनपुट: राजस्थान से ईश्वर बैरागी, गुजरात से जयवंत पंड्या,
हरियाणा से मनोज ठाकुर)

Topics: लंपी चर्म रोगभारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमाराजस्थान में अशोक गहलोतडेयरी फार्मर्स एसोसिएशनराजकीय पशु चिकित्सा
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