पर्यावरण : जल की धार, जीवन विस्तार

भूभाग के लिहाज से देश के सबसे बड़े क्षेत्र राजस्थान के हिस्से देश में मौजूद कुल पानी का सिर्फ एक प्रतिशत ही है।

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डॉ. क्षिप्रा माथुर

भूभाग के लिहाज से देश के सबसे बड़े क्षेत्र राजस्थान के हिस्से देश में मौजूद कुल पानी का सिर्फ एक प्रतिशत ही है। और इसमें भी साफ पानी का संकट है। पानी के परम्परागत स्रोतों की अनदेखी का खामियाजा यह है कि ऐसे सैकड़ों शहर, कस्बे और गांव हैं जहां पीने का पानी नहीं बचा है। जल-आन्दोलन की जरूरत सबको महसूस हो रही है

राजस्थान के ज्यादातर हिस्से में रेगिस्तान है, मगर पहाड़ भी हैं, जंगल भी, और बांध, नहर, तालाब और अगल-बगल से बहकर आती नदियां भी। यहां के इलाके में कभी सरस्वती नदी के किनारे रंगमहल सभ्यता की बसावट थी। वोल्गा, नील और सिंधु घाटी से भी पुरानी इस सभ्यता में कुएं, नालियां और कुदरत से तालमेल वाले रहन-सहन के भी प्रमाण हैं। मगर सूखे का जो अभिशाप राजस्थान के हिस्से आया, उसने पानी को सहेजने के लिए उन्नत अभियांत्रिकी और परम्परागत जानकारी के मेल से बरसात से अपनी प्यास को बुझाना सिखाया। वास्तु और विज्ञान की छाप वाली जो जल-संरचनाएं समाज की सूझ-बूझ से उपजीं, उन्हें राजा-महाराजाओं, जमींदारों, सेठों और धनाढ्य वर्ग ने स्थापत्य से और सजाया।

15 अगस्त,2021 के अंक में प्रकाशित लेख

पहुंच से दूर साफ पानी
जिस जल प्रबंधन की झलक हड़प्पा की खुदाई तक में मिलती है, उसे आधुनिक दौर में और पनपने का मौका मिला। पानी से भरपूर इलाकों ने कमी वाले इलाकों में बांध और नहरों से उसकी भरपाई की। राजस्थान में सबसे पहले गंगा नहर बनी और बाद में इंदिरा गांधी कैनाल ने पानी को सूखे इलाकों के ओर मोड़ा। इस नहर के पानी घर और खेतों तक पहुंचने से पश्चिमी राजस्थान में तब्दीली तो हुई है। खेती और पशुपालन को सहारा मिलने से पलायन थमा है फिर भी असल दुश्वारियां कायम हैं। धरती पर मौजूद कुल पानी का सिर्फ तीन प्रतिशत ही है जो साफ है, पीने लायक है, बाकी जमा हुआ है। राजस्थान, जो भू-भाग के लिहाज से देश का सबसे बड़ा इलाका है, उसके हिस्से तो देश में मौजूद कुल पानी का सिर्फ एक प्रतिशत ही है। और इसमें भी साफ पानी का संकट है। यूं देश की करीब सवा दो लाख आबादी को साफ पानी नसीब नहीं है। हाल ही में केन्द्रीय पेयजल स्वच्छता मंत्रालय की रिपोर्ट में सामने आया कि देश की कुल 70,340 बस्तियों को पीने का साफ पानी नहीं मिल रहा। इनमें से सबसे ज्यादा यानी 19,573 बस्तियां अकेले राजस्थान में हैं। यहां के पानी में फ्लोराइड है, नाइट्रेट है, खारापन है। बारिश कम होने, बांध सूखने और जमीन की नमी खत्म होने से किल्लत तो है ही। मगर पानी के परम्परागत स्रोतों की अनदेखी का खामियाजा यह है कि ऐसे सैकड़ों शहर, कस्बे और गांव हैं जहां पीने का पानी बिल्कुल नहीं बचा है।

30 अक्तूबर,2021 के अंक में प्रकाशित लेख

जल जीवन की रफ़्तार
जल जीवन मिशन की रफ्तार जिस प्रदेश में सबसे तेज होनी चाहिए, वहां वह राजनीति और भ्रष्टाचार की शिकार है। पानी के काम में देश के 33 राज्यों में 32वें पायदान पर खिसके प्रदेश में महज 24प्रतिशत घरों में नल हैं। राजस्थान में और गांवों में बसी बड़ी आबादी आज भी कई किलोमीटर पैदल चलकर पानी लाती है या टैंकरों के भरोसे गुजर-बसर करती है। जैसलमेर की तालरिया पंचायत के सरपंच भंवर सिंह का कहना है कि नहर का पानी पीने लायक तो क्या, नहाने लायक भी नहीं है। बल्कि कई बीमारियों की जड़ भी है जिससे मिट्टी और इन्सान, दोनों की सेहत खराब हुई है। जल जीवन मिशन में प्रस्ताव जमा कराने के बावजूद कोई गति नहीं है। टेंडर तक नहीं हुए हैं और सरकारी काम की गति इतनी धीमी है कि हमारी प्यास का कब समाधान होगा, पता नहीं। लेकिन उनके इलाके के एक तालाब का जिक्र करते हुए वे ये जरूर कहते हैं कि इस तालाब की मरम्मत हो जाए तो पानी का स्थायी समाधान कुदरत के ही पास है। उधर जैसलमेर के सम रेगिस्तान वाले इलाके की अडबाला पंचायत के सरपंच मोकम सिंह भी पानी की किल्लत के कारण हर दिन कठिन जीवन जीने की मजबूरी बताते हैं। नल के लिए सर्वे का काम अभी शुरू नहीं हुआ है। नहर और ट्यूबवैल से मिलने वाला पानी खारा है। जल जीवन मिशन की राह देखते रेगिस्तान की तकलीफों पर जितना कहा जाए और जितना किया जाए, कम है।

30 जनवरी,2022 के अंक में प्रकाशित लेख

जल आंदोलन की जरूरत
हर साल जब गर्मी चरम पर होती है तो नहर की मरम्मत का काम शुरू होता है और पानी की सप्लाई बन्द होने से टैंकरों की चांदी हो जाती है। यानी पानी तो जैसे-तैसे मुहैया हो जाता है लेकिन जेब हल्की करने के बाद। जोधपुर जैसे शहरों में पानी का संकट इतना गहरा गया है कि पानी की बरबादी पर जुर्माने का ऐलान करना पड़ा है। जवाई बांध सूखने से पाली जिला प्यास से मर रहा है। भरपूर पानी वाले वागड़ के इलाकों में सूखी नदियों के झीरी में बचे-खुचे पानी से काम चला रहे हैं। ट्यूबवैल खराब पड़े हैं, बीसलपुर जैसे बड़े बांधों से जुड़े गांवों में पाइपलाइन टूटी-फूटी है, पानी व्यर्थ बह जाता है, हैंडपम्पों की मरम्मत नहीं होने से वे बेकार पड़े हैं। मनरेगा में बिना ठोस योजना और विचार के तालाब खुदाई के झूठे काम हो रहे हैं। जल-आन्दोलन की जरूरत सबको महसूस हो रही है लेकिन ये काम जहां भी हो पाए, सरकार की बजाए जागरूक समुदाय और सामाजिक संगठनों के बूते कुछ गांवों में शुरू हुए हैं जिन्हें भरपूर मदद की दरकार है। पिछली सरकार में शुरू हुई जल-स्वावलम्बन योजना में पंचायतों में परम्परागत जल-स्रोतों की सफाई और मरम्मत के काम बेहद कारगर थे तो मौजूदा सरकार में खेत तलाई यानी फॉर्म पॉण्ड बनाने के काम ने बारिश के पानी को खेत में ही संरक्षित करने की अच्छी तैयारी की है।


जल-तिजोरियां

बावड़ियां चौकोर या गोलाई में बनी ये संरचनाएं सीढ़ीदार होती हैं ताकि पानी के स्तर का अन्दाज रहे। इनमें सहेजा गया पानी खारा नहीं होता। स्थापत्य और अभियांत्रिकी, दोनों ही मायनों में ये अनूठी हैं।
जोहड़ जिप्सम वाले इलाकों में बनी सीढ़ीनुमा गहराई वाली चौकोर और किनारों से ऊंची इन संरचनाओं के किनारों की ओर छतरियां भी बनी होती हैं। पशुओं के लिए अलग से गऊघाट होता है। पानी शुद्ध और मीठा रहता है।
बेरियां तालाब और दूसरे जल स्रोतों के आसपास बनी और उनके रिसाव को सहेजने वाली बेरियां यानी छोटा कुआं या कुईं 12-15 मीटर गहरी होती हैं और गंभीर संकट में सहारा होती हैं।
खड़ीन बांध के जैसे अस्थायी तालाब, जिनके बूते बंजर जमीन में साझी खेती करना सम्भव हो पाता है। जैसलमेर में खड़ीन आज भी कायम हैं और इनका समृद्ध इतिहास भी है।
झालरा ऊंचाई पर बने तालाबों और झीलों से रिसकर आने वाले पानी को सहेजने वाली ये आयताकार संरचनाएं असल में चौड़े कुएं हैं, जो अलग-अलग बनावटों में मौजूद हैं।
तालाब पानी के कुदरती बहाव के रास्ते में आने वाली ये संरचनाएं गांवों की सबसे बड़ी जल तिजोरियां हैं जिनके आसपास ओरण यानी देवी-देवताओं के नाम पर सहेजे गए वन भी हुआ करते थे।
झीलें बरसाती पानी के कुदरती बहाव को सहेजने वाली इन बड़ी जल संरचनाओं के कई स्वरूप हैं, कहीं ये नमक पैदा करती हैं तो कहीं झीलों के बीच स्थापत्य की खूबसूरत इमारतें हैं।
नाड़ी तालाब का छोटा रूप या पोखर जिसे ढलान वाले इलाकों में गहरा खड्डा करके बरसाती पानी को सहेजा जाता है। बहकर आने वाली मिट्टी की वजह से मिट्टी उपजाऊ होती है और खेती अच्छी होती है।
टोबा बारिश के पानी को सहेजने के लिए नाड़ी से थोड़ी बड़ी और गहरेड यह संरचना बस्तियों का सहारा होती है।आम तौर पर 20-25 परिवारों के बीच एक टोबा बनाया जाता है। ऊपर से चौकोर और पक्का होता है।
टांके ये कुंड या हौद खुले में या बन्द जगह कहीं भी बने दिख जाएंगे। पीने या साल भर की जरूरत के लिए बरसाती पानी को अलग-अलग तरह से सहेजा जाता है और इन्हें ढक कर रखा जाता है।
खेतों में बरसात का पानी सहेजने के लिए अलग-अलग तकनीक से तलाई या पांड बनाए जाते हैं ताकि खेतों के लिए साल भर नमी बनी रहे और पानी बेकार बहने की बजाय खेतों में रुका रहे।
डिग्गी पश्चिमी राजस्थान में इंदिरा गांधी कैनाल का पानी आता है। नहरी पानी को एक जगह सहेजने के लिए चारों ओर से पक्की की गई करीब दस फुट गहरी ये संरचनाएं बनी हुई हैं।
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