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साफ नीयत और स्पष्ट लक्ष्य से प्राप्त उपलब्धि

आज भारत ने रक्षा उपकरणों के मामले में दो तिहाई से ज्यादा स्वदेशीकरण का स्तर पा लिया है।

Written byहितेश शंकरहितेश शंकर
May 7, 2022, 09:39 am IST
in भारत, रक्षा, सम्पादकीय
स्वदेशी एलसीए तेजस लड़ाकू विमान

स्वदेशी एलसीए तेजस लड़ाकू विमान

आज भारत ने रक्षा उपकरणों के मामले में दो तिहाई से ज्यादा स्वदेशीकरण का स्तर पा लिया है। तीनों सेनाओं में एक साथ कई मोर्चों पर काम हो रहा है। एक ओर तो हम थल सेना की जरूरतों के लिए ज्यादा से ज्यादा देसी कंपनियों को आर्डर दे रहे हैं, नौसेना का लगभग पूरी तरह स्वदेशीकरण हो चुका है, वायु सेना के लिए पांचवीं पीढ़ी ही नहीं, उससे भी आधुनिक लड़ाकू विमानों को तैयार करने का काम चल रहा है।

अगर दीर्घकालिक राष्ट्र-हित को देखने की दृष्टि कमजोर और अल्पकालिक स्व-हित को देखने की दृष्टि मजबूत हो तो वही होता है जो भारत में युद्धक सामग्री, हथियारों और आधुनिक तकनीक के मामले में हुआ। जिन्हें देश के रक्षा-प्रतिरक्षा क्षेत्र को आत्मनिर्भर और सक्षम बनाना था, उन्हें उधार की सांसें रास आती थीं क्योंकि व्यवस्थात्मक अनुलोम-विलोम के माध्यम से खुद भी दो-चार लंबी-लंबी सांसें खींच लेने की कला उन्होंने विकसित कर ली थी। लेकिन बदलते वक्त ने यह सिद्ध किया है कि अगर नीयत साफ हो और लक्ष्य स्पष्ट तो क्या कुछ हो सकता है। कुछ साल पहले तक हथियारों और युद्धक सामग्री के लिए आयात पर निर्भर रहने वाला देश आज इनका निर्यात करने लगा है।

बदलते वक्त के साथ दुनिया कितनी भी क्यों न बदल गई हो, पाषाण युग से चलते-चलते हम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में क्यों न आ गए हों, लेकिन एक मामले में वस्तुत: कोई बदलाव नहीं आया-सिक्का उसी का चलेगा, जिसमें दम हो। हमने अपने अनुभवों से जाना है कि कोई भी राष्ट्र तब तक वैश्विक शक्ति नहीं बन सकता, जब तक रक्षा-प्रतिरक्षा क्षेत्र में वह आत्मनिर्भर न हो। यह आत्मनिर्भरता अब तक क्यों नहीं आई और हम कहां और कैसे पिछड़ गए, इसके लिए कुछ तो पीछे जाना पड़ेगा।

पहला उदाहरण बोफोर्स घोटाले का है जिसमें कुल 400 बोफोर्स तोपों की खरीद का सौदा 1.3 अरब डॉलर में किया गया था। ओत्तावियो क्वात्रोकी इटली का एक व्यापारी था जिस पर बोफोर्स घोटाले में दलाली के जरिए घूस लेने का आरोप था। सन् 1987 में यह बात सामने आई थी कि स्वीडन की हथियार कंपनी बोफोर्स ने भारतीय सेना को तोपें सप्लाई करने का सौदा हथियाने के लिए 80 लाख डॉलर की दलाली चुकाई थी। उस समय केन्द्र में कांग्रेस की सरकार थी, जिसके प्रधानमंत्री राजीव गांधी थे। स्वीडन के रेडियो ने सबसे पहले 1987 में इसका खुलासा किया।

आज भारत ने रक्षा उपकरणों के मामले में दो तिहाई से ज्यादा स्वदेशीकरण का स्तर पा लिया है। तीनों सेनाओं में एक साथ कई मोर्चों पर काम हो रहा है। एक ओर तो हम थल सेना की जरूरतों के लिए ज्यादा से ज्यादा देसी कंपनियों को आर्डर दे रहे हैं, नौसेना का लगभग पूरी तरह स्वदेशीकरण हो चुका है, वायु सेना के लिए पांचवीं पीढ़ी ही नहीं, उससे भी आधुनिक लड़ाकू विमानों को तैयार करने का काम चल रहा है।

22 जनवरी, 1990 को सीबीआई ने आपराधिक षड्यंत्र, धोखाधड़ी और जालसाजी का मामला दर्ज किया। मामला एबी बोफोर्स के तत्कालीन अध्यक्ष मार्टिन आर्डबो, कथित बिचौलिये विन चड्ढा और हिन्दुजा बंधुओं के खिलाफ दर्ज हुआ। लंबी जांच और कई घटनाक्रम के बाद 2011 में दिल्ली की अदालत ने सीबीआई को केस बंद करने का आदेश दे दिया।
बोफोर्स मामले ने जनता के सामने रक्षा सौदों में राष्ट्रहित के बजाय स्वहित की दृष्टि को उजागर किया।

दूसरा उदाहरण अगस्ता वेस्टलैंड का है। भारतीय रक्षा मंत्रालय ने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और अन्य वीवीआईपी को ले जाने के लिए भारतीय वायु सेना के लिए फरवरी 2010 में 12 अगस्ता वेस्टलैंड एडब्ली101 हेलिकॉप्टर खरीदने के लिए एक अनुबंध पर हस्ताक्षर किए। अनुबंध पर विवाद 12 फरवरी, 2013 को इटली के अधिकारियों द्वारा अगस्ता वेस्टलैंड की मूल कंपनी फिनमेकेनिका के सीईओ ग्यूसेप ओर्सी की गिरफ्तारी के बाद सामने आया। 25 मार्च, 2013 को भारत के रक्षा मंत्री ए.के. एंटनी ने भ्रष्टाचार के आरोपों की पुष्टि की। अगस्ता वेस्टलैंड के कार्यकारी ग्यूसेप ओर्सी को भारतीय राजनेताओं, नौकरशाहों एवं वायुसेना के अधिकारियों को 30 मिलियन यूरो की रिश्वत देने के आरोप में चार साल की कैद की सजा सुनाई गई। अगस्ता वेस्टलैंड का प्रकरण रक्षा सौदों में कमीशन के खेल में शामिल तबकों के गठजोड़ को उजागर करता है।

तीसरा उदाहरण राफेल का है। वायुसेना को अपनी क्षमता बढ़ाने के लिए कम से कम 42 लड़ाकू स्क्वाड्रंस की जरूरत थी लेकिन उसकी वास्तविक क्षमता घटकर महज 34 स्क्वाड्रंस रह गई। इसलिए वायुसेना की मांग आने के बाद 126 लड़ाकू विमान खरीदने का प्रस्ताव सबसे पहले श्री अटल बिहारी वाजपेयी नीत राजग सरकार ने रखा था। इस प्रस्ताव को बाद में अगस्त, 2007 में यूपीए सरकार के रक्षा मंत्री एके एंटोनी ने मंजूरी दी थी। तमाम बातचीत और परीक्षणों के बाद वर्ष 2012 में राफेल को एल-1 बिडर घोषित किया गया। परंतु कई मुद्दों पर गतिरोध की वजह से 2014 तक बातचीत अधूरी रही।

वर्ष 2014 में भाजपा सरकार बनने पर 2015 में भारत और फ्रांस के बीच इस विमान की खरीद को लेकर समझौता किया गया। सुरक्षा मामलों की कैबिनेट से मंजूरी मिलने के बाद दोनों देशों के बीच 2016 में आईजीए हुआ। कांग्रेस ने इस खरीद पर बहुत विवाद किया और आरोप लगाए। आखिरकार उच्चतम न्यायालय ने भाजपा सरकार को क्लीन चिट दी। जुलाई 2020 में राफेल की आपूर्ति शुरू हो पाई। राफेल के मामले से पता चलता है कि चिंता इस बात की नहीं की गई कि सेना की जरूरत पूरी हो। इसके बजाय मामले को लटकाने के लिए तरह-तरह के बखेड़े खड़े किए गए।

अब उपलब्धियों की बात। आज भारत ने रक्षा उपकरणों के मामले में दो तिहाई से ज्यादा स्वदेशीकरण का स्तर पा लिया है। तीनों सेनाओं में एक साथ कई मोर्चों पर काम हो रहा है। एक ओर तो हम थल सेना की जरूरतों के लिए ज्यादा से ज्यादा देसी कंपनियों को आर्डर दे रहे हैं, नौसेना का लगभग पूरी तरह स्वदेशीकरण हो चुका है, वायु सेना के लिए पांचवीं पीढ़ी ही नहीं, उससे भी आधुनिक लड़ाकू विमानों को तैयार करने का काम चल रहा है।

घातक और सटीक मिसाइलों के बेड़े की उपयोगिता और मारक क्षमता बढ़ाने पर लगातार काम जारी है। इसके साथ-साथ लेजर जैसे भविष्य के हथियारों और सेना में आर्टिफिशयल इंटेलिजेंस के बेहतर इस्तेमाल पर भी लगातार काम चल रहा है। इतना तय है कि स्वदेशीकरण की मुहिम सही दिशा में बढ़ रही है, लेकिन नीति निर्धारकों को यह बात अच्छी तरह पता है कि स्वदेशीकरण भावनात्मक रूप से बड़ा आकर्षक और उत्साह में भरने वाला विषय है, लेकिन इसे कमजोरी नहीं, अपनी मजबूती बनाना है।

Topics: वायुसेनाअगस्ता वेस्टलैंडभारतीय रक्षा मंत्रालयराष्ट्रपतिराष्ट्र-हितप्रधानमंत्री राजीव गांधीप्रधानमंत्रीबोफोर्स घोटालेआर्टिफिशियल इंटेलिजेंसस्वदेशी एलसीएतेजस लड़ाकू विमाननौसेना
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हितेश शंकर पत्रकारिता का जाना-पहचाना नाम, वर्तमान में पाञ्चजन्य के सम्पादक [Read more]
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