छत्तीसगढ़ के इन तमाम दर्दों की आखिर दवा क्या है?
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छत्तीसगढ़ के इन तमाम दर्दों की आखिर दवा क्या है?

Written byपंकज झापंकज झा
Mar 28, 2022, 12:05 am IST
inभारत, छत्तीसगढ़
सरगुजा में बच्ची की मौत के बाद पिता ईश्वर शव ले जाने के लिए एम्बुलेंस की मिन्नतें करते रहे, लेकिन अस्पताल प्रशासन द्वारा एम्बुलेंस उपलब्ध नहीं करा पाने पर वे पैदल ही दस किलोमीटर अपने कंधे पर बेटी की लाश को लेकर निकल पड़े. 

                      
ओडिशा का दाना मांझी याद है आपको ? भूख के लिए कुख्यात रहे ओडिशा के कालाहांडी में अपनी मृत पत्नी की लाश को कंधे पर लादे पैदल चलते वे दाना मांझी जिनकी पीड़ा से दुनिया स्तब्ध रह गयी थी. इतना अधिक चर्चित हुआ था वह मामला कि बहरीन के सुल्तान भी दाना की सहायता को आगे आये थे, उन्हें लाखों की मदद मिली. उनके बच्चों की परवरिश और शिक्षा के पर्याप्त इंतजाम हो गए थे. लेकिन, दाना मांझी की तरह छत्तीसगढ़ के ईश्वर दास देश-दुनिया की उतनी भी संवेदना के हकदार नहीं रहे. छग के वनवासी संभाग सरगुजा के ईश्वर दास ने अपनी बीमार बिटिया को इलाज के लिए लखनपुर ब्लाक के सामुदायिक अस्पताल में भर्ती कराया था, जहां बच्ची की मौत हो गयी. आरोप यह भी है कि ग़लत चिकित्सा के कारण बच्ची की जान चली गयी.

बच्ची की मौत के बाद पिता ईश्वर शव ले जाने के लिए एम्बुलेंस की मिन्नतें करते रहे, लेकिन अस्पताल प्रशासन द्वारा एम्बुलेंस उपलब्ध नहीं करा पाने पर वे पैदल ही दस किलोमीटर अपने कंधे पर बेटी की लाश को लेकर निकल पड़े. पिछली भाजपा सरकार में ही मरीजों को चिकित्सा के लिए घर से अस्पताल तक लाने, या मृत्यु की स्थिति में पार्थिव शरीर को ससम्मान घर तक पहुचाने की पर्याप्त व्यवस्था की गयी थी. आज भी वे सारे इंतजामात हैं ही, लेकिन शासकीय और प्रशासकीय लापरवाही के कारण किस तरह के हालात हो सकते हैं, ईश्वर दास का यह मामला इसका साक्षात उदाहरण है.

यह जानकर किसी को भी दुःख होगा कि ऐसा मामला खुद स्वास्थ्य मंत्री के इलाके में हुआ है, फिर भी कहीं कोई ख़ास चर्चा नहीं है. हालांकि खबर सामने आने पर स्वास्थ्य मंत्री ने जिम्मेदार ब्लॉक चिकित्सा अधिकारी को हटा दिया है, लेकिन सवाल यहां अलग है. सवाल यह है कि छत्तीसगढ़ के ऐसे किसी भी दर्द के प्रति देश का मीडिया ऐसा उदासीन क्यों है? शेष देश में घटी ऐसी या इससे कम दर्दनाक घटनाएं भी एजेंडे के कारण दुनिया भर में पहुंचा दी जाती हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ को आखिर किसका शाप मिला है, जिसकी किसी भी घटना से ड्राइंग रूम में पसरे भारतीय मध्य वर्ग को फर्क नहीं पड़ता या उन्हें फर्क पड़ने नहीं दिया जाता है? आखिर क्या कारण है कि बड़े नक्सल हमले के अलावा छग की अन्य वीभत्सतम घटनाएं भी मीडिया और समाज की पेशानी पर ज़रा भी बल देने लायक नहीं समझी जाती हैं?

सवाल केवल इस एक या ऐसी ही घटनाओं का नहीं है. यह सही है कि किसी एक निर्मम घटना की तुलना किसी अन्य घटना से करना अनुचित है, या लाशों की संख्या के आधार पर भी तुलना उचित नहीं, लेकिन अन्य घटनाओं का जिक्र करने पर यह समझा जा सकता है कि छत्तीसगढ़, अपने ही देश में ख़बरों के मामले में कितना उपेक्षित और वंचित है। इस प्रदेश को आप मीडिया की दृष्टि से एक वंचित समूह में शामिल कर सकते हैं.

सवाल केवल एक ईश्वर मांझी का नहीं है. याद कीजिये बिहार के मुजफ्फरपुर या उत्तर प्रदेश के गोरखपुर की उन दर्दनाक घटनाओं को जिसमें चमकी बुखार या ऐसी ही कुछ बीमारी के कारण वहां बच्चों की लगातार मौत हो रही थी. किस तरह उन दोनों प्रदेश के दो शहरों में हुई घटनाओं को दुनिया भर में ऐसा प्रचारित किया गया मानो अब कोई भी शिशु इन दोनों प्रदेशों में सुरक्षित नहीं हैं. सरकारों ने मीडिया के दबाव में ही सही लेकिन झटपट कदम उठाये और इतनी बड़ी चुनौती का कुछ हद तक समाधान भी कर लिया गया. आज वर्षों से गोरखपुर से ऐसी ख़बरें नहीं आ रही हैं. स्थिति नियंत्रित कर ली गयी. लेकिन क्या आप जानते हैं कि छत्तीसगढ़ में 25 हज़ार, जी हां… 25 हज़ार से अधिक वनवासी बच्चे चिकित्सा सुविधा की कमी के कारण मौत के शिकार हुए हैं. ये आंकड़े भारतीय संसद में आये हैं.

छत्तीसगढ़ के राज्यसभा सदस्य रामविचार नेताम के सवाल के जवाब में खुद स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मंडाविया ने यह आंकड़े दिए. इस पर छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री टी. एस. सिंहदेव ने मुहर लगाते हुए कहा भी कि यह राज्य शासन के ही दिए आंकड़े हैं. इसी तरह यूनिसेफ की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि कांग्रेस के सत्ता में ‘2019 से 2021 के बीच 18 हज़ार बच्चों की मृत्यु उनके जन्म के केवल 28 दिनों के भीतर हो गयी. ऐसे 26 हज़ार शिशु साल भर के भीतर मर जाते हैं. खुद यूनिसेफ प्रमुख जॉब जकारिया के हवाले से यह बयान छपा कि – छत्तीसगढ़ में हज़ारों ऐसे बच्चों की मृत्यु होने पर भी कोई चर्चा नहीं होती लेकिन केरल में एक ऐसी मौत भी राजनीतिक विषय हो जाती है.

सवाल तो यह है कि ऐसे किसी विषय के समाधान के बारे में तो तब सोचा जाय जब समस्या हो, ऐसा स्वीकार भी करे कोई. प्रदेश की कांग्रेस सरकार को जितना ध्यान और संसाधन ऐसी समस्याओं के समाधान पर लगाना, उससे अधिक ध्यान विज्ञापन देने के अपनी ताकत और बाहुबल का उपयोग कर ऐसे विषयों को दबाने में किया जाता है. देश भर में कांग्रेस को चुनाव लड़ाने से बचे समय का उपयोग मुख्यमंत्री भूपेश बघेल अपने कम्युनिस्ट सलाहकारों के साथ ऐसे ही ‘मीडिया प्रबंधन’ में लगाते हैं. प्रबंधन से ही ऐसी ख़बरें कब्र से बाहर निकल नहीं पातीं. बस ऐसी कोई भी घटना नहीं होने संबंधित सीएम का बयान ही हेडलाइन बन जाता है. 25 हज़ार से अधिक बच्चों की मौत संबंधी ख़बरों को भले प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री ने स्वीकार किया लेकिन सीएम बघेल ने संसद में प्रस्तुत ऐसे आंकड़े को भी ‘भाजपा का आंकड़ा’ कहने में हिचक नहीं दिखायी. 

इन पंक्तियों के लिखे जाने तक सीएम बघेल का एक और बयान यहां बड़ी ‘खबर’ के रूप में बताया जा रहा है. बकौल बघेल- कांग्रेस के तीन वर्ष के शासन में कोई भी मुठभेड़ नहीं हुई है यहां। आप सोच कर भी क्षुब्ध हो जायेंगे कि भारत के किसी राज्य का चुना हुआ सीएम इस हद तक झूठ बोल सकता है. हाल ही में सुरक्षा बल की नौकरी के लिए तैयारी कर रहा बस्तर संभाग के नारायणपुर का युवक मानुराम नुरेटी फर्जी मुठभेड़ में मारे गए. पहले तो पुलिस ने इसे मुठभेड़ साबित करने की पूरी कोशिश की, लेकिन विपक्ष के सवाल उठाने पर अंततः ऑन रिकॉर्ड आईजी विवेकानन्द ने माना कि वह मुठभेड़ फर्जी थी. उसी गांव में उससे पहले भी मुठभेड़ में वनवासियों की हत्या कर दी गयी थी. इससे पहले बस्तर के ही सिलगेर में तीन वनवासियों को भून दिया गया, जिसके बारे में एकाध कॉलम की ही सही लेकिन ख़बरें तमाम संस्थानों में प्रकाशित-प्रसारित हुई. प्रदेश भाजपा ने इस घटना पर जांच कमेटी भी बनायी, जिस कमेटी को शासन ने उस इलाके में जांच के लिए घुसने नहीं दिया. फिर भी सीएम बाकायदा बयान दे रहे कि कोई मुठभेड़ नहीं हुई है.

इस हद तक झूठ और फरेब का लगातार रिकॉर्ड कायम कर रही है कांग्रेस सरकार। ऐसे में आप किसी समाधान की उम्मीद कर भी कैसे सकते हैं? लेकिन सवाल इससे भी बड़ा यह है कि सिविल सोसाइटी से लेकर देश के मीडिया तक आखिर इतने अधिक सेलेक्टिव चुप्पियों का जवाब इतिहास को कैसे देगा भला ? क्या हज़ारों बच्चों की ह्रदय विदारक मौतों को भी चयनात्मक रूप से ही देखा जाएगा? क्या ईश्वर दास के कंधे को दाना मांझी के कंधे की तरह ही हमारे कन्धों का सहारा नहीं मिलना चाहिए? क्या सृष्टि का सबसे बड़ा बोझ यानी अपनी सात वर्ष की बेटी की लाश उठा कर पैदल दस किलोमीटर चल रहे ईश्वर हमारी ज़रा सी भी तवज्जो के अधिकारी नहीं हैं? देश के सामने छत्तीसगढ़ के ये सवाल शायद अनुत्तरित ही रह जाने होंगे. या फिर प्रतीक्षा की जा रही होगी कि कांग्रेस सरकार नहीं रहने पर इन सवालों को उठाया जाएगा! फिलहाल तो छत्तीसगढ़ के इस उपेक्षा दर्द की कोई दवा नज़र नहीं आती. दिले नादां छत्तीसगढ़ को फिलहाल यही हुआ है. उसे ईश्वर नहीं भूपेश चाहिए.
 

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