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अटल चुनौती अखिल विश्व को…

Written byPanchjanyaPanchjanya
Jan 17, 2022, 07:56 am IST
in भारत, साक्षात्कार, दिल्ली
पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी

पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी

पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी से पाञ्चजन्य के प्रथम संपादक थे। उन्होंने पाञ्चजन्य को समावेशी राजनीतिक दृष्टि और संवेदनशीलता दी। अपनी पत्रकारीय यात्रा के हीरक जयंती वर्ष में प्रवेश के अवसर पाञ्चजन्य के अभिलेखागार में अटल जी के आलेखों का अवलोकन करना भी एक रोमांचक यात्रा रही। आज से चार-पांच-छह और सात दशक पहले अटल जी ने जिन मुद्दों को उठाया, जिन समीकरणों, कार्यक्रमों की बात की, वह बहुत बाद में देश की रवायत बनती दिखी। इस अर्थों में अटल जी दूरद्रष्टा साबित हुए। पाञ्चजन्य के अभिलेखागार से प्रस्तुत है अटल जी के कुछ आलेखों की झलक।

अटल जी की एक बड़ी कविता अभिलेखागार में मिलती है, वह प्रथम वर्ष के 18वें अंक में प्रकाशित है। इसका शीर्षक है हुंकार। दिसंबर 1957 में नजरबंदी कानून जनतंत्र के मस्तक कलंक रिपोर्ट में अटल निवारक निरोध अधिनियम, 1950 की अवधि बढ़ाए जाने पर सरकार की तर्कपूर्ण आलोचना करते हैं। वे लिखते हैं –

नजरबंदी कानून की अवधि को बढ़ाने के बारे में हम कोई भी विचार करें हमारे सामने तीन सवाल खड़े होते हैं। पहला सवाल – क्या बिना मुकदमा चलाए किसी व्यक्ति को जेल में रखना न्यायपूर्ण और उचित है। दूसरा सवाल – क्या देश में ऐसी परिस्थियां हैं जिसका सामना करने के लिए सरकार को ऐसे असाधारण अधिकार दिए जाने चाहिए। तीसरा सवाल-क्या पिछले सात साल का अनुभव बताता है कि सरकार इस कानून को सोच-समझ कर काम में लाई है?

अटल जी नागरिक अधिकारों की बात करते हैं। वह लिखते हैं- 
किसी भी सभ्य देश में बिना मुकदमा चलाए नजरबंद करने का कानून नहीं है। लोकतंत्र में ऐसे कानूनों के लिए कोई स्थान नहीं हो सकता। यह लोकतंत्र की जड़ पर कुठाराघात है, नागरिक स्वाधीनताओं का दमन करता है, व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन करता है। यह भारतीय गणतंत्र के माथे पर कलंक का टीका है। यह सरकार के लिए लांछन है और भारतीय जनता के लिए एक चुनौती है।

अटल जी ने उदाहरण दिया कि 
1926 में जब अंग्रेज एक पब्लिक सिक्योरिटी विधेयक लाए, जिसका संबंध केवल विदेशियों से था, और उसमें बिना मुकदमा चलाए नजरबंद करने की व्यवस्था की गई थी। तो विदेशियों के लिए लाए गए बिल को भी स्वर्गीय मोतीलाल नेहरू जी ने यह कहकर ठुकरा दिया था कि हम किसी को भी बिना मुकदमा चलाए किसी को नजरबंद करने के सुझाव का समर्थन नहीं कर सकते। पंडित जवाहरलाल ने भी सन 1936 में इस बात को स्वीकार किया था कि जो सरकार बिना मुकदमा चलाए किसी व्यक्ति को नजरबंद करती है, उस सरकार को रहने का अधिकार नहीं है।
अटल जी ने इसमें पंडित नेहरू की कथनी और करनी के बीच अंतर को उजागर किया। अटल जी ने यह दृष्टि दी कि व्यक्ति भले विरोधी है, उसके भी नागरिक अधिकार हैं। और लोकतंत्र में नागरिक अधिकारों की अवहेलना नहीं की जा सकती।

मार्च 1970 में अटल जी ने संसद बनाम सर्वोच्च न्यायालय विवाद पर टिप्पणी की। उन्होंने इस विवाद को व्यर्थ बताया। उन्होंने लिखा –
लोकतंत्र केवल जोड़-तोड़ के आधार पर बहुमत बनाकर जैसे-तैसे चलने वाली सरकार का नाम नहीं है। लोकतंत्र सोचने, आचरण करने, व्यवहार करने, जीवन बिताने का एक तरीका है। सत्ता के संघर्ष में साधनवों की पवित्रता ताक पर रख दी गई है। बैंक राष्ट्रीयकरण के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय के बाद देश में न्यायपालिका को जनता की दृष्टि से गिराने का जो योजनाबद्ध प्रयास हुआ है, वह लोकतंत्र को मजबूत नहीं कर सकता। अन्य मामलों की तरह से प्रधानमंत्री ने न्यायपालिका की प्रतिष्ठा पर आघात करने के इस अभियान में भी नेतृत्व किया है।

अटल जी ने इस आलेख में प्रेस की स्वतंत्रता पर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा हमला किए जाने पर भी उन्हें आड़े हाथ लिया। अटल जी ने लिखा – 
लोकतंत्र का एक आधार है प्रेस की स्वतंत्रता। प्रधानमंत्री प्रेस की स्वतंत्रता को भी पसंद नहीं करतीं। बम्बई में कांग्रेस अधिवेशन में उन्होंने कुछ समाचारपत्रों में काम करने वाले संपादकों और संवाददाताओं को बुलाया और इस बात की शिकायत की कि बम्बई अधिवेशन की ठीक तरह से पब्लिसिटी नहीं हो रही है। श्रीमती गांधी ने यह भी कहा कि मैं आप के मालिकों को बुलाकर दस मिनट में आपको ठीक कर सकती हूं।
अटल जी यहां लोकतंत्र के स्तंभों न्यायपालिका और प्रेस के अधिकारों और गरिमा को बनाए रखने की बात कर रहे हैं। अटल जी का यह रुख पाञ्चजन्य में और देश की जनता में लोकतंत्र के प्रति सम्मान का भाव उत्पन्न करता है। संवैधानिक संस्थाओं की मयार्दा को तार-तार करने में कांग्रेस किस तरह आगे रही, उसका उदाहरण भी इसमें मिलता है।

जनवरी, 1971 के अंक में अटल जी का एक आलेख है – दरिद्रता मिटा कर रहेंगे। इसमें वे लिखते हैं –
वस्तुत: यह एक रहस्य का विषय है कि पुरुषार्थ चतुष्टय के आधार पर जीवन का प्रासाद खड़ा करने वाले देश में दरिद्रता को ईश्वरीय देन समझने की भ्रामक भावना कैसे फैल गई। यह बात स्पष्ट समझ ली जानी चाहिए कि गरीबी, बेकारी, भुखमरी ईश्वर का विधान नहीं, मानवीय व्यवस्था की विफलता का परिणाम है। दरिद्रता के निर्मूलन के लिए सबसे पहली चीज यह है कि हम भाग्यवाद के स्थान पर कर्मवाद की प्रतिष्ठापना करें। विज्ञान और टेक्नोलॉजी के इस युग में गरीबी पर पूर्ण विजय पाई जा सकती है। यह ठीक है कि भौतिक समृद्धि के बाद भी नैतिक और आध्यात्मिक उत्कर्ष की आवश्यकता बनी रहेगी।किंतु इसके लिए भौतिकता की उपेक्षा करना उचित नहीं होगा। दरिद्रता का सर्वथा उन्मूलन कर हमें प्रत्येक व्यक्ति से उसकी क्षमता के अनुसार उससे कार्य लेना है और उसकी आवश्यकता के अनुसार उसे देना है।

स्पष्ट है कि अटल जी गरीबों को मुफ्त रोटी देकर उन्हें हमेशा के लिए गरीब बनाए रखने के पक्षधर नहीं थे बल्कि गरीबी के कारण को समाप्त कर गरीबी को समाप्त करने के पक्ष में थे। यह नीति किसी भी व्यक्ति या वर्ग के विकास के लिए महत्वपूर्ण है।

अटल जी ने इसके अतिरिक्त विभिन्न विषयों पर पक्ष रखा जो पाञ्चजन्य में प्रकाशित हुआ। उनके विचार न सिर्फ लोकमन का परिष्कार करते थे बल्कि परंपराओं का सम्मान करना और मानव मात्र के प्रति संवेदनशील होना भी सिखाते थे। 

 

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