बद्रीनारायण विश्नोई
मकर संक्रांति पर्व अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक महत्ता की दृष्टि से एक विशेष पहचान रखता है, क्योंकि यह पर्व पूरे देश के विभिन्न प्रांतों की अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक विलक्षणता और सम्पन्नता को दर्शाता है। इस वर्ष पौष मास, शुक्ल पक्ष, द्वादशी तिथि, १४ जनवरी, शुक्रवार को मकर संक्रांति पर्व है।
सूर्य के धनु राशि का भ्रमण पूर्ण कर, शनि की राशि मकर में प्रवेश से मकर संक्रांति का योग बनता है। इस पर्व के ज्योतिषीय और खगोलीय विज्ञान की दृष्टि से अपने-अपने मायने हैं। साथ ही सूर्य के उत्तरायण गमन से जुड़ीं शास्त्रीय और पौराणिक मान्यताएं भी हैं। इसी सम्बंध में एक दृष्टांत श्रीमद्भगवद्गीता के आठवें अध्याय के २४ वें श्लोक का उल्लेखनीय है, जिसमें भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं-
“अग्निज्र्याेतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्।
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्मब्रह्मविदो जनाः।।
अर्थ है कि जिस मार्ग में ज्योतिर्मय अग्नि अभिमानी देवता है, दिन का अभिमानी देवता है, शुक्ल का अभिमानी देवता है और उत्तरायण के छः महीनों का अभिमानी देवता है, उस मार्ग में मर कर गए हुए ब्रह्मवेत्ता अर्थात् परमेश्वर की उपासना से उनको परोक्ष भाव से जानने वाले योगीजन, इन देवताओं द्वारा क्रमपूर्वक ब्रह्म लोक को प्राप्त हो जाते हैं। ब्रह्मा जी की आयु तक वे वहाँ रहकर, महाप्रलय में ब्रह्मा जी के साथ ही मुक्त हो जाते हैं अर्थात् सच्चिदानंदघन परमात्मा को प्राप्त हो जाते हैं। मकर संक्रांति का पर्व पूरे देश में ‘दान -पर्व ‘के रूप में भी मनाया जाता है। इस पर्व पर श्रद्धालु नदी, सरोवर आदि में स्नान करके, अपने पूर्वजों और पितरों का तर्पण करते हैं। श्रद्धालु सूर्य भगवान् को अघ्र्य देकर, तिल, मूंगफली, गुड़ादि से निर्मित लड्डू, खिचड़ी, अन्न, धान, फल और वस्त्र का दान देकर, मंगल कामना करते हैं।
यह पर्व पूरे देश के विभिन्न प्रांतों में अपने-अपने सांस्कृतिक तौर-तरीक़ों से मानाया जाता है। तिब्बती और बर्मी परिवार सहित देश के पूर्वाेत्तर राज्य असम में इसे ‘बिहू’ के रूप में मानते हैं। ‘बि‘ का अर्थ ‘पूछना‘ और ‘हू‘ का अर्थ ‘देना‘ के रूप में प्रचलित हैं। अर्थात् श्रद्धालु भगवान् से शांति और समृद्धि के बारे में पूछते (मंगल-कामना) हैं। जिस पर भगवान् उन्हें अच्छी फ़सल और सम्पन्नता का आशीर्वाद देते हैं। ‘बिहू‘ असम की दिमासा जनजाति में बहुत ही लोकप्रिय पर्व है। मौटे रूप से असम में एक वर्ष में तीन ‘बिहू’ पर्व मनाए जाते हैं। जिसमें बोहाग या रोंगाली बिहू मध्य अप्रैल में, काटी या कोंगाली बिहू मध्य अक्टूम्बर में तथा माघ या भोगाली (भूगाली) बिहू या पौष संक्रांति जनवरी के मध्य (मकर संक्रांति के दिनों में) में मनाई जाती है।
भोगाली बिहू ‘भोग‘, आनंद और समृद्धि का प्रतीक होने से इसे ‘भोगाली‘ कहा जाता है। यह पर्व किसानों की फ़सल कटाई की उपज से जुड़ा हुआ है।
फ़सल कटाई के बाद उनके घर-आंगन सहित अन्न भंडार पूरे भरे रहते हैं। पौष संक्रांति या माघ या भोगाली बिहू एक सप्ताह तक चलता है। जिसमें पहले दिन (पूर्व संध्या) को ‘उरुका‘ कहा जाता है। इस दिन श्रद्धालु नदी के किनारे या खुली ज़गह में धान की पुआल से एक अस्थायी छावनी बनाते हैं, जिसे ‘भेलघर’ कहा जाता है।
इस छावनी के पास चार बांस लगाकर, उस पर पुआल और लकड़ी से ऊंचे गुम्बज जैसा निर्माण करते हैं, जिसे ‘मेजी‘ कहते हैं। गांव के सभी श्रद्धालु, भक्त आदि यहां अलाव जलाकर, रात्रि भोज और मंगल गान करते हैं। ’उरुका‘ के अगले दिन (दूसरे) लोग स्नानादि करके ‘मेजी’ जलाकर ‘भोगाली बिहू’ को मनाते हैं। सभी भक्त, श्रद्धालु आदि ‘मेजी’ के चारों ओर एकत्र होकर, बिहू लोकगीत गाते हुए, मंगल कामना करते हैं। वे ‘मेजी‘ को नारियल, सुपारी, चावल, तिल पीठा, लड्डू, फलादि भेंट करते हैं, ढोल बजाते और गीत के साथ लोकनृत्य भी करते हैं। लोग अग्नि देवता को नये अन्न का भोग चढ़ाकर, अपने लिए शांति और समृद्धि की कामना करते हैं। वे अपने यथेष्ट कार्यों की पूर्णता की के लिए फलदार पेड़ों के बीच फेंकने के लिए अध-जली लकड़ी के टुकड़े लेकर वापस घर आते हैं। अपने घरों के आस-पास के सभी पेड़ों को बांस की पट्टियों या धान के तने से बांध देते हैं।
पौष संक्रांति या भोगाली बिहू के अवसर पर विभिन्न प्रकार के परम्परागत खेल भैंस-लड़ाई, बैल-दौड़ आदि पूरे दिन आयोजित किए जाते हैं। मकर संक्रांति पर्व देश के दक्षिणी राज्यों में पोंगल, पंजाब में लोहड़ी, गुजरात में उत्तरायण, उत्तराखंड में उत्तरायणी, बिहार, झारखंड, प.बंगाल, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, गढ़वाल क्षेत्र, उत्तरप्रदेश आदि में ‘खिचड़ी-पर्व‘ के रूप में मनाये जाने से पूरे देश को सांस्कृतिक एकता के सूत्र में पिरोता है।
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