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पाकिस्तान में ईसाइयों का सतत उत्पीड़न

Written byएस वर्माएस वर्मा
Jan 1, 2022, 03:29 pm IST
inभारत, दिल्ली
पकिस्तान में चर्च पर हमलों का विरोध करते ईसाई समुदाय

पकिस्तान में चर्च पर हमलों का विरोध करते ईसाई समुदाय

पाकिस्तान में ईसाई समुदाय निरंतर दुर्व्यवहार का शिकार। उत्पीड़न के साथ ही ईसाई इस समय लॉकडाउन और पाकिस्तान के बुरे आर्थिक हालात के कारण बहुत दयनीय स्थिति से गुजर रहे। लगभग 11,500 पाकिस्तानी ईसाइयों ने शरणार्थी का दर्जा पाने के लिए संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग (यूएनएचसीआर) से संपर्क किया है

अपने मूल स्वरूप में इस्लामी राष्ट्र पाकिस्तान अन्य धर्मों-मतों के आचार-विचार के पालन और इससे संबंधित पर्वों और परम्पराओं के अनुशीलन के मामले में अत्यधिक कठोर रहा है,  इसका परिणाम यह है कि इस्लाम के अलावा अन्य मतों-पंथों का अस्तित्व यहां अत्यंत संकट में आ गया है। पाकिस्तान की दूसरी सबसे बड़ी अल्पसंख्यक आबादी अर्थात ईसाई इससे अछूते नहीं हैं।अभी हाल ही में 25 दिसम्बर को ईसाइयों का सबसे बड़ा पर्व क्रिसमस गुजरा है। पाकिस्तान में क्रिसमस, कोई उत्सव का माहौल लेकर नहीं आता, बल्कि पाकिस्तान में रहने वाली 20 लाख से अधिक ईसाई आबादी कट्टरपंथियों के डर के चलते इसे उल्लास के बजाय चिंता के साथ मनाने को विवश है।

पृष्ठभूमि
जिन्ना और मुस्लिम लीग के दुश्चक्रों के कारण इस्लामी पाकिस्तान का जन्म हुआ, जिसने लाखों की संख्या में न केवल हिन्दुओं और सिखों की जान ली, बल्कि पाकिस्तान में रह जाने वाले ईसाई समुदाय का जीवन दुष्कर बना दिया। 1947 में, उस समय पश्चिमी पाकिस्तान के क्षेत्र में रहने वाले ईसाइयों को दो मुख्य प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता था:  पहले  भूमिहीन, अकुशल, गरीब मजदूर और किसान, जो मुख्यत: मध्य पंजाब के गांवों के रहने वाले थे और दूसरे शिक्षित ईसाई पेशेवर, ज्यादातर एंग्लो-इंडियन और गोवा से आए प्रवासी लोग, जो बड़े शहरों में रहते थे, जैसे कराची और लाहौर। ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले अधिकांश ईसाइयों के पास जमीन नहीं थी। वह जिस जमीन का उपयोग करते थे, वह सरकारी दस्तावेजों  में शामलात-ए-देह के रूप में दर्ज, थी और गांव में सामूहिक उपयोग के लिए निर्धारित की गई थी। पाकिस्तान के निर्माण के तुरंत बाद से धार्मिक कट्टरपंथ के चलते एंग्लो-इंडियन और गोवावासियों को नौकरियों और व्यापार के अवसरों में भेदभाव का सामना करना पड़ा। औपनेवेशिक काल में जहां एक ओर उनकी विशेषाधिकार प्राप्त सामाजिक स्थिति – जो उनके अंग्रेजी भाषा कौशल और ब्रिटिश सांस्कृतिक तौर-तरीकों के कारण उपयोगी मानी जाती थी, अब एक निर्योग्यता समझी जाने लगी। इसके साथ ही साथ पंजाबी मूल के ईसाइयों के साथ उनकी जाति और उनकी सांवली त्वचा के कारण हमेशा अवमानना का व्यवहार किया जाता था।
कई बार इससे निबटने के लिए पलायन को एक उपाय के रूप में इस्तेमाल किया गया परन्तु यह दोनों प्रकार के समूहों के लिए अलग-अलग था। गांवों में उत्पीड़न का सामना कर रहे पंजाबी ईसाइयों ने गांवों को छोड़कर मुख्य शहरों में स्थानांतरित होना प्रारंभ कर दिया। वहीं दूसरी ओर साधन सम्पन्न ईसाइयों, जैसे एंग्लो-इंडियन और गोवा के प्रवासियों ने बड़ी संख्या में पाकिस्तान छोड़कर यूरोप और उत्तरी अमेरिका चले जाना उचित समझा।1960 और 1970 के दशक में यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका में पाकिस्तानी प्रवासियों की ऐसी बड़ी संख्या प्रवासियों के रूप में पहुंची।

संवैधानिक छल
पाकिस्तान अपने संविधान का हवाला देते हुए अल्पसंख्यकों के साथ किसी भी भेदभाव से इनकार करता रहा है। जैसे कि पाकिस्तान के संविधान का अनुच्छेद 20 धर्म को मानने और धार्मिक संस्थानों के प्रबंधन की स्वतंत्रता प्रदान करता है। अनुच्छेद 25 नागरिकों को समानता प्रदान करता है, इसके साथ अनुच्छेद 26 सार्वजनिक स्थानों तक पहुंच के संबंध में भेदभाव को वर्जित करता है।अनुच्छेद 27 सेवाओं में भेदभाव के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करता है, और सबसे महत्वपूर्ण अनुच्छेद 30,  अल्पसंख्यकों को  सुरक्षा प्रदान करता है। परन्तु ये सारे संवैधानिक अधिकार खोखले हैं और न केवल बहुसंख्यक इस्लामी आबादी, बल्कि  सरकार द्वारा भी इन प्रावधानों की घोर उपेक्षा और उल्लंघन किया गया है। पाकिस्तान एक ऐसा देश है जहां ईशनिंदा के लिए अनिवार्य रूप से मौत की सजा का प्रावधान है। आज के आधुनिक विश्व में पाकिस्तान, मध्ययुगीन बर्बरता का प्रतिनिधि राज्य बना हुआ जहां एक अनुमान के अनुसार, प्रतिदिन औसतन एक अल्पसंख्यक समुदाय की लड़की का अपहरण, बलात्कार, और इस्लाम में कन्वर्जन किया जाता है, और इस सारी प्रक्रिया में कानून प्रवर्तन एजेंसियों और  न्यायपालिका की मिलीभगत भी होती है।

स्थायी उत्पीड़न !
पाकिस्तान के ईसाइयों के साथ होने वाला यह उत्पीड़न सतत रूप से जारी है। पाकिस्तान की आबादी का 1.6 प्रतिशत हिस्सा ईसाई धर्मावलम्बियों का है, जो मुख्य रूप से लाहौर, फैसलाबाद और कराची शहरों के आसपास केंद्रित हैं। साथ ही कुछ संख्या सिंध एवं खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में स्थित हैं। बड़ी संख्या में यही आबादी सफाईकर्मियों के रूप में कार्य कर रही है और इस कारण इसे अनेक प्रकार के सामाजिक भेदभावों का सामना करना पड़ता है। इसके साथ ही साथ इनकी कमजोर आर्थिक स्थिति इनके आगे बढ़ने के रास्ते में बड़ी रुकावट है। विगत वर्ष कोविड जैसी वैश्विक महामारी के कारण इनकी स्थिति और भी बुरी हो चुकी है।एक अध्ययन में पाया गया है कि सत्तर प्रतिशत ईसाइयों, विशेष रूप से दैनिक वेतनभोगियों और मजदूरों ने अपनी नौकरी खो दी या देशव्यापी लॉकडाउन  के दौरान इनकी आय में भयंकर कमी देखी गई है।

सेंटर फॉर डेमोक्रेसी, प्लुरलिज्म एंड ह्यूमन राइट्स (सीडीपीएचआर) ने अपनी रिपोर्ट में कहा: पाकिस्तान के इस्लामी गणराज्य में अल्पसंख्यकों को स्थायी रूप से अवरुद्ध जीवन जीने के लिए विवश किया जाता है। सैद्धांतिक रूप से, पाकिस्तान का संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार प्रदान करता है, लेकिन ये केवल कागज पर हैं। धार्मिक एवं पंथ अल्पसंख्यकों – हिंदू, ईसाई, सिख, बौद्ध, अहमदिया, यहां तक कि शियाओं को भी गैर-नागरिक माना जाता है। वे बिना आवाज वाले लोग हैं, बिना किसी संवैधानिक या कानूनी रूप से संरक्षित अधिकारों के लोग हैं। पाकिस्तान में अल्पसंख्यक स्टेटलेस हैं। पंजाबी  प्रभुत्व वाला  सैन्य-राजनेता गठबंधन न केवल धार्मिक-पंथिक अल्पसंख्यकों का बल्कि बलूच और हजारा समुदाय के मानवाधिकारों का भी उल्लंघन करता है। और इस उत्पीड़न के कारण भारी मात्रा में पाकिस्तान से इन समुदायों का पलायन जारी है। अगर हम ईसाई समुदाय की ही बात करें तो वर्ल्ड वॉच मॉनिटर, जो एक अंतरराष्ट्रीय ईसाई समाचार सेवा है, की रिपोर्ट के अनुसार  हाल के वर्षों में लगभग 11,500 पाकिस्तानी ईसाइयों ने शरणार्थी का दर्जा पाने के लिए संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग (यूएनएचसीआर) से संपर्क किया है। इस प्रकार आर्थिक सामाजिक और  रूप से उत्पीडित ईसाई आबादी पाकिस्तान में अमानवीय परिस्थितियों में जीवन जीने को विवश है। इमरान खान के नेतृत्व में यह पाकिस्तान के सामाजिक-राजनीतिक जीवन पर धार्मिक चरमपंथियों की पकड़ का परिणाम है! 

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