ब्रह्मदेश अर्थात् म्यांमार से भू-सांस्कृतिक व राजनीतिक एकता
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होम भारत

ब्रह्मदेश अर्थात् म्यांमार से भू-सांस्कृतिक व राजनीतिक एकता

Written byप्रो. भगवती प्रकाशप्रो. भगवती प्रकाश
Dec 10, 2021, 11:19 am IST
in भारत, दिल्ली
प्राचीन ब्रह्मदेश या वर्तमान म्यांमार में हिंदू संस्कृति रही है। स्वतंत्रता संग्राम के समय असहयोग आंदोलन के तेज होने से अंग्रेजों ने इसे भारत से अलग देश बना दिया था। दूसरी सदी में बर्मा में लोगों के संस्कृत नाम होते थे और हिन्दू देवी-देवताओं के साथ हिन्दू वास्तुशिल्प की प्रधानता थी। चौथी सदी से बौद्ध मत का प्रसार होने लगा। बाद में वामपंथी शासन और रोहिंग्याओं ने हिंदुओं पर अत्याचार किए जिससे आज वहां हिंदुओं की बहुत कम संख्या बची है

चीन ब्रह्मदेश का नाम अंग्रेजों ने बर्मा और 1989 में वहां के सैन्य शासन ने म्यांमार कर दिया था। वृहत्तर भारत के अंग और सम्पूर्ण दक्षिण पूर्व एशिया को भारत से जोड़ने वाले बर्मा को अंग्रेजों द्वारा 1937 में पृथक देश बनाने के पहले यह भारत का एक प्रदेश था।

भू-राजनैतिक एकता
अरुणाचल, नागालैण्ड, मिजोरम और मणिपुर राज्य की सीमाओं से जुड़े म्यांमार से बांग्लादेश, लाओस व थाईलैण्ड की अन्तरराष्ट्रीय सीमाएं लगती हैं। बर्मा के रास्ते ही प्राचीन स्याम देश (थाईलैण्ड) एवं चम्पा अर्थात् वर्तमान विएतनाम तक वृहत्तर भारत का विस्तार था। तमिलनाडु के प्राचीन औद्योगिक नगर कोडूमनाल में मिले थाईलैण्ड के सिक्के 2500 वर्ष पूर्व थाईलैण्ड से लौह, इस्पात, रत्न व वस्त्रों के व्यापार का प्रमाण हैं।

भारत से अलग करने का कारण
ब्रिटिश शासन में 1937 तक बर्मा भारत का अंग था। 1920 में चले असहयोग आन्दोलन ने बर्मा में अधिक जोर पकड़ लिया था। भारत में महात्मा गांधी के 1922 में असहयोग आन्दोलन वापस ले लेने के बाद भी बर्मा में आन्दोलन जोर पकड़ता गया। कई आन्दोलनकारी 1922-37 के बीच मारे गए और 175 को मृत्यु दण्ड तक मिला। इसलिए अंग्रेजों ने अलग संविधान बनाकर इस आन्दोलन को कुचलने के लिए उसे भारत से अलग देश बना दिया।

सांस्कृतिक एकता
पहली सदी तक म्यांमार का पौराणिक नाम इन्द्र्रद्वीप रहा है। आक्सफोर्ड विवि के पौर्वात्य विशेषज्ञ प्रो. होरास हेमन विल्सन के अनुसार बर्मा व तिब्बत की सभ्यताएं भारत से निकली हैं। इसे हरबिलास शारदा ने भी ‘हिन्दू सुपीरिअरिटी’ में पृष्ठ 180 पर उद्धृत किया है। कलकत्ता के संस्कृत महाविद्यालय के सुपरिटेंडेंट रहे विल्सन भारत में अंग्रेजी शिक्षा का माध्यम बनाए जाने के विरुद्ध थे। उन्होंने मैक्समूलर के जन्म से दस वर्ष पहले 1813 में ऋग्वेद का अंग्रेजी भाषान्तर किया,  कालिदास के मेघदूत, विष्णु पुराण का भाषान्तर कर संस्कृत-अंग्रेजी शब्दकोश, संस्कृत व्याकरण, आयुर्वेदिक औषधि विज्ञान एवं भारतीय शल्य चिकित्सा, हैजा व कुष्ठ की भारतीय चिकित्सा पर लिखा।

साहित्य व संस्कृति
म्यांमार के साहित्य, पुरातत्व व भाषा पर हिन्दुत्व का व्यापक प्रभाव रहा है। अराकान, तगौंग, श्री क्षेत्र, थाटोन और पेगु की सभ्यता, संस्कृति, साहित्य व पुरातत्व पर यह प्रभाव प्राचीनकाल से था। वहां ब्रह्मा, विष्णु, बुद्ध, बौद्ध मतानुकूल ब्रह्मा की प्रतिमा, काली साहित कई हिन्दू प्रतिमाएं हैं। रामायण का उच्चारण वहां ‘‘यामायण’’ ‘‘राम’’ का उच्चारण ‘याम’, सीता का ‘थिदा’ और रावण का दत्त थिगिरी था। नाटिका के रूप में रामायण का नाम ‘‘यम-जतद्वा’’ है। यामायण एवं यम-जातद्वा का चलन अनावृहत के शासन (1044-77) से पीढ़ी दर पीढ़ी मौखिक चलन में रहा है। ‘‘राम गीन’’ उसके बाद 1775 में यह ‘‘यू आंग फायो’’ द्वारा ‘‘राम थागीन’’ के नाम से गीतमय पद्य में लिखी गई। पूरी राम कथा 1870 में तीन खण्डों में ‘‘राम वात्थु’’ (अर्थात राम वात्र्ता) के नाम से ताड़पत्र पर लिखी, जिसमें 16 पृष्ठों में हाथ से पेंट किए चित्र भी हैं। ‘रामायण जातक’ के नाम से कोम्बौंग साम्राज्य (1752-1885) में भी संकलन किया गया। कोम्बौंग साम्राज्य के मंत्री ‘‘म्यावाद्दी मिगुई यू सा’’ ने भी इसे नृत्य नाटिका के रूप में लिखा। बर्मी बरतनों व काष्ट कलाकृतियों पर रामायण के दृश्य 19वीं सदी तक प्रचुरता में अंकित किए जाते थे।

देवी-देवताओं का चलन
प्राचीन ‘बागान’ साम्राज्य एवं ‘‘मोन’’ साम्राज्य में ब्रह्मा, इन्द्र्र, विष्णु व बुद्ध की प्रतिमाएं मिली हैं। प्राचीन बागान साम्राज्य का ‘नाथ्लौंग क्यौंग’ प्राचीन विष्णु मन्दिर है। ग्यारहवीं सदी का यह मन्दिर राजा अनावर्थ द्वारा बनाया गया था। एक मत से यह प्राचीन ईसा पूर्व काल का मन्दिर है, जिसका जीर्णोद्वार ग्यारहवीं सदी में हुआ। इसमें विष्णु के दस अवतारों की मूर्तियां रही हैं। उनमें सात आज भी है, जिनमें गौतम बुद्ध भी विष्णु के नौवें अवतार के रूप में हैं।

यह ग्यारहवीं सदी के सनातन वैदिक व बौद्धमत की एकात्मकता का द्योतक है। म्यांमार में सनातन वैदिक व बौद्धमत की एकता के कई मन्दिर हैं। बौद्ध मन्दिरों में वैदिक देवता ब्रह्मा की सर्वाधिक प्रतिमाएं म्यांमार में हैं। चित्र 1 में म्यांमार के श्रीक्षेत्र से प्राप्त ब्रह्मा व इन्द्र की संयुक्त प्रतिमाएं हैं। चित्र 2 में शयन मुद्रा में विष्णु ब्रह्मा के साथ हैं। यह प्रतिमा प्राचीन ‘मोन’ साम्राज्य स्थित थाटन कस्बे में प्राप्त हुई है। चित्र 3 में थेरवाद के मन्दिर क्रमांक 653 की छत में चित्रित विशाल ब्रह्मा की प्राचीन पेंटिंग है। चित्र 4 में हंसारूढ़ ब्रह्मा हैं।

चित्र 8 में यगूंन का 19वीं सदी का काली मन्दिर है। चित्र 5, 6 व 7 हाल ही में अराकान में मिले 3 शिलालेख हैं। म्यांमार के और संस्कृत शिलालेखों पर आर्कियोलॉजिक सर्वे आॅफ बर्मा के 1956, 1960, 1964 वे 1965 के प्रतिवेदन हैं। म्यांमार में विष्णु, शिव, इन्द्र्र, ब्रह्मा, हनुमान सूर्य व मां दुर्गा की प्रतिमाएं मिलने से वहां पागान (बागान) क्षेत्र के उत्कर्ष के काल में प्राचीन हिन्दू संस्कृति का आभास मिलता है।

पूर्व पागान काल में 850 ईसा पूर्व की राज्याज्ञा ‘‘राजवंश’’ में अभिराज के बसाए हस्तिनापुर का नाम कालान्तर में सक्सिनापुर हो गया, वही आज का तागौंग है। एक जर्मन पुरातत्वाविद् को  अभिराज के वंशजों द्वारा बर्मा के कई भागों में नगर बसाने का 416 ईस्वी का एक संस्कृत अभिलेख मिला है।

वैदिक पद्धति के शहरकोट युक्त 18 नगरों में अधिकांश 850 ईसा पूर्व से 800 ईस्वी के हैं। चीनी यात्री व्हेनसांग व चीन के तांगवश के क्रानिकल ने भी श्रीक्षेत्र सहित कई हिन्दू साम्राज्यों का उल्लेख किया है। तांगवंश (618-907 ई.) के क्रॉनिकल में 800 ईस्वी में बर्मा के 35 संगीतज्ञ व नर्तकों का चीन के दरबार में संस्कृत गीतों का प्रस्तुति का लेख है।

हिन्दुओं का उत्पीड़न
हिन्दुत्व के प्रभाव के बाद भी आज वहां मात्र 1.7 प्रतिशत हिन्दू हैं। बर्मा के वामपंथी शासन ने बड़ी संख्या में हिन्दुओं को निष्कासित किया। तीन लाख लोगों ने 1963-67 के बीच ही म्यांमार छोड़ा था। रोहिंग्या मुस्लिमों ने भी 2017 में बड़े पैमाने पर यातनापूर्वक हिन्दुओं की हत्याएं, अपहरण, बलात् मतान्तरण आदि किए, जिस पर एमनेस्टी इंटरनेशनल के विस्तृत प्रतिवेदन हैं।
(लेखक गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा के कुलपति रहे हैं)

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