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आर्थिक विवादों के निवारण के लिए थे व्यापक विधान

Written byप्रो. भगवती प्रकाशप्रो. भगवती प्रकाश
Oct 27, 2021, 11:26 am IST
in भारत, धर्म-संस्कृति, दिल्ली

 

वैदिक काल में आधुनिक आर्थिक व वाणिज्यिक विधानों की भांति ही आर्थिक विवादों के लिए व्यापक विधान थे। आर्थिक याचिकाएं 18 भागों में विभाजित थीं और चार प्रकार के न्यायालयों का प्रावधान था

 

आधुनिक आर्थिक व वाणिज्यिक विधानों की भांति प्राचीन राज-शास्त्रीय ग्रन्थों एवं स्मृतियों में भी क्रय-विक्रय, संविदा, अनुबन्ध, ऋण-शोधन, अस्वामी-विक्रय आदि अनेक प्रकार के आर्थिक व्यवहारों पर विस्तृत विधान व नियमों का विवेचन है। वेदों में विवेचित वृहद स्तरीय व्यापार, वाणिज्य समुद्र पार निर्यात और जल, थल व नभ मार्गों से परिवहन आदि के विवरणों के अनुरूप ही हमारे प्राचीन वाड्.मय में क्रय-विक्रय व वाणिज्य सम्बन्धी विधियों अर्थात कानूनों का विस्तृत विवरण मिलता है। आर्थिक व्यवहारों के सम्बन्ध में जो वाद या लॉ सूट लाये जाते थे, उन्हें 18 प्रकार के व्यवहार पदों अर्थात 18 प्रकार की न्यायिक याचिकाओं में वर्गीकृत किया गया है, जिन्हें पुन: 108 श्रेणियों में उपविभाजित कर उनके सम्बन्ध में विस्तृत नियमावलियों का संकलन है।

प्राचीन 18 प्रकार के व्यवहार पद अर्थात न्यायिक याचिकाएं
प्राचीन आर्थिक व्यवहार व लेन-देन सम्बन्धी विवादों के 18 प्रकार के व्यवहार पदों पर आज के विधिशास्त्र से कहीं विस्तृत विधान लिपिबद्ध है।
स्मृतियों के अनुसार विवाद के 18 व्यवहार पद इस प्रकार हैं :

  1. ई वस्तु देकर फिर क्रोध, लोभ आदि के कारण बदल जाना। याज्ञवल्क्य व नारद ने दत्तप्रदानिक व बृहस्पति ने अदेयाद्य शब्द प्रयोग किया है।
  2. वेतन अनपाकर्म (वेतन न देना)- किसी से काम लेकर उसका पारिश्रमिक न देना। इसके लिए वेतन-अदान व भृत्यदान शब्द भी मिलते हैं।
  3. संविद व्यतिक्रम – कोई अनुबन्ध या संविदा अर्थात कॉन्ट्रैक्ट करके उसे पूरा न करना।
  4. क्रय-विक्रय का अनुशय – किसी वस्तु के खरीदने या बेचने के बाद में असंतोष होना। इसके लिए क्रीतनिुशय व विक्रीत-क्रीतानुशय शब्दों का प्रयोग भी मिलता है।
  5. स्वामिपाल विवाद अर्थात स्वामी और पशुपालक का विवाद – चरवाहे की असावधानी से पशु मृत्यु के विवाद।
  6. क्षेत्रजविवाद (ग्राम आदि की सीमा का विवाद) – मकान आदि का सीमा विवाद भी इसी में आता है। भूवाद शब्द प्रयोग भी मिलता है।
  7. वाक् पारूष्य – गाली गलौज करना पारूष्य, मानहानि कारक अपकृव्य करना।
  8. दण्ड पारूष्य – मारपीट
  9. स्तेय (चोरी) –
  10. साहस (डकैती) या वध व हिंसा – बलपूर्वक स्वामी की उपस्थिति में धन का हरण।
  11. स्त्री संग्रहण – स्त्रियों के साथ दुर्व्यवहार या अशोभनीय व्यवहार।
  12. स्त्री पुंधर्म – स्त्री और पुरूष (पति-पत्नी) के आपसी विवाद।
  13. विभाग-दाय विभाग – पैतृक सम्पत्ति विभाजन।
  14. द्यूत समाह्वय या अक्षवेदन-दोनों जुए के अन्तर्गत आते हैं। प्राणी रहित पदार्थों के द्वारा ताश, चौपड़, जुआ, द्यूत कहलाता है; प्राणियों के द्वारा तीतर, बटेर आदि का युद्ध घुड़दौड़ आदि समाह्वय।
    अतिरिक्त व्यवहार पद : कुछ ग्रन्थों में व्यवहारपद के अतिरिक्त वर्ग भी मिलते हैं:-

1.    अभ्यूपेत्यासुश्रूषा या असुश्रूषा
2.     विक्रीयसम्प्रदानष 3.    प्रकीर्णक

व्यवहार पद से आशय व न्यायालयों के प्रकार
हिन्दू विधि के सन्दर्भ में व्यवहार एक महत्वपूर्ण संकल्पना है। कात्यायन ने इस शब्द का विश्लेषण इस प्रकार किया है- व्यवहार = वि $ अव $ हार; ‘वि’ का अर्थ ‘विभिन्न’ तथा ‘अव’ का अर्थ सन्देह तथा हार का अर्थ ‘हरना’ या ‘दूर करना’ है। अर्थात पद व्यवहार विभिन्न प्रकार के आर्थिक विवादों का निवारण करता है।

न्यायालय के प्रकार या श्रेणियां
बृहस्पति स्मृतिचन्द्रिका के अनुसार भारत में चार प्रकार के न्यायालय होते थे-

  1. प्रतिष्ठित न्यायालय: किसी पुर या ग्राम में प्रतिष्ठित स्थायी रूप से विद्यमान या कार्यरत न्यायालय इस श्रेणी में आते हैं।
  2. अप्रतिष्ठित न्यायालय: ऐसे न्यायालय स्थायी रूप से एक स्थान पर प्रतिष्ठित न होकर विभिन्न ग्रामों में समय-समय पर स्थापित किये जाते थे। इन्हें चल न्यायालय भी कहा जाता था।
  3. मुद्रित या मुद्रा युक्त न्यायालय: अर्थात शासकीय मुद्राओं के अन्तर्गत कार्यरत न्यायालय, तथा
  4. राज्य शासित व संचालित न्यायालय।

आर्थिक नियमावली व न्याय के आधार
आज के इकोनॉमिक लॉ या आर्थिक विधियों के समतुल्य मनुस्मृति, याज्ञवल्कय स्मृति, कौटिल्य अर्थशास्त्र तथा नारद व बृहस्पति आदि की स्मृतियों में आर्थिक व्यवहारों के सम्बन्ध में विधानों एवं व्यवस्थाओं का विस्तृत वर्णन, व्यवहार पदों के अन्तर्गत किया गया है। स्मृतियां उन विषयों को, जिनके अन्तर्गत विवाद उत्पन्न हो सकता है, 18 शीर्षकों में रखती हैं। इन्हें व्यवहारपद कहते हैं। देश में जब प्रथम सिविल प्रक्रिया संहिता बनी थी, उसे भी तब प्रारम्भिक वर्षों में व्यवहार प्रक्रिया संहिता ही कहा जाता रहा है। व्यवहार के 18 पदों का तात्पर्य है कि सभी प्रकार के विवाद 18 में से किसी एक श्रेणी के अन्तर्गत रहेंगे। दण्ड व्यवस्था भी स्मृतियों में इन 18 प्रकार के पदों के अनुसार ही है। आपराधिक कृत्यों के विधान व्यवहार पदों से सभी में भिन्न हैं।

व्यवहार पदों के विषय में स्मृतिगत भिन्नताएं
व्यवहार के इन 18 पदों का मनु स्मृति एवं नारद स्मृति में भी भेद है। मनु स्मृति में क्रय-विक्रय दोनों पदों को एक साथ रखा है किन्तु नारद स्मृति में क्रय-विक्रय को अलग-अलग रखते हुए व्याख्या की है। इसमें स्वामी और पशुपालन का विवाद, स्तेय, स्त्री संग्रहण का वर्णन 18 पदों में नहीं किया गया है। परन्तु विवाद के 18 पदों की पूर्ति अन्य प्रकारों से की है। नारद स्मृति में क्रय-विक्रय को दो अलग-अलग पदों में रखा गया है तथा अभ्युयेत्यशुश्रूष तथा प्रकीर्णक को व्यवहार के पदों में स्थान देकर 18 पदों की पूर्ति की गई है। इसी प्रकार याज्ञवल्कय स्मृति के व्यवहार पद मनु स्मृति से कुछ भिन्न हैं। याज्ञवल्कय व नारद स्मृति में क्रय-विक्रय को अलग-अलग रखा गया है तथा स्त्री पुंधर्म का उल्लेख नहीं है। नारदस्मृति के समान अभ्युयेत्यशुश्रूषा तथा प्रकीर्णक के वर्णन से 18 की संख्या पूर्ण हो जाती है।

व्यापकता
व्यवहार के पदों को, जो इस प्रकार विभिन्न शीर्षकों के अन्तर्गत रखा गया है, इसका अर्थ यह नहीं था कि इन्हीं शीर्षकों के अन्तर्गत यदि विवाद होगा तो उसी का ही निर्णय किया जाएगा तथा दूसरे विवादों को स्वीकार नहीं किया जाएगा। वास्तव में इन विभिन्न भेदों के रूप में अनेक प्रकार के विवादों का उपचार स्मृतियों से प्राप्त होता है। नारद ने इन विभिन्न भेदों की संख्या 108 बताई है। ये सभी इन शीर्षकों के अन्तर्गत किसी न किसी प्रकार आ ही जाते हैं। इस प्रकार समाज में अपराध नियंत्रित रहे एवं लोग अपने-अपने धर्म का परिपालन करते रहें व आर्थिक व्यवहारों में विश्वसनीयता व समाज में सुव्यवस्था बनी रहे, इस हेतु मनु, याज्ञवलक्य एवं नारद आदि स्मृतियों में न्यायोचित विधानों की व्यवस्था की गई थी।
  (लेखक गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा के कुलपति रहे हैं)

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