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बुढ़ाती बसें, परवान चढ़ता प्रचार

Written byअरुण कुमार सिंहअरुण कुमार सिंह
Aug 9, 2021, 02:41 pm IST
in भारत, दिल्ली

यह हाल है दिल्ली में डीटीसी की बसों का  


अरुण कुमार सिंह


इस वर्ष अप्रैल, मई और जून की तिमाही में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने विज्ञापन पर 63.56 करोड़ रु. खर्च किए—प्रतिदिन 71,00,000 रु.। डीटीसी 2015 से हर वर्ष 1,000 करोड़ रु. से भी अधिक का घाटा उठा रहा है। स्थिति यह है कि उसकी लगभग 4,000 बसों में से 3,760 बसें जर्जर हो चुकी हैं, लेकिन सरकार नई बसें नहीं खरीद  पा रही


 

केजरीवाल को अपना चेहरा दिखाने का कितना शौक है, उसका एक उदाहरण देखकर आप दंग रह जाएंगे। कोरोना की दूसरी लहर में जब आॅक्सीजन की कमी से दिल्ली में लोग मर रहे थे, उस समय भी केजरीवाल ने अखबारों, चैनलों और वेबसाइटों को करोड़ों रुपए का विज्ञापन दिया। 16 जुलाई को सूचना का अधिकार (आरटीआई) के अंतर्गत मांगी गई एक जानकारी के जवाब में सूचना एवं प्रसार निदेशालय, दिल्ली सरकार ने बताया है कि दिल्ली सरकार ने अप्रैल के महीने में 3.42 करोड़ रु., मई में 7.77 करोड़ रु. और जून महीने में 52.37 करोड़ रु. के विज्ञापन दिए।

 

जब अरविंद केजरीवाल नए-नए मुख्यमंत्री बने थे तब उन्होंने कहा था कि डीटीसी के बेड़े में 15,000 बसें शामिल की जाएंगी, लेकिन अब उसका ठीक उल्टा हो रहा है। बसें बढ़ने की बजाय कम हो रही हैं। केजरीवाल सरकार ने डीटीसी का बेड़ा गर्क कर दिया।

— नवीन कुमार, प्रवक्ता, दिल्ली भाजपा

 

यह वही अवधि है, जब अरविंद केजरीवाल खुद ही उच्च न्यायालय से लेकर मीडिया तक में कह रहे थे कि आॅक्सीजन की घोर कमी है। वे न्यायालय से बार-बार गुहार लगा रहे थे कि वह केंद्र सरकार को दिल्ली का आॅक्सीजन कोटा बढ़ाने का निर्देश दे, लेकिन जब केंद्र सरकार ने आॅक्सीजन का अंकेक्षण (आॅडिट) कराने की बात कही तो केजरीवाल और उनके अन्य साथी नेता कहने लगे कि दिल्ली में आॅक्सीजन की कोई कमी नहीं है। और यही बताने के लिए तीन महीने के अंदर 63.56 करोड़ रु. का विज्ञापन अखबारों और चैनलों को दे दिया। यानी प्रतिदिन लगभग 71,00,000 रु. विज्ञापन के नाम पर खर्च किए गए।

इस पर भाजपा के आईटी प्रमुख अमित मालवीय ने दिल्ली सरकार को घेरते हुए एक ट्वीट किया जिसमें उन्होंने लिखा है, ‘‘जब दिल्ली में आॅक्सीजन की कमी के कारण लोग मर रहे थे, अरविंद केजरीवाल ने अपने प्रचार पर एक दिन में लगभग 71,00,000 रु. खर्च किए। इन पैसों से कितने आॅक्सीजन प्लांट या बेड की व्यवस्था की जा सकती थी? कितने लोगों की जान बचाई?’’इससे पहले केजरीवाल सरकार ने जनवरी, फरवरी और मार्च की तिमाही में विज्ञापन पर 150 करोड़ रु. खर्च किए थे।

आरटीआई से मिली एक अन्य जानकारी के अनुसार केजरीवाल सरकार ने फरवरी, 2015 में अपना कार्यकाल शुरू करने के बाद उस साल विज्ञापन पर 59.9 करोड़ रु., 2016 में 66.3 करोड़ रु. और 31 दिसंबर, 2017 तक 85.3 करोड़ रु. खर्च किए। अप्रैल, 2015 से दिसंबर, 2017 तक किया गया औसत खर्च 70.5 करोड़ रु. है।

स्वाभाविक है, इस पर कोई भी सवाल उठाएगा। गत 8 जुलाई को नगर निगम के कर्मचारियों के बकाया वेतन के मामले की सुनवाई करते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिल्ली सरकार से पूछा था कि ईमानदारी से बताएं कि आप विज्ञापन पर कितना खर्च करते हैं! यानी कहीं न कहीं अदालत को भी लगता है कि केजरीवाल सरकार विज्ञापन पर बहुत खर्च कर रही है!

डीटीसी का बेड़ा गर्क
अब बात दिल्ली परिवहन निगम (डीटीसी) की। डीटीसी 2015 से सालाना 1,000 करोड़ रु. से अधिक का घाटा उठा रहा है। इस कारण इस संस्थान ने 2015 के बाद से एक भी बस नहीं खरीदी है। जानकारी के अनुसार डीटीसी को 2014-15 में 1,019.36 करोड़ रु., 2015-16 में 1,250.15 करोड़,  2016-17 में 1,381.78 करोड़,  2017-18 में 1,730.02 करोड़ और 2018-19 में 1,664.56 करोड़ तथा 2019-20 में 1,834.67 करोड़ रु. का घाटा हुआ।

यही कारण है कि पिछले छह साल में डीटीसी के बेड़े में एक भी नई बस शामिल नहीं हुई। उसकी अधिकतर बसें अब बूढ़ी हो चुकी हैं। पिछले दिनों आई एक रपट के अनुसार डीटीसी की लगभग 4,000 बसों में से 3,760 बसों को उम्रदराज घोषित किया गया है। यानी इन बसों की आयु ऐसी नहीं रही कि उन्हें चलाया जा सके। सीधे शब्दों में कहें तो ये बसें बूढ़ी हो चुकी हैं। डीटीसी के 50 साल के इतिहास में पहली बार इतनी बसें बूढ़ी हुर्इं पर उनकी जगह नई बसें नहीं खरीदी गई। रपट के अनुसार 99 प्रतिशत लो फ्लोर सीएनजी बसें अपनी तकनीकी परिचालन सीमा को पार कर चुकी हैं। बता दें कि उन बसों को तकनीकी परिचालन की सीमा से बाहर किया जाता है जिनकी उम्र आठ साल पार कर जाती है।  

जवाहरलाल नेहरू नेशनल अर्बन रिन्युअल मिशन के करार के अनुसार लो फ्लोर सीएनजी बसें अधिकतम 12 वर्ष तक अथवा 75,0000 किमी तक परिचालन में रह सकती हैं। इसी रपट के अनुसार डीटीसी की मात्र 32 बसें 8-10 वर्ष पुरानी हैं, 3,072 बसें 10-12 वर्ष पुरानी और 656 बसें ऐसी 12 साल की उम्र को पार कर चुकी हैं। दिल्ली भाजपा के प्रवक्ता नवीन कुमार कहते हैं, ‘‘जब दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार बनी थी उस समय डीटीसी के पास 5,760 बसें थीं, लेकिन अब लगभग 4,000 ही रह गई हैं। इनमें से भी 700-800 बसें अमूमन खराब ही रहती हैं।’’ उन्होंने आगे कहा, ‘‘जब अरविंद केजरीवाल नए-नए मुख्यमंत्री बने थे तब उन्होंने कहा था कि डीटीसी के बेड़े में 15,000 बसें शामिल की जाएंगी, लेकिन ठीक उसका उल्टा हो रहा है। केजरीवाल सरकार ने डीटीसी का बेड़ा गर्क कर दिया।’’ इस पर आम आदमी पार्टी का पक्ष जानने के लिए उसके प्रवक्ता और विधायक संजीव झा से कई बार बात करने की कोशिश की गई, लेकिन उनके सहायक ने सदैव यही कहा कि ‘वे बैठक में हैं, बाद में बात हो पाएगी’ लेकिन पूरे दिन वह मौका नहीं आया।     

 

 

जन्मे विश्वविद्यालय पर करोड़ों रु. खर्च

इन दिनों आप दिल्ली के किसी भी कोने में चले जाएं, आपको हर जगह दिल्ली सरकार का एक विज्ञापन अवश्य दिख जाएगा। इस विज्ञापन के नीचे दार्इं तरफ दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का एक बड़ा चित्र है। सबसे ऊपर उन कुछ खिलाड़ियों के चित्र हैं, जो इन दिनों टोक्यो ओलंपिक में भाग लेने गए हैं। खिलाड़ियों के चित्र के नीचे लिखा है, ‘दिल्ली बोले जीत के आना।’ इस पंक्ति के नीचे लिखा है, ‘दिल्ली स्पोर्टस यूनिवर्सिटी, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, दिल्ली सरकार।’ मजेदार बात यह है कि यह विश्वविद्यालय अभी केवल कागजों पर है। धरातल पर यह विश्वविद्यालय अभी है ही नहीं। इसलिए इससे निकला कोई खिलाड़ी ओलंपिक में भाग लेने गया हो, ऐसी भी बात नहीं है। इसके बावजूद इस विश्वविद्यालय के नाम पर पूरी दिल्ली में करोड़ों रुपए के विज्ञापन बोर्ड लगाए गए हैं। और उन पर खिलाड़ियों के नाम इस तरह लिखे हैं, मानो वे इसी विश्वविद्यालय से प्रशिक्षण लेकर ओलंपिक में खेलने गए हों।

सवाल उठता है कि जो विश्वविद्यालय अभी केवल कागज पर है, उसके नाम पर करोड़ों रु. के विज्ञापन क्यों दिए जा रहे हैं! इस पर सामाजिक कार्यकर्ता अमर सिंह कहते हैं, ‘‘अरविंद केजरीवाल किसी न किसी बहाने अपना चेहरा जनता को दिखाते रहना चाहते हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो वे उस विश्वविद्यालय के नाम पर विज्ञापन नहीं देते, जिसका अभी जन्म ही नहीं हुआ है।’’

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अरुण कुमार सिंह
अरुण कुमार सिंह
समाचार संपादक, पाञ्चजन्य | अरुण कुमार सिंह लगभग 25 वर्ष से पत्रकारिता में हैं। वर्तमान में साप्ताहिक पाञ्चजन्य के समाचार संपादक हैं। [Read more]
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