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नेपाल की नई सरकार चाहती है भारत के साथ अच्छे संबंध, सीमा विवाद जैसे मसलों को सुलझाने के लिए बनाई समिति

Written byPanchjanyaPanchjanya
Aug 9, 2021, 12:32 pm IST
inविश्व, दिल्ली

दिनेश मानसेरा


नेपाल में बेशक सत्ता परिवर्तन हो गया हो, लेकिन भारत-नेपाल सीमा विवाद अपनी जगह है। हालांकि नई देउबा सरकार ने उत्तराखंड के लिपियाधुरा इलाके के विवाद को सुलझाने के लिए एक समिति बना कर लचीला रुख अपनाया है।


नेपाल में बेशक सत्ता परिवर्तन हो गया हो, लेकिन भारत-नेपाल सीमा विवाद अपनी जगह है। हालांकि नई देवपा सरकार ने उत्तराखंड के लिपियाधुरा इलाके के विवाद को सुलझाने के लिए एक समिति बना कर लचीला रुख अपनाया है। नेपाल की पिछली ओली सरकार ने चीन की शह पर तिब्बत से लगे इस इलाके को अपना बना कर नया नक्शा जारी कर दिया था, जिस पर भारत ने कड़ा एतराज जाहिर किया था।

भारत और नेपाल के बीच पिछले दो सालों में नेपाल की चीन समर्थक केपी शर्मा ओली सरकार की वजह से रिश्तों में खटास देखी जा रही थी। नेपाल में निवर्तमान प्रधानमंत्री ओली को चीन के साथ अपनी नजदीकी बढ़ाने का नेपाल के राजनीतिक दलों से विरोध सह कर सत्ता से हाथ धोना पड़ा। नेपाल में अब भी मिलीजुली सरकार है, जिसकी बागडोर शेर बहादुर देउबा के पास है। देवपा हमेशा से ही भारत के साथ बेहतर सबंधों के पक्ष में रहे हैं।

सरकार के गठन के साथ ही प्रधानमंत्री देउबा ने अपने सहयोगी दलों के साथ बैठक करके भारत के साथ सभी समझौतों की समीक्षा करने और सीमा विवाद जैसे मसलों को एक समिति बना कर सुलझाने की पहल की है। देवपा चाहते हैं कि सभी दल मिलकर एक राय बनाएं। इसके लिए उन्होंने नेपाली कांग्रेस के पूर्ण खड़का, नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी केंद्र) के पुष्प कमल दहल प्रचंड, जनता समाजवादी के उपेंद्र यादव, नेताओं की एक समिति का गठन कर दिया है।नेपाल के प्रमुख नेता प्रचंड पहले से कहते आ रहे हैं कि भारत ही नहीं सभी पड़ोसियों के साथ नेपाल की हुई संधियों की समीक्षा होनी चाहिए, क्योंकि ये संधिया राजघराने ने की थी। अब नेपाल में लोकतंत्र है, लिहाजा नए भविष्य की संधियां होनी चाहिए।

माओवाद का आंदोलन चला चुके प्रचंड इस समय नेपाल की सत्ता की धुरी बने हुए है।
ओली सरकार के बाद बदले हालत में प्रचंड की नेपाल में भूमिका को भी नकारा नहीं जा सकता। बहरहाल, ये कूटनीति दृष्टि से ये बात समझने की है कि नेपाल में सरकार बदल जरूर गयी है, लेकिन उसकी नीतियों में बदलाव नहीं आया है। क्योंकि नेपाल में एक बड़ा वर्ग चीन के संरक्षण में भारत विरोधी राजनीतिक माहौल बनाए रखता है, जिसका एक बड़ा वोट बैंक है। भारत समर्थक नेपाली पार्टियां चाहती हैं कि भारत—नेपाल के सम्बंध जल्द से जल्द सामान्य हों, भारत ने नेपाल को कोविड वैक्सीन , दवाएं आदि भेज कर सकारात्मक भूमिका निभाई है।

भारत नेपाल में जल विद्युत योजनाएं बनाना चाहता है। सड़क, रेलवे योजनाएं चाहता है। इन्ही सब पर चीन की नजर है। भारत के लिए चिंता वाली बात यह है कि नेपाल—भारत खुली सीमा पर नेपाल और चीन के साझा प्रोजेक्ट्स भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा बनते जा रहे हैं।जिस पर भविष्य में रोक लगानी जरूरी है। भारत को नेपाल से लगी खुली सीमा को तारबाड़ से सुरक्षित करने की जरूरत है और खुले आवागमन के लिए स्थल निर्धारित करने की जरूरत है। हाल ही में उत्तराखंड से लगी सीमा पर तार पर लटक कर काली शारदा नदी को पार कर रहे एक नेपाली युवक की बह जाने से मौत हो गयी थी, जिसके बाद नेपाल के चीन समर्थक दलों ने सीमा पर आंदोलन करके भारत की सुरक्षा एजेंसी को इसका जिम्मेदार ठहरा दिया। इसलिए भारत को सुरक्षा, राजनीतिक और कूटनीति की दृष्टि से हर कदम उठाने की जरूरत है, ताकि दोनों देशों के रिश्तों में चीन खट्टास पैदा न करने पाए।

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