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अपनों ने छोड़ा, स्वयंसेवकों ने अपनाया

Written byPanchjanyaPanchjanya
May 19, 2021, 03:37 pm IST
in भारत, बिहार

बिहार में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक निरंतर पीपीई किट पहनकर कोरोना पीड़ितों की सेवा कर रहे हैं। सैकड़ों स्वयंसेवक उन मृत लोगों के शवों का अंतिम संस्कार भी करा रहे हैं, जिन्हें उनके अपने भी हाथ लगाने से डरते हैं। कुछ स्वयंसेवक तो अपना काम छोड़कर दिन—रात महामारी को हराने के लिए तन,मन,धन से लोगों की मदद कर रहे हैं।

विजय कुमार सिंह सिंघेश्वर के पूर्व विधायक थे। आज भी इनके परिवार में 350 बीघा जमीन है। भरा-पूरा परिवार है, लेकिन गत दिनों जब पूर्णिया के मैक्स अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली तो उनके शरीर को हाथ लगाने से भी लोग कतरा रहे थे। एंबुलेंस से जब शरीर गांव आया तो परिजन कंधा देने से भी गुरेज कर रहे थे। ऐसे समय में सामने आए संघ के स्वयंसेवक। कुमारखंड के खंड कार्यवाह सुनील सिंह, खंड शारीरिक प्रमुख रजनीश, प्रियराज एवं राम बाबा ने इनकी अंत्येष्टि की।

विजय कुमार सिंह जैसे सैकड़ों लोग हैं, जिनके अंतिम संस्कार में बेटा-बेटी, पत्नी जैसे सबसे नजदीकी रिश्तेदार भी शामिल होने से डरते हैं। ऐसी विकट परिस्थिति में स्वयंसेवक सेवादूत बनकर उनके साथ खड़े दिख रहे हैं। वे अपने जिंदगी की परवाह किए बिना उन लोगों की अर्थी को कंधा दे रहे हैं, जिन्हें अपनों ने भी छोड़ दिया है। यह दृश्य पूरे बिहार में देखने को मिल रहा है।

मधेपुरा के आलमनगर में ही ऐसे कई दृश्य देखने को मिले। कुमारखंड प्रखंड के भतनी में पूर्व शिक्षक रामचन्द्र यादव का कोरोना से निधन हो गया था। उनके पार्थिव शरीर को स्वजन स्पर्श नहीं कर रहे थे। इसकी सूचना स्थानीय लोगों ने संघ की भतनी शाखा को दी। इसके बाद स्वयंसेवकों ने उनका अंतिम संस्कार किया।
बिहारीगंज के लगभग 30 वर्षीय मनोज भगत भी कोरोना की भेंट चढ़ गए। उनके साथ भी ऐसा ही हुआ। उनके शव को समाज व परिवार के लोग छूने से कतरा रहे थे। उनका भी अंतिम संस्कार स्वयंसेवकों ने किया। कुमारखंड के शारीरिक प्रमुख रजनीश कुमार मोबाइल की दुकान चलाते हैं, लेकिन जब से कोरोना का संक्रमण बढ़ा है तब से वे सेवा भारती की एंबुलेंस के चालक हो गए हैं। जिले में दर्जनों शवों का अंतिम संस्कार जैनेन्द्र कुमार और उनके साथ स्वयंसेवकों ने की। इस कार्य के लिए प्रत्येक प्रखंड में प्रभारी नियुक्त किए गए हैं। एक नंबर भी जारी किया गया है, ताकि कोई भी व्यक्ति संपर्क करके अपने परिजन के अंतिम संस्कार की व्यवस्था करवा सके। 16 मई को ही सेवानिवृत्त शिक्षक 75 वर्षीय नकछेदी सिंह का अंतिम संस्कार भी इस दल ने किया।

मधुबनी में भी यह दृश्य देखने को मिल रहा है। गत 11 मई को एक ऐसी घटना सामने आयी जिसने मानवता को शर्मसार कर दिया। एक लाचार महिला की मृत्यु के बाद उसके परिजन लाश को लावारिश छोड़कर भाग गए। यह महिला रहिका प्रखंड के बलिया गांव की रहने वाली थी। 10 दिन से वह कोरोना से पीड़ित थी। महिला का एकमात्र पुत्र नोएडा में निजी कंपनी में कार्यरत है। महिला की मृत्यु के बाद उनके अंतिम संस्कार की समस्या सामने आयी। पूरे गांव में किसी ने उनके शव के संस्कार में दिलचस्पी नहीं दिखायी। अंततः इनके पड़ोसी लड्डू चैधरी ने संघ के स्वयंसेवकों को सारी परेशानी से अवगत कराया। इसके बाद संघ के मधुबनी सह जिला कार्यवाह चंद्रवीर कुमार और स्वयंसेवक सचिन मिश्रा सक्रिय हुए। इन लोगों ने पहले महिला के पुत्र को इसकी सूचना दी। पुत्र ने आग्रह किया कि मेरे आने के बाद ही अंतिम संस्कार करें, तब तक सारी व्यवस्था कर लें। स्वयंसेवकों ने ऐसा ही किया। करीब 24 घंटे बाद उनके पुत्र के आने के बाद स्वयंसेवकों ने पीपीई किट पहन कर उस महिला का अंतिम संस्कार किया।

दरभंगा के भीगो मुक्तिधाम पर भी ऐसे दृश्य लगातार देखने को मिल रहे हैं। यहां स्वयंसेवकों ने मुक्तिधाम जीर्णोंद्धार समिति बनाई है। दो स्वयंसेवक धरम जी और जायसवाल जी के नेतृत्व में यह समिति लावारिश लाशों का अंतिम संस्कार करवाती है। यहां अंतिम-संस्कार में गोबर के उपले का भी प्रयोग किया जाता है। घाट के डोम राजा, जिसे स्थानीय भाषा में मल्लिक जी कहते हैं, प्रतीकात्मक रूप से 250 रूपये लेते हैं। समिति ने अब तक दर्जनों लावारिश लाशों का अंतिम संस्कार कराया है।
इस तरह के कार्य बिहार के हर जिले में स्वयंसेवक कर रहे हैं।
– संजीव कुमार

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