जाहि विधि ‘रहे’ राम, ताहि बिधि रहिए
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जाहि विधि ‘रहे’ राम, ताहि बिधि रहिए

Written byArchiveArchive
Jan 1, 2018, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 01 Jan 2018 11:11:10

जैथलिया जी ने यह लेख कार्यकर्ताओं को प्रेरित करने के लिए लिखा था। इसकी गूंज आज भी सुन सकते हैं

 

जुगलकिशोर जैथलिया

आप संभवत: यह शीर्षक पढ़कर चौंक गए होंगे, क्योंकि हमारे समाज में तो यही उक्ति प्रचलित है, ‘जाहि विधि राखे राम, ताहि बिधि रहिए’। इस पंक्ति ने हो सकता है प्रयत्नों से हारे किसी व्यक्ति या समाज को जीने का सहारा दिया हो, पर यह हमारे तेजोभंग का भी कम कारण नहीं बनी है। इसमें परिस्थितियों से थककर, मन को समझाकर संघर्ष से विरत होने का सहारा तो ढूंढा जा सकता है, पर परिस्थितियों को चुनौती देकर योग्य परिवर्तन होने तक सतत् संघर्ष में रत रहने का आह्वान कहां है? प्रभु श्रीराम के जीवन का संदेश तो थककर बैठने या आत्ममुग्ध होकर संतोष कर लेने का नहीं रहा है, वह तो दुष्टों का विनाश कर सज्जन शक्ति एवं शाश्वत सनातन धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा होने तक संघर्षरत रहने का रहा है। अत: मेरा अन्तर्मन बार-बार यह सोचता है कि आज मानवीय जीवन मूल्यों में एवं धर्माचरण में प्रतिदिन आती हुई गिरावट से देश एवं समाज को उबारने हेतु देशवासियों को पुन: श्रीराम के चरित्र को अपने जीवन में उतारने का आह्वान देना पड़ेगा और वह आह्वान होगा- ‘जाहि विधि रहे राम, ताहि विधि रहिए।’
इसका अर्थ यह है कि राम जैसे रहे, वैसे जीवन-यापन करने का संकल्प जाग्रत करना होगा। यानी सोद्देश्य जीवन, मर्यादापूर्ण जीवन, मूल्याधिष्ठित जीवन एवं उसके लिए आजीवन कष्ट सहते रहने का सहज अभ्यास। तभी इस देश में पुन: राम राज्य लाने का स्वप्न साकार हो सकेगा। जब कैकेयी ने राम को राजतिलक की जगह वनवास देने का वरदान दशरथ से मांग लिया तो राम कैकेयी से कहते हैं, ‘नाहमर्थपरो देवि-लोकामावस्तुमुत्सहे’ यानी हे माता! मैं अर्थ का नहीं, लोक का आराधक हूं। तुलसीदास जी कहते हैं कि राम ने वन में राक्षसों द्वारा ऋषियों को दिए जाने वाले कष्टों को देखकर वन के सामान्य सुखों को भी त्याग दिया एवं हाथ उठाकर ‘निसिचर हीन करउं महि़.़’ का दृढ़ संकल्प लिया। उस संकल्प की पूर्ति के लिए ही वे स्थान-स्थान पर राक्षसों का सफाया कर मुनियों को अभयदान देते रहे एवं इसी की चरम परिणति कुलसहित रावण की मृत्यु में हुई। कुछ लोग अज्ञानवश कह देते हैं कि सीता का हरण हुआ अत: राम ने रावण को मारा। वस्तुत: ऐसा नहीं है, सीताहरण न भी हुआ होता तो भी इस भूभाग को निशाचरहीन करने हेतु अंतत: रावण से निर्णायक युद्ध अनिवार्य था क्योंकि उसी ने सारे देश में असुरों का मकड़जाल बिछा रखा था।
वैसे सीता उद्धार भी राम के लिए केवल अपनी पत्नी का उद्धार नहीं था, यह तो आसुरी शक्ति से प्रपीड़ित स्त्री जाति का उद्धार था, क्योंकि लंका में रावण सहित सभी राक्षसों ने पूरी पृथ्वी भर से सुंदर स्त्रियों को जोर-जबरदस्ती पकड़ कर अपनी भोग्या बनाने की परंपरा ही स्थापित कर रखी थी। राक्षसी राज्य के अंत से ही इस पर विराम लगा। राम चाहते तो वानरराज सुग्रीव या विभीषण की सहायता के बिना भी रावण का संहार कर सकते थे। खर-दूषण को अकेले ही सेना सहित मारकर उन्होंने यह कर दिखाया था। खर-दूषण के बारे में तो स्वयं रावण ने कहा है, ‘खर दूषण मोहि सम बलवंता, तिनहिं को मारइ बिनु भगवंता’। (अरण्य कांड-22/2) परंतु राम इसे व्यक्तिगत नहीं, सामूहिक रूप देना चाहते थे। अत: वानरराज सुग्रीव, हनुमान, अंगद, जामवंत एवं विभीषण सभी को इसकी बड़ाई दी। कुछ लोग तुलसीदास पर ब्राह्मणों के साथ पक्षपाती होने का आरोप मढ़ते हैं, यदि ऐसा होता तो तुलसी राम का चरित्र ही नहीं उठाते। रावण ब्राह्मण तो था ही, पंडित था, ऋषि था एवं भक्त भी था। परशुराम का भी ऐसा ही उदाहरण है। दोनों का गर्व-भंग राम (जो क्षत्रिय थे) ने किया। पथभ्रष्ट ब्रह्मतेज पर क्षात्रतेज का प्राबल्य प्रकट हुआ। इसका एक विपरीत उदाहरण भी है वशिष्ठ एवं विश्वामित्र के बीच संघर्ष का। इसमें क्षात्र तेज पर ब्रह्मतेज की विजय हुई। सारांश यह है कि जो शक्ति लोक कल्याण में सार्थक होती है, वही शाश्वत और सफल होती है। सूत्र है तेज का सात्विक प्रयोग। इसे भली प्रकार समझने की आवश्यकता है। वैसी ही बात नारियों के प्रति प्रभु के दृष्टिकोण की है। राम ने परित्यक्ता अहिल्या का उद्धार किया, शबरी की कुटिया पर जाकर उसका मान बढ़ाया पर ताड़का का वध करने में तनिक भी संकोच नहीं किया। सूर्पणखा, जो कामातुर होकर कभी लक्ष्मण को तो कभी राम को अपना पति बनाना चाहती थी, को नाक-कान विहीन करने से लक्ष्मण को रोका नहीं। यहां भी बात लोककल्याण की ही है।
कुछ लोग राम को ईश्वर नहीं, मानव ही मानना चाहते हैं। ऐसे लोगों के सामने भी यह तो स्पष्ट ही है कि राम के मानवीय गुण देवत्व की दिव्यता से भी आगे बढ़ जाते हैं। राम के अलौकिक गुणों पर थोड़ा दृष्टिपात करें तो यह सहज ही समझ में आएगा कि वे लोकोत्तर पुत्र, लोकोत्तर बंधु, लोकोत्तर शिष्य, लोकोत्तर पति एवं लोकोत्तर राजा तो थे ही पर शत्रु के रूप में भी वे लोकोत्तर थे। मृत्यु के उपरांत रावण एवं उसके परिवार के लोगों के साथ जो व्यवहार राम ने किया, वह अकल्पनीय है। इसी कारण आदि कवि बाल्मीकि से प्रारंभ हुआ उनका चरित्र गुण-गान आज भी सबके लिए उतना ही प्रेरक बना हुआ है। इसमें न देश की सीमा है, न समय की और न भाषा की। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने ठीक ही कहा है –
राम तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है।
कोई कवि बन जाए सहज संभाव्य है॥
परंतु युग के संकटों से चुनौती लेने के लिए केवल स्तुतिगान पर्याप्त नहीं है। राम के नाम का महत्व निश्चय ही है, पर राम का काज उससे भी बढ़कर है। हम राम के कार्य को समझें, समय की तुला पर उसे तोलें एवं हनुमान जी की तरह यह संकल्प धारण करें एवं अन्य मित्रों से कराएं- ‘राम काजु कीन्हें बिनु, मोहि कहाँ बिश्राम।’ तुलसी ने राम का सहारा लेकर समाज को जगाया, हम भी आज की चुनौतियों का उनके दिव्य गुणों को अपनाकर, उनके जैसे कष्ट सहने की शक्ति धारण कर आगे बढ़ें तो कोई कठिनाई नहीं होगी। सामान्यत: हम सभी अपने सुख-साधन हेतु राम की अर्चना करते हैं, लोककल्याण हेतु नहीं। ऐसे स्वार्थी लोगों को उलाहना देते हुए महाकवि गुलाब खंडेलवाल ने लिखा है,
जिनका नाम लिए दुख भागे
मिला उन्हें तो जीवन भर दुख ही दुख आगे-आगे।
छूटा अवध साथ प्रियजन का, शोक अथह था पिता मरण का,
देख कष्ट मुनियों के मन का, वन के सुख भी त्यागे।
गूंजी ध्वनि जब कीर्तिगान की, फिर चिर दुख दे गई जानकी
मांग उन्हीं सी शक्ति प्राण की, मन तू सुख क्या मांगे?
मिला उन्हें तो जीवन भर दुख ही दुख आगे-आगे।
अर्थात् लोकहित साधक को प्रभु राम जैसे कष्ट सहने की शक्ति की प्रार्थना करनी चाहिए, सुख की प्रार्थना नहीं। हमारे धर्माचार्य, धर्मोपदेशक समाजसेवी सभी को चाहिए कि पहले स्वयं राम के गुणों को अपने जीवन में उतारें एवं तब लोगों में उनका बीजारोपण करें। आज के स्वार्थ केंद्रित, अर्थ केंद्रित, भोगवादी एवं व्यक्तिवादी जीवन से उत्पन्न संघर्ष से मुक्ति पाने का दूसरा कोई सहज विकल्प नहीं है। राम-रसायन ही समाज एवं राष्ट्र के शरीर में पुन: अपेक्षित चैतन्य भर सकता है। अत: हम केवल ‘सहने’ नहीं, राम की तरह ‘रहने’ का संकल्प लेेंं।   

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