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सोशल मीडिया-प्रतीकों में संरक्षित भारत का प्राचीन ज्ञान

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Nov 13, 2017, 12:00 am IST
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दिंनाक: 13 Nov 2017 12:20:20

15 सौ वर्ष पुराने सोमनाथ मंदिर के प्रांगण में एक स्तंभ है-‘बाणस्तंभ’। यह स्तंभ कब से वहां है, बताना कठिन है। इतिहास में करीब छठी शताब्दी से इस स्तंभ का जिक्र मिलता है, पर इसका अर्थ यह नहीं कि इसका निर्माण छठी सदी में हुआ। माना जाता है कि बाणस्तंभ का निर्माण इससे सैकड़ों वर्ष पहले हुआ। दरअसल, यह एक दिशादर्शक स्तंभ है जिस पर समुद्र की ओर इंगित करता एक बाण है। इस पर लिखा है-‘‘आसमुद्रांत दक्षिण ध्रुव पर्यंत अबाधित ज्योतिर्मार्ग।’’ इसका अर्थ है- ‘‘इस बिंदु से दक्षिण ध्रुव तक सीधी रेखा में कोई अवरोध या बाधा नहीं है।’’ मैंने पहली बार इस स्तंभ के बारे में पढ़ा तो सिर चकरा गया। यह ज्ञान इतने वर्षों पहले हम भारतीयों को था! कैसे संभव है? यदि यह सच है तो हम कितने समृद्धशाली ज्ञान की वैश्विक धरोहर संजोये हैं। संस्कृत में लिखी इस पंक्ति के अर्थ में अनेक गूढ़ अर्थ समाहित हैं। इसका सरल अर्थ यह है, ‘‘सोमनाथ मंदिर के इस बिंदु से लेकर दक्षिण ध्रुव तक (अंटार्कटिका तक) सीधी रेखा खींची जाए, तो बीच में एक भी भूखंड नहीं आता है।’’

1500 साल पुराने सोमनाथ मंदिर के प्रांगण में स्थित बाणस्तंभ के बारे में माना जाता है कि इसका निर्माण छठी सदी से सैकड़ों वर्ष पूर्व हुआ। इस दिशादर्शक स्तंभ पर जो जानकारी दी गई है उससे पता चलता है कि भारतीयों को पृथ्वी के दोनों छोर के बारे में पूरी जानकारी थी

क्या यह सच है? आज के वैज्ञानिक युग में यह ढ़ूंढ़ना तो संभव है, लेकिन उतना आसान नहीं। गूगल मैप में ढूंढने के बाद भूखंड (10 किमी से बड़ा भूखंड) नहीं दिखता। अर्थात् हम पूर्णरूप से मान कर चलें कि उस संस्कृत श्लोक में सत्यता है! फिर भी मूल प्रश्न वही है कि अगर 600 ई. में बाणस्तंभ का निर्माण हुआ तो भी उस जमाने में पृथ्वी का दक्षिणी ध्रुव है, यह ज्ञान हमारे पास कहां से आया? मान लिया कि दक्षिण ध्रुव ज्ञात भी था तो सोमनाथ मंदिर से दक्षिण ध्रुव तक सीधी रेखा में एक भी भूखंड नहीं आता, यह ‘मैपिंग’ किसने की? कैसे की? सब कुछ अद्भुत! इसका अर्थ है कि बाणस्तंभ के निर्माण काल में भारतीयों को इसका ज्ञान था कि पृथ्वी गोल है। यह भी मालूम था कि पृथ्वी का उत्तर-दक्षिण ध्रुव भी है। यह कैसे संभव हुआ? पृथ्वी का विहंगम दृश्य लेने का कौन-सा साधन उपलब्ध था? अथवा पृथ्वी का विकसित नक्शा बना था? नक्शा बनाने का एक शास्त्र होता है, जिसे अंगे्रजी में ‘कार्टोग्राफी’ कहते हैं। यह मूलत: फ्रेंच शब्द है। ईसा पूर्व 6,000 से 8,000 वर्ष पूर्व की गुफाओं में ग्रह-तारों के नक्शे मिले थे। परन्तु पृथ्वी का पहला नक्शा किसने बनाया, इस पर एकमत नहीं है। भारतीय ज्ञान का कोई सबूत न मिलने के कारण यह सम्मान एनेक्सिमेंडर नामक ग्रीक वैज्ञानिक को दिया जाता है। इनका कालखंड ईसा पूर्व 611 से 546 वर्ष था, किन्तु इनका बनाया नक्शा अत्यंत प्राथमिक अवस्था में था। उस समय जहां-जहां मनुष्यों की बसावट का ज्ञान था, उसी हिस्से को नक्शे में दिखाया गया है। इसलिए उसमें उत्तर और दक्षिण ध्रुव दिखने का कोई कारण नहीं था। दुनिया का आधुनिक नक्शा 1490 में हेनरिक्स मार्टेलस ने तैयार किया था। माना जाता है कि कोलंबस और वास्को डिगामा ने इसी नक्शे के आधार पर समुद्री सफर तय किया था।  
‘पृथ्वी गोल है’ इस प्रकार का विचार यूरोप के कुछ वैज्ञानिकों ने व्यक्त किया था! ईसा पूर्व 600 में एनेक्सिमेंडर ने पृथ्वी को सिलेंडर के रूप में माना था! ई.पू. 384 से 322 में अरस्तू ने पृथ्वी को गोल माना था। लेकिन भारत में यह ज्ञान बहुत प्राचीन समय से था, जिसके प्रमाण भी मिलते है। इसी के आधार पर आर्यभट्ट ने लगभग 500 ई. में दृढ़तापूर्वक बताया कि गोल पृथ्वी का व्यास 4967 योजन अर्थात् नए मापदंडों के अनुसार 39,668 किलोमीटर है। अत्याधुनिक तकनीक की सहायता से पृथ्वी का व्यास 40,068 किलोमीटर माना गया है। इसका अर्थ यह हुआ कि आर्यभट्ट के आकलन में मात्र 0.26% का अंतर है जिसे नजरअंदाज किया जा सकता है। करीब 1500 वर्ष पहले आर्यभट्ट के पास यह ज्ञान कहां से आया? 2008 में जर्मनी के विख्यात इतिहासविद् जोसेफ श्वार्ट्सबर्ग ने साबित किया कि ई.पू. दो-ढाई हजार वर्ष में भारत में नक्शाशास्त्र अत्यंत विकसित था। उस समय नगर रचना के नक्शे के साथ नौकायन के लिए आवश्यक नक्शे भी उपलब्ध थे। भारत में नौकायन शास्त्र प्राचीन काल से विकसित था। संपूर्ण दक्षिण एशिया में जिस प्रकार से हिन्दू संस्कृति के चिह्न पग-पग पर दिखते हैं, उससे ज्ञात होता है कि भारत के जहाज पूर्व दिशा में जावा, सुमात्रा, यवनद्वीप को पार कर जापान तक जाते थे। 1955 में गुजरात के ‘लोथल’ में 2,500 वर्ष पूर्व के अवशेष मिले हैं। इसमें भारत के प्रगत नौकायन के अनेक प्रमाण मिलते हैं। सोमनाथ मंदिर के निर्माण काल में दक्षिण धु्रव तक दिशादर्शन उस समय के भारतीयों को था, यह निश्चित है।
महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि दक्षिण ध्रुव तक सीधी रेखा        में समुद्र में कोई अवरोध नहीं है, ऐसा बाद में खोज निकाला   या दक्षिण ध्रुव से भारत के पश्चिम तट पर बिना अवरोध        के सीधी रेखा जहां मिलती है, वहां पहला ज्योतिर्लिंग      स्थापित किया?        (संजय द्विवेदी की फेसबुक वॉल से)

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