पं गोपालकृष्ण पुराणिक की पुण्य तिथि पर विशेषग्रामोत्थान को समर्पित क्रांतिकारी
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पं गोपालकृष्ण पुराणिक की पुण्य तिथि पर विशेषग्रामोत्थान को समर्पित क्रांतिकारी

Written byArchiveArchive
Aug 21, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 21 Aug 2017 10:56:11

ग्राम सुधार व विकास से जुड़े अनेक कार्योें को पं.गोपालकृष्ण ने न केवल जमीन पर उतारा बल्कि पोहरी में स्थापित विद्यालय के जरिए सैकड़ों क्रांतिकारी तैयार किए जिनके मन में राष्ट्रप्रेम के सिवाय कुछ न था

प्रमोद भार्गव
मैं जब पोहरी के आदर्श विद्यालय में कक्षा पांच से नौ तक पढ़ा, तब पत्रकारिता के बारे में जरा नहीं जानता था। वह विद्यालय महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और ग्रामीण पत्रकारिता के प्रमुख जनकों में एक पं. गोपालकृष्ण पुराणिक द्वारा स्थापित विद्यालय था। यह कालखंड 1964 से 1969 के बीच का रहा है। पुराणिक जी का यह आदर्श उच्चतर माध्यामिक विद्यालय उन दिनों ग्वालियर संभाग में श्रेष्ठ विद्यालयों में से एक था। तब यहां आर्थिक स्वावलंबन के कार्य व गुर भी सिखाए जाते थे। यह आवासीय विद्यालय है। स्वतंत्रता के पूर्व जब ग्वालियर  में शिक्षण संस्थानों की कमी थी और नई पाठशालाओं के खोले जाने पर इसलिए प्रतिबंध लगा हुआ था कि लोग जागरूक हो जाएंगे, तब पुराणिक जी ने महात्मा गांधी के संदेश ‘भारत का उद्धार गांव में है’ से अभिप्रेरित होकर 12 जनवरी, 1921 को पहले अभावग्रस्त ग्राम भटनावर में आदर्श विद्यालय खोला। 1930-31 में इसे ही स्थनांतरित करके पोहरी लाया गया। बाद में उन्होंने यहीं एक महाविद्यालय की भी बुनियाद रखी। आदर्श विद्यालय शिक्षा का प्रमुख केंद्र होने के साथ उन दिनों क्रांतिकारियों की शरणगाह भी था। रोजगार आधारित शिक्षा के रूप में यहां कतली व चरखे से सूत कताई, खादी निर्माण, दियासलाई तथा कागज बनाना सिखाया जाता था। 1938 में ग्राम विकास को ध्यान में रखते हुए पुराणिक जी ने ‘रुरल इंडिया’ नाम से एक अंग्रेजी में मासिक पत्रिका निकालने का संकल्प लिया और इसका प्रकाशन मुंबई से कराया। वे स्वयं इसके मुद्रक, प्रकाशक व संपादक रहे। इस पत्रिका में उस समय राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े बड़े से बड़े नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं के  ग्रामीण विकास और आंदोलन में वैचारिक प्रवाह को गति देने वाले सचित्र आलेख प्रकाशित होते थे।
गोपालकृष्ण पुराणिक का जन्म 9 जुलाई, 1900 को मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले के पोहरी में हुआ था। इनके दादा पं. वासुदेव पुराणिक संस्कृत और ज्योतिष के बड़े विद्वान थे। इनके पिता नरहरि प्रसाद की मृत्यु तब हो गई थी जब गोपाल मात्र तीन वर्ष के थे। दादा वासुदेव ने पुत्र शोक से उबरने के साथ ही गोपाल को घर में ही संस्कृत की शिक्षा दी और ज्योतिष व पौरोहित कर्म में भी पारंगत किया। जब गोपाल सात वर्ष के थे, तब इनके दादा का भी निधन हो गया। माता का निधन पहले ही हो चुका था। अनाथ हो जाने के कारण उन्हें पढ़ाई का अवसर नहीं मिला। किंतु वे घर में रखे पुराणों व श्रीमद्भागवत का निरंतर अध्ययन करते रहे। वे सार्वजनिक रूप से कथा का वाचन भी करते थे, लेकिन दक्षिणा नहीं लेते थे। ऐसा करना वे ज्ञान का सौदा मानते थे। दादा की मृत्यु के बाद उन्होंने अकादमिक शिक्षा लेने की बहुत कोशिश की, लेकिन मार्ग नहीं सूझा। परिवार में दादा की मृत्यु के बाद कोई दूसरा संरक्षक नहीं रह गया था। इस विपरीत अवस्था में वह स्वयं को अनाथ अनुभव करने लग गए थे। कुछ सगे-संबंधियों ने उन पर मिथ्या आरोप लगाए। इन आरोपों से वे इतने दुखी व कुपित हुए कि उन्हें कथित संस्कारी पंडितों और संस्कृत भाषा चिढ़ हो गई थी। वे सोचने लगे कि संस्कृत पढ़ने से संस्कारी होने का दावा करने वाले जब ब्राह्मण ही संस्कारवान नहीं बन पाए तो वे इस भाषा का बोझ क्यों ढोएं?
किंतु समय बदला और उनकी मानसिकता बदल गई। कविवर रविंद्रनाथ ठाुकर को जब विद्या वाचस्पति (डॉक्टरेट) की उपाधि से विभूषित करने के लिए शांति निकेतन में अलंकरण समारोह हुआ तो पदवी देते समय लैटिन में भाषण पढ़ा गया। उसके बाद जब रविन्द्रनाथ ठाकुर का अवसर आया तो उन्होंने अपना उद्बोधन संस्कृत में दिया ही, पिछले वक्तव्य में जो प्रश्न खड़े किए गए थे, उनके त्युत्तर भी संस्कृत में दिए। इस आयोजन का समाचार जब पुराणिक जी ने रेडियो पर सुना व अखबारों में पढ़ा तो वे चकित रह गए। संस्कृत के महत्व और गौरव का उन्हें अनुभव हुआ कि ‘रविन्द्रनाथ चाहते तो अपना भाषण अंग्रेजी में अथवा बांग्ला भाषाओं में दे सकते थे, लेकिन उन्होंने स्वयं और देश का स्वाभिमान ऊंचा बनाए रखने के लिए संस्कृत में भाषण दिया। उनके मस्तिष्क में इस वक्तव्य की छाप ऐसी पड़ी कि जब कालांतर में इस नोबेल पुरस्कार विजेता का स्वर्गवास हुआ तो उनकी स्मृति में अपनी पत्रिका ‘रुरल इंडिया’ में उन्होंने संस्कृत में अनेक श्लोक लिखे। आदर्श विद्यालय में उन्होंने संस्कृत पढ़ाने के लिए उच्चकोटि के विद्वान रखे और नियमित संस्कृत में प्रवचन का सिलसिला शुरू किया।
विद्यालय में विद्यार्थियों को राष्ट्रभावी एवं राष्ट्रप्रेम जागृत करने की शिक्षा मुख्य रूप से दी जाती थी, जिससे राष्ट्र की सेवा के लिए सिपाही तैयार हो सकें। यहां से अध्ययन कर छात्र राष्ट्रसेवा का व्रत लेकर निकलने लगे। इनमें से कई क्रांतिकारी बने तो कइयों ने आंदोलनकारियों को अप्रत्यक्ष मदद की। इसकी जानकारी मिलते ही ग्वालियर राज्य के तात्कालिक शासक जीवाजीराव सिंधिया और अंग्रेजों के कान खड़े हो गए। ग्राम भटनावर के सरदार शितोले साहब की जागीर पोहरी के अंतर्गत आती थी। वे स्वयं प्रखर राष्ट्रभावी विचारों के प्रणेता थे। उन्होंने इस विद्यालय को ही नहीं गोपालकृष्ण द्वारा लड़ी जा रही आजादी की लड़ाई व प्रत्येक नवोन्मेषी प्रयोग को आर्थिक सहायता और सहयोग उपलब्ध कराया। इसलिए जब ग्वालियर रियासत की ओर से विद्यालय पर प्रतिबंध के प्रयत्न किए तो उनके प्रयास से वह टलता चला गया।
मुंतजिम जागीरदारान कोर्ट आॅफ वार्ड्स 1922-23 की रिपोर्ट में शितोले को हिदायत दी थी। इसके बाद ग्वालियर राज्य के ‘होम मेंबर’ की तरफ से 21 अप्रैल, 1923 के ग्वालियर राजपत्र में 1979 क्रमांक का एक पत्र जारी किया गया, जो इस प्रकार था-‘चंद रोज जागीर पोहरी में एक स्कूल ‘आदर्श विद्यालय’ कायम हुआ, जिसमें खिलाफत व स्वराज वगैरह की गतिविधियां होती हैं। इसलिए यह सकर््युलर जारी किया जाता है कि अगर ऐसी सूरतों का होना पाया जाए, जिसका जिक्र ऊपर किया गया है, तो जागीरदार साहब का फर्ज है कि वे फौरन उसकी रोक करें और दरबार को तार व चिट्ठी से इत्तला दें।’
 तत्कालीन गृह विभाग से इतने सख्त निर्देश मिलने के बावजूद आदर्श विद्यालय का वर्चस्व बना रहा तो इसलिए, क्योंकि पोहरी के जागीदार शितोले उनके पक्ष में थे। 1930 में जब देश में सत्याग्रह आंदोलन चला तो गोपालकृष्ण उसमें भागीदारी करने दिल्ली चले गए। सत्याग्रहियों के शिविर में पहुंचकर वे उसके सदस्य बने। फिर ब्रजकृष्ण चांदीवाला और कृष्णन नायर के सहयोगी बन गए। दिल्ली के पास स्थित नरेला में गोपालकृष्ण ने एक दिन भाषण दिया। नतीजतन उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। जेल भेजने पर उनकी मुलाकात प्रसिद्ध साहित्यकार जैनेंद्र कुमार जैन से हुई। वे सत्याग्रही के रूप में जेल में थे। मुकदमा चला तो जैनेंद्र जी ने तो अपनी पैरवी स्वयं की, लेकिन गोपालकृष्ण ऐसा मानते ही नहीं थे कि उन्होंने कुछ गलत किया है, इसलिए सफाई देने से इनकार कर दिया। हालांकि जैनेंद्र के साथ उदारमना मजिस्ट्रेट ने उन्हें भी मुक्त कर दिया।
ग्वालियर राज्य के कई शीर्षस्थ देशभक्तों ने अपरिहार्य परिस्थितियों के कारण राज्य छोड़ दिया। गणेश शंकर विद्यार्थी और बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ ने कानपुर में अपनी गतिविधियां जारी रखीं तो हरिभाऊ  उपाध्याय अजमेर चले गए। लेकिन गोपालकृष्ण अपनी जन्मभूमि पोहरी में रहकर ही अपने नवोन्मेषी कार्यों की स्थापना और उत्थान में लगे रहे। यहीं रहते हुए उन्होंने प्रादेशिक स्तर की संस्था ‘ग्वालियर राज्य प्रजा मंडल’ बनाई। इसमें हरकिशन दास भूता, बाबू तख्तमल जैन और हिरवे साहब प्रमुख सदस्य थे। संस्था के विधान को मंजूरी के लिए महाराजा सिंधिया के पास भेजा गया। किंतु स्वीकृति नहीं मिली।
पुराणिक जी समझ गए कि ग्वालियर राज्य में किसी राजनीतिक संस्था को स्वीकृति मिल जाए, इसकी उम्मीद व्यर्थ है। उन्होंने स्वीकृति की परवाह किए बिना ‘ग्वालियर राज्य सेवा संघ’ का गठन किया और उसके जरिए राष्ट्रीय चेतना की अलख जगाने के प्रयत्न शुरू कर दिए। इसी संघ की अगुआई में 1938 में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की पुण्यतिथी पर एक बड़ा महोत्सव  मनाया गया, जिसमें प्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वीर सावरकर को आमंत्रित किया गया। इस आयोजन की सफलता के बाद जीवाजीराव सिंधिया विचलित हो गए। उन्होंने गोपालकृष्ण को राष्ट्रीय आंदोलन से विमुख करने के लिए ग्वालियर राज्य के मंत्रिमंडल में शामिल करने का लालच दिया, किंतु उन्होंने दृढ़ता से प्रस्ताव ठुकरा दिया।
1931 तक पुराणिक जी ने ग्राम सुधार व विकास से जुड़े अनेक कार्यों को जमीन पर उतारा और उन्हें अनुभव होने लगा कि गांधी के ग्रामोत्थान के महत्व को देश-विदेश को समझाना है तो इस लक्ष्यपूर्ति के लिए किसी पत्र-पत्रिका का प्रकाशन जरूरी है। इस स्वप्न के मस्तिष्क में कौंधते ही उन्होंने नवंबर, 1938 में बंबई से ‘रूरल इंडिया‘ नामक मासिक पत्रिका का अंग्रेजी में प्रकाशन शुुरू कर दिया। अंग्रेजी उन्होंने स्वाध्याय से सीखी थी। पत्रिका के लिए अंग्रेजी में गोपालकृष्ण नियमित संपादकीय तो लिखते ही थे, ग्राम विकास से जुड़े लेख भी लिखते थे। इस पात्रिका में महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, पट्टाभि सीतारमैया, विजयलक्ष्मी पंडित, गोविंद वल्लभ पंत, जवाहरलाल नेहरू, काका कालेलकर, हरिभाऊ  उपाध्याय जैसे चर्चित नेता नियमित लेख लिखते थे। प्रो. एन.जी. रंगा इसके संचालक मंडल के अध्यक्ष थे। बाद में पाठकों की मांग पर पत्रिका में आठ पृष्ठ हिंदी मेें प्रकाशित किए जाने लगे।
वे हर क्षण देश और गांव के विकास और सुधार के लिए काम करते रहते थे। लेकिन 31 अगस्त, 1965 को शिवपुरी के जिला चिकित्सालय में उनका निधन हो गया। उन्होंने अपने जीवनकाल में ग्राम सुधार और ग्रामीण पत्रकारिता को एक संबल दिया और महान स्वतंत्रता सेनानी बनकर समाज को प्रेरणा दी।

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