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चुनौती प्रशासन में जान फूंकने की

Written byArchiveArchive
May 1, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 01 May 2017 12:21:13

 

जम्मू-कश्मीर में मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के लिए चुनौती सिर्फ अपनी पार्टी के पुराने नेताओं से नहीं है, चुनौती ढीले प्रशासन और प्रशासनिक खामियों की भी है जिन पर उन्हें लगाम कसनी ही होगी

जवाहरलाल कौल

जम्मू-कश्मीर में आरम्भ से ही ब्लैकमेल की राजनीति चलती रही है। शेख मोहम्मद अब्दुल्ला के समय से ही राजनीति की जो शैली राज्य में अमल में लाई गई, हर दल और गुट के नेता उसी का अनुसरण करते रहे हैं, या यूं कहें कि उसी के चंगुल में फंस गए हैं। अधिकतर राजनैतिक नेताओं ने उससे निकलने का प्रयास ही नहीं किया और जिन्होंने करना चाहा, वे पर्याप्त साहस नहीं जुटा पाए। यह राजनीतिक शैली राज्य के दलों को भी रास आती रही और अब से पहले की केंद्रीय सरकारों को भी।

दोनांे पक्षों के पास एक-दूसरे पर धौंस जमाने के लिए कोई न कोई मुद्दा तो रहता ही था। इससे एक प्रकार का संतुलन बना रहा, भले ही उसके दूरगामी परिणाम देश और राज्य, दोनों के लिए विनाशकारी रहे हों। यह संतुलन तब बिगड़ गया जब केन्द्र में भाजपा सरकार आई, खासकर उस समय से जब जम्मू-कश्मीर में भी भाजपा सत्ता में साझेदार की स्थिति में आई। एक समय था जब भाजपा के ही नाम पर राजनीतिक दल आम मुसलमान जनता को डराया करते थे-''उन्हें राज्य में दखल करने न दो वरना तुम्हारा सब कुछ नष्ट हो जाएगा।'' यही प्रचार का मुद्दा हुआ करता था। प्रजा परिषद आरम्भ से ही कश्मीरी राजनीतिक नेताओं के विरोध का केंद्र रही थी। शेख अब्दुल्ला ने तो प्रजा परिषद को बदनाम करने के लिए पूरा आंदोलन ही खड़ा कर दिया था। जो पीडीपी आज भारतीय जनता पार्टी के साथ जम्मू-कश्मीर की सरकार चला रही है, वह भी अपने स्वायत्तता के प्रस्ताव में यही दलील देती रही कि हमें उस स्थिति के लिए भी तैयार रहना चाहिए जब भारत का शासन भाजपा के हाथों में चला जाएगा। लेकिन अब जबकि वह स्थिति आ गई और जम्मू-कश्मीर की जनता ने ऐसा जनादेश दे दिया कि पीडीपी  के लिए भाजपा को साथ लेने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं बचा। यह जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक हालात में ऐसा क्रांतिकारी बदलाव है जिसे न तो राजनैतिक दल पचा पाते हैं और न ही अलगावादी गुट। इससे सबसे अधिक घबराहट उन बाहरी ताकतों को है जिन्हें लगता था कि कश्मीर की राजनीतिक गोटियां उन्हीं के हाथों में हैं।

मुफ्ती मोहम्मद सईद अपनी राजनीति के अंतिम दिनों में यह बात समझ चुके थे कि समय ने ऐसी करवट ली है कि उसके साथ समझौता करने के अतिरिक्त राजनीति में रहने का और कोई उपाय नहीं है। वे अपने साथियों से कहते थे कि ''हमें यह समझ लेना चाहिए कि भारत में जो बदलाव आया है' वह एक-दो साल के लिए नहीं, कम से कम 10 साल के लिए है।'' बीमारी से कुछ दिन पहले दिल्ली में एक मुलाकात में उन्होंने जो कुछ कहा, वह इस एहसास को व्यक्त करता था। वे चाहते थे कि जम्मू और कश्मीर घाटी के बीच जो राजनीतिक खाई बन गई है, उसे पाटना आवश्यक है। उन्हें इस बात का भी खेद था कि जवाहरलाल नेहरू ने शेख अब्दुल्ला को यह खाई बनाने की छूट दी। ऐसा नहीं हुआ होता तो जम्मू-कश्मीर की राजनीति में इतनी कटुता और इतना अविश्वास नहीं होता। लेकिन नियति ने सईद को इतना समय दिया ही नहीं कि वे विभिन्न वगार्ें में पैदा की गई

खाइयों को पाटने के बारे में कुछ कारगर कदम उठा पाते।

महबूबा को अकेला छोड़कर वे बीच रास्ते से ही चले गए। महबूबा केवल राजनीतिक शतरंज में एकदम अनुभवहीन खिलाड़ी तो थीं ही, बल्कि जिस संगठन को वे सम्भालती थीं वह दरअसल संगठन बन ही नहीं पाया था। मुफ्ती ने कुछ गुटों को इस उम्मीद पर अपने साथ आने के लिए मना लिया था कि उनके राजनीतिक और आर्थिक हित सुरक्षित रखे जाएंगे। इन गुटों में बहुत से ऐसे भी थे जो अलगाववादी गुटों और आतंकवादी गुटों के साथ भागते-भागते तंग आ गए थे। उन्हें पीडीपी एक सुरक्षित आश्रय की तरह मिली थी। वे आतंकवादी से अलग हो गए थे, लेकिन क्या उनका भावात्मक परिवर्तन भी हुआ था? उनकी हिंसक प्रवृत्तियां भी समाप्त हो गई थीं? अगर मुफ्ती रहते तो शायद वे इस बदलाव को अपनी वास्तविक परिणति तक पहंुचा पाते, लेकिन महबूबा ऐसा नहीं कर पाईं।

महबूबा के मुख्यमंत्री बनने को आतंकवाद की लगाम सम्भालने वालों ने ऐसे मौके के तौर पर देखा कि जब वे इस नई सरकार को पांव जमाने से पहले ही उखाड़ सकते थे। बुरहान वानी को पहले से  कुर्बानी के लिए तैयार किया जा रहा था। इंटरनेट के जमाने में द्रुत गति से चलने वाली संचार प्रणाली का लाभ उठाने के लिए नई तरह के आतंकवादियों का विकास करना आवश्यक हो गया था। पहले कोई आतंकवादी गुमनाम और छद्म व्यक्तित्व होता था, जिसकी गुमनामी ही उसकी ताकत थी और उसके अधिक समय तक जीवित रहने की गारंटी भी। पर नई संचार व्यवस्था में वह एक ऐसा व्यक्ति होता है जो व्यक्त और अव्यक्त, दोनों हो सकता है। वह वास्तविक भी है और वास्तविकता की छवि मात्र भी। बुरहान को नए युग के 'काउ बॉय' की तरह विकसित किया गया था। कहने को तो उसका काम मृतप्राय: हिज्बुल मुजाहिद्दीन के लिए नए जिहादियों की भर्ती करना था, लेकिन उसका काम एक प्रभावी छाया नायक के रूप में पूरे समाज, खासकर युवा पीढ़ी में अपनी छवि बनाना भी था। उसने ये दोनों काम किए। ऐसा व्यक्ति  कुछ समय के लिए छिपा तो रह सकता है लेकिन वही संचार टेक्नोलॉजी उसे फंसा भी देती है जो उसे छिपाती रही थी। बुरहान वानी की मौत तय थी और इसलिए ऐसे मौके का लाभ उठाने की योजना भी पहले से बनी थी। बुरहान की मौत उसी समय हुई जब महबूबा को अनंतनाग से चुनाव लड़ना था। उसके पश्चात हिंसा की वारदातें अधिकतर दक्षिण कश्मीर में ही होती रहीं। पत्थरबाजी का दूसरा दौर यहीं से आरम्भ हुआ। लक्ष्य आरम्भ से ही महबूबा मुफ्ती थीं और आज भी हैं।

यह अस्वाभाविक नहीं है कि मुख्यमंत्री अपने संकट का हल खोजने के लिए दिल्ली आएं। कुछ न सूझने की स्थिति में केन्द्र के पास सबसे आसान उपाय होता है सरकार को भंग करके राज्यपाल का शासन लागू करना। लेकिन क्या महबूबा और उनकी पार्टी ऐसा चाहती है? ऐसा वे नही चाह सकतीं क्योंकि दुबारा चुनाव करवाने पर वे शायद उस स्थिति में भी नहीं रहेंगी जिसमें आज हैं। पार्टी पर आज भी उनकी पकड़ कमजोर है। उनके नेतृत्व को आरम्भ से ही उनके कुछ वरिष्ठ साथियों ने पसंद नहीं किया था। उनकी सरकार के लिए पहली चुनौती तो उनकी पार्टी के भीतर से ही आई। सरकार में बने रहना उनके और उनकी पार्टी के लिए आवश्यक है। इसलिए अगर वर्तमान अशांति पर काबू पाना है तो उन्हें ही कोई समरनीति बनाकर केंद्र के सामने रखनी होगी। उन्हें अपने प्रशासन को चुस्त-दुरुस्त करने का गम्भीर प्रयास करना होगा। पिछले दिनों श्रीनगर के उपचुनाव में ही यह बात स्पष्ट हो गई कि उनका पुलिस प्रशासन ईमानदारी से काम नहीं करता, वरन् ऐसा कैसे सम्भव था कि नगर के बीचोेंबीच इतनी बड़ी संख्या में विरोधी सभी मतदान केंद्रों को एक साथ घेर लेते? कश्मीर में बहिष्कार की घोषणा पहली बार नहीं हुई है। उसके कारण मतदाताओं में डर की भावना पैदा होना कोई नई बात नहीं है। तो फिर इसकी पहले से तैयारी क्यों नहीं हुई? ऐसा कुछ होने का अंदाज तो उसी दिन होना चाहिए था जब अलगाववादियों के चुनाव बहिष्कार के बाद कुछ राजनीतिक दलों ने अपनी ओर से 'आंशिक बहिष्कार' की घोषणा कर दी। यानी आम चुनाव का बहिष्कार नहीं होगा, केवल सत्तारूढ़ दल का बहिष्कार होगा। ऐसा तभी किया जाता है जब खुले चुनाव में जीतने की आशा न हो। नई घोषणा के बाद उन सभी वगार्ें को डराने का क्रम आरम्भ हो गया जो नेशनल कॉन्फे्रंस के हिमायती नहीं थेे। बडगाम क्षेत्र में सबसे अधिक हिंसा इसलिए हुई क्योंकि वहां की आबादी का बड़ा भाग शिया समुदाय का है और वे आमतौर पर अलगावाद से दूर ही

रहते हैं। यह बात अब तक सरकार के संज्ञान में आ ही चुकी होगी कि पत्थरबाजी अब एक व्यावसायिक पेशा, कुछ लोगों के लिए कमाई का साधन बन गई है। जो लोग इस पेशे को चलाते हैं, उनकी पहचान भी असंभव नहीं होनी चाहिए। सुरक्षा बलों के अपने सूचना तंत्र ने इस बात का पता लगाया है कि पत्थरबाजी की घटनाओं और अपुष्ट वारदात की जानकारी तुरंत सारे नगर और फिर पूरी घाटी में पहुंचाने में कुछ सोशल साइट बहुत सक्रिय रही हैं। दरअसल उनका काम ही अफवाहों के माध्यम से उत्तेजना फैलाना था। उनमें से कुछ को अब बंद करवा दिया गया है। सोशल मीडिया की भूमिका पर भी विचार होना चाहिए, क्योंकि  कश्मीर को अशांत रखने में स्थानीय मीडिया की भूमिका पहले भी संग्दिध थी, आज भी है।

(लेखक जम्मू-कश्मीर मामलों के जानकार और वरिष्ठ पत्रकार हैं)

 

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