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देवदुर्र्लभ सरसंघचालक

Written byArchiveArchive
Mar 27, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 27 Mar 2017 14:31:08


कुशल संगठक ही नहीं, स्वयंसेवकों को सेवा से सीधे जोड़ने वाले थे बालासाहब। बालासाहब ने अपने जीवन के उदाहरण से स्वयंसेवकों के समक्ष सेवा और समरसता के भाव प्रस्तुत किए थे। देश में आज चल रहे संघ के सेवा कार्यों के पीछे उन्हीं की प्रेरणा है


  डॉ़ श्रीरंग गोडबोले

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रगति और उत्तरोत्तर विकास का रहस्य क्या है? वह कौन-सा अमृत कलश है जिसने 92 वर्षीय संगठन को आज भी ऐसा ऊर्जावान बना रखा है कि वह प्रेरणा बनाकर अनगिनत युवाओं को निरंतर अपनी ओर आकर्षित कर रहा हैै? शाश्वत दर्शन का अधिष्ठान, अद्वितीय संगठनात्मक आचार संहिता व कार्य और कार्यकर्ताओं की आदर्श जीवन शैली इस गूढ़ रहस्य की परतें खोल सकती है। परिवर्तन के अनुकूल ढलने की व्यावहारिकता और लचीला दृष्टिकोण जताता है कि संघ समय के साथ आगे बढ़ रहा है। सौभाग्य से संघ को ऐसे सरसंघचालक मिले जिनका व्यक्तित्व उस समय संगठन की मांग के अनुरूप था। आद्य सरसंघचालक डॉ. हेडगेवार आदर्श व्यक्तित्व के स्वामी थे। उनके नेतृत्व ने संगठन के शैशवकाल का सर्वांगीण पोषण कर उसे वर्तमान का पूर्ण विकसित स्वरूप प्रदान किया है। द्वितीय सरसंघचालक पूज्य गुरुजी ने संघ के दर्शन को लोगों के सामने प्रस्तुत किया और इसके संगठनात्मक ढांचे को सुदृढ़ किया। श्रीगुरुजी के स्वर्गवास के बाद संघ के नेतृत्व की कमान तृतीय सरसंघचालक के नाते श्री बालासाहब देवरस के हाथों में आई। बालासाहब को विरासत में एक ऐसा संगठन मिला था जो अतीत की अनिश्चितताओं और वैरभाव पर विजय हासिल कर चुका था।
डॉक्टरजी, श्रीगुरुजी और संघ की पहली पीढ़ी के कार्यकर्ताओं के महत्वपूर्ण योगदान ने इसे एक मजबूत संगठनात्मक आधार और लोगों के मन में तेजी से जगह बनाती लोकप्रियता दी थी। हालांकि, कोई भी संगठन सिर्फ अतीत की गौरवगाथा के सहारे आगे नहीं बढ़ सकता । अगर वह समय के साथ कदम मिला कर नहीं चलता तो उसका अस्तित्व बीते कालखंड का जीवाश्म मात्र रह जाता है और उसकी प्रासंगिकता खत्म हो जाती है। साथ ही, इस बात का भी खास ध्यान रखना होता है कि संगठन अपने आदर्श पर अडिग रहे और लक्ष्य की ओर समर्पित भाव से बढ़ता चले। बालासाहब का व्यक्तित्व आदर्शवाद, व्यावहारिकता और कार्यनीतिक कौशल का पर्याय था। विनम्रता उनका भूषण था। उन्होंने कभी खुद को महान नहीं समझा। उन्होंने कहा कि संघ का सौभाग्य है कि उसे देवदुर्लभ कार्यकर्ता मिले। पीछे मुड़कर देखें तो यह अक्षरश: सही दिखता है, संघ को बालासाहब के रूप में एक देवदुर्लभ सरसंघचालक ही तो मिले थे। उनके कुशल नेतृत्व ने संघ को हाशिए से निकालकर राष्ट्र निमित्त कर्मभूमि में अहम भूमिका सौंपी। सेवा और समरसता (सामाजिक सद्भाव) रूपी दो आयामों के जरिए उन्होंने संघ को जो सामाजिक बल दिया था, वह निस्संदेह संघ के दर्शन की तर्कसंगत अभिव्यक्ति थी। वे एक दृढ़प्रतिज्ञ व्यक्ति और प्रबुद्ध सुधारवादी थे।

सुधारवादी विरासत
बालासाहब ने यह सुधारवादी विरासत कहां से प्राप्त की थी? देवरस परिवार बहुत संपन्न था और कई नौकर-चाकर उनके खेतों पर काम करते थे। देवरस जी के घर में किसी के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार नहीं किया जाता था। बालासाहब के पिता श्री भैयाजी अपने दैनिक पूजा-पाठ में घटों लगाते। बालासाहब की माता पार्वतीबाई  पूजा विधान की सारी सामग्री तैयार करके रख देतीं और खुद ईश्वर को बस हाथ जोड़कर नमन कर पूरा दिन घर-गृहस्थी के कामकाज को समर्पित कर देतीं। वे बाल और भाऊ  (राव) के मित्रों को एक साथ भोजन परोसतीं, भले ही उनमें कोई किसी जाति-वर्ग का हो। पार्वतीबाई बालासाहब  की पहली शिक्षिका भी थीं। उनके प्रति उनकी भावनाओं को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। अपने व्यक्तिगत संग्रह में उनकी मां की तस्वीर के नीचे एक शब्द लिखा है— ‘कुलदेवता’।
मां के बाद, बालासाहब के व्यक्तित्व पर सबसे बड़ा प्रभाव डॉ. हेडगेवार का पड़ा जो वास्तव में एक प्रगतिशील व्यक्ति थे। कलकत्ता में अपनी डॉक्टरी की पढ़ाई करने के दौरान ही युवा केशवराव हेडगेवार ने धोंडो केशव कर्वे के सम्मान में एक समारोह का आयोजन किया था जो महिलाओं के लिए बनने वाले पहले विश्वविद्यालय (रा़ स्व़ संघ अभिलेखागार, नाना पालकर, हेडगेवार नोट 3-159) के लिए धन एकत्र करने के लिए पहुंचे थे। कर्वे का यह कदम स्त्री शिक्षा की दिशा में मील का पत्थर साबित हुआ जिसके लिए उन्हें 1958 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया था। डॉक्टरजी ने पुरुषोत्तम नीलकंठ उर्फ अप्पा साठे को महाराष्ट्र के चिपलूण का संघचालक नियुक्त किया। साठे के तीन बच्चे थे। पत्नी का निधन होने के बाद उन्होंने काशीबाई वैद्य नाम की विधवा से शादी कर ली थी, जिनकी पिछली शादी से एक बेटी थी। चिपलूण के  रूढ़िवादी समाज में एक विधुर और विधवा की शादी को कड़ी निंदा झेलनी पड़ी। इसलिए, 4 दिसंबर, 1937 को पुणे में इस विवाह को विधिवत् मान्यता प्रदान की गई। इस परिवर्तनकारी विवाह में उपस्थित होने वाले प्रतिष्ठित लोगों में डॉ़ हेडगेवार और डी.के. कर्वे शामिल थे। डॉ़  हेडगेवार और डॉ़ भीमराव आंबेडकर एक- दूसरे को अच्छी तरह जानते थे। डॉ़ आंबेडकर ने पुणे (1939) में अधिकारियों के प्रशिक्षण शिविर और जनवरी 1940 में कराड में संघ शाखा का दौरा किया था (रा़ स्व़ संघ अभिलेखागार, रजिस्टर 1 डीएससी-0039, 2 जनवरी, 1940)। बालासाहब को निश्चित तौर पर डॉक्टर साहब से ही सेवा की विरासत मिली थी। डाक्टर जी ने 27 फरवरी, 1927 को नागपुर में श्रद्धानंद अनाथालय की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। आपदा के समय घायल लोगों की मदद करने के उद्देश्य से डॉक्टर जी ने संघ के शुरुआती दौर में नर्सिंग टीम शुरू की थी। यह कदम वास्तव में संघ संविधान के अनुच्छेद 8 के अनुकूल था जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि सेवा दैनिक संघ शाखा का एक अभिन्न अंग है।

स्वयं और समाज का सुधार
अक्सर देखा गया है कि जिन लोगों ने समाज को सुधारने का बीड़ा उठाया, वे स्वयं को सुधारने के प्रति बहुत गंभीर नहीं होते। बालासाहब इसका अपवाद थे। उनका मानना था कि सुधार स्वयं से शुरू होता है। विदर्भ प्रांत के पूर्व सह प्रांत संघचालक डॉ. श्रीराम जोशी ने उनकी इस दृढ़ धारणा का उदाहरण देते हुए एक कहानी सुनाई। एक बार बालासाहब एक कार्यक्रम में भाग लेने के लिए संघ कार्यालय से निकल रहे थे। डॉ. जोशी और पांडुरंग पंत सावरकर के साथ सीढ़ियों से नीचे उतरते समय उन्हें एक वरिष्ठ कार्यकर्ता की आवाज सुनाई दी, जो अपने बारे में कह रहे थे कि अब वे ऐसी उम्र पर पहुंच चुके हैं जब स्वयं को बदलना उनके लिए संभव नहीं है। बालासाहब रुके, कार्यकर्ता के पास  गए और कहा, जब तक अंत समय नहीं आता, तब तक स्वयं को सुधारते रहो। बालासाहब ने इस सिद्धान्त को अपने व्यवहार में उतारा था। बालासाहब को छोटी उम्र में बहुत तेजी से बात करने की आदत थी। कभी-कभी उनके शब्दों का अर्थ स्पष्ट नहीं होता। ऐसा तब होता है जब शब्दों और विचारों की गति में परस्पर सामंजस्य नहीं होता। जब संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता अप्पाजी जोशी ने उन्हें इस बात का एहसास कराया तो बालासाहब धीरे बोलने का प्रयास करने लगे।
बालासाहब न तो अतीत में जीते थे, न ही इतिहास के बोझ तले विवश होते थे। वे वर्तमान में जीने पर विश्वास करते और उनकी नजर भविष्य पर टिकी रहती। उनके दृष्टांत हमेशा वर्तमान की जमीन से जुड़े होते। किताबें पढ़ने से व्यक्तित्व का निर्माण होता है, इसलिए यह समझना बहुत ही आसान है कि बालासाहब का दृष्टिकोण इतना व्यापक क्यों था। उनकी पुस्तकों के संग्रह में अलेक्सांद्र सोल्झेनीत्सिन की ‘द गुलाग आर्किपेलगा’ थी, जिसमें तत्कालीन सोवियत संघ के बंधुआ श्रमिकों के शिविरों की भयावहता का वर्णन है और विलियम मैककर्ड की ‘द स्प्रिंगटाइम फ्रीडम’ भी थी, जो विकासशील समाजों के विकास पर चर्चा पेश करती है। दर्शनशास्त्र की गंभीर पुस्तकें भी उनके लिए उतनी ही सहजग्राह्य थीं जितनी एक उपन्यास या एक हास्य लेख। इस तरह विविध विषयों में दिलचस्पी रखने वाला व्यक्ति अनुदार हो ही नहीं सकता था।
सामाजिक सामंजस्य का अर्थ है भिन्न या परस्पर विरोधी चिंतन और मूल्य-प्रणालियों में तालमेल स्थापित करना। यह संकीर्ण मन के बंद कमरों में पल्लवित नहीं होता। बालासाहब विभिन्न विचारों को ग्रहण करने का प्रयास करते। दर्शनशास्त्र में स्नातक बालासाहब को अनेकांतवाद के जैन सिद्धांत के प्रति गहरा लगाव रहा था जो मानता है कि हर पदार्थ या स्थिति में अनंत गुण या विशेषताएं होती हैं और ये अलग-अलग गुण विभिन्न दृष्टिकोणों के जरिए देखे जा सकते हैं। बालासाहब का कहना था कि एक प्रश्न के कई सही उत्तर हो सकते हैं। उन्होंने ही संघ में प्रश्नोत्तर सत्र प्रस्तुत किया था। वे हमेशा संघ के स्वयंसेवकों को अपने प्रश्नों को बिना संकोच प्रकट करने के लिए प्रोत्साहित करते, कभी-कभी तो किसी अति उत्साही कार्यकर्ता को उसके प्रश्न को सही तरीके से तैयार करने में मदद भी करते। उनका मानना था कि कोई सवाल मूर्खतापूर्ण नहीं हो सकता, सिर्फ जवाब मूर्खतापूर्ण होते हैं। बालासाहब के जवाब पूर्ण, स्पष्ट और सुलझे होते। उनसे न सिर्फ प्रश्नकर्ता की शंकाओं का निवारण होता, बल्कि उसे एक बेहतर कार्यकर्ता बनने में मदद भी मिलती। बालासाहब सच्चे लोकतंत्रवादी थे। सुनने की योग्यता लोकतंत्रवादी होने की पहली विशेषता है। चर्चिल ने कहा है, ‘‘खड़े होकर बोलने में साहस की जरूरत है, तो बैठकर सुनने में भी साहस की जरूरत है।’ बालासाहब की सुनने की क्षमता अनंत थी। बालासाहब बिना क्रोधित हुए दूसरे व्यक्ति की बात शांति से सुनते। उन्होंने ‘बालादपि सुभाषितम् ग्राह्यम’ (सत्य को आत्मससात करो, चाहे वह किसी बच्चे के मुख से क्यों न निकला हो) मंत्र को अपने व्यवहार में उतार लिया था।  
स्वयंभू प्रगतिशील मानते हैं कि संघ कट्टर रूढ़िवादियों की जमात है जो अप्रचलित वैचारिक व्यवस्था को थोपना चाहता है। आपातकाल के समय जेल में विभिन्न विचारधाराओं को मानने वाले राजनीतिक कार्यकर्ताओं को एक साथ रखा गया था। जब यरवदा जेल में समाजवादियों को बालासाहब की कथनी और करनी में सुस्पष्ट प्रगतिवाद दिखाई दिया तो वे संतुष्ट हो गए।
बालासाहब मानते थे कि अच्छे विचारों को प्रसारित करने में सक्षम कोई भी माध्यम निषिद्ध नहीं होता। एक बार राजदत्त नाम के एक युवा स्वयंसेवक ने बालासाहब से पूछा, ‘‘क्या मैं फिल्म निर्माण का व्यवसाय अपना सकता हूं?’’ बालासाहब ने जवाब दिया, ‘‘बिल्कुल, हमारे लिए कोई भी क्षेत्र वर्जित नहीं’’। राजदत्त एक जाने-माने फिल्म निर्माता बने। वर्ष 1977 में उन्होंने प्रख्यात संत-सुधारक गडगे बाबा के जीवन पर एक मराठी फिल्म निर्देशित करने का फैसला किया। उस समय बालासाहब ने राजदत्त को सुझाव दिया था कि उन्हें गडगे बाबा के सामाजिक उपदेशों और काम पर ज्यादा ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
बालासाहब नास्तिक नहीं थे, लेकिन कर्मकांड को नहीं मानते थे। उन्होंने कभी जनेऊ  नहीं पहना और न ही खाने से पहले चित्राहुति (ईश्वर के निमित्त भोजन का अंश अलग करना) निकाली। वे कहा करते थे, मैं ऐसा कुछ भी नहीं करूंगा जो मुझे साथी स्वयंसेवकों से अलग करता हो। वे अंतर्जातीय विवाह को प्रोत्साहित करते और कई अवसरों पर ऐसे विवाह में मदद भी करते। ऐस विवाह आयोजन में वे जरूर शामिल होते।
संघ को आकार देना
डॉ़ हेडगेवार की प्रतिच्छाया में बालासाहब संघ के सर्वोत्कृष्ट रत्न थे। संघ ने जितना उन्हें अपने सांचे में ढाला, उतना ही उन्होंने संघ को ढाला। बलासाहब का दृढ़ विश्वास था कि संघ स्वयंसेवकों को आस-पास की दुनिया से अलग नहीं रहना चाहिए। उन्हें सामाजिक बदलावों पर प्रतिक्रिया करनी चाहिए और आसपास के लोगों के सुख-दुख में शामिल होना चाहिए। संघ समाज में जो बदलाव लाना चाहता है, वह स्वयंसेवकों के दैनिक जीवन से परिलक्षित होना चाहिए। कई वर्ष तक एक आम आदमी की नजर में संघ स्वयंसेवकों की छवि गणवेश में पथसंचलन करते लोगों की ही थी। बालासाहब ऐसी धारणा को तोड़ने के लिए कृतसंकल्प थे। वे बराबर आगाह करते, हमें खुद को वैसा प्रस्तुत नहीं करना चाहिए जो हम नहीं हैं।   
3-4 जुलाई, 1978 को बालासाहब ने महाराष्टÑ के वनवासी क्षेत्रों का सघन दौरा किया। दो दिन में उन्होंने मोखाडा, तलसारी, सूत्रकार, अंभन, मनोर, पालघर, औंडा, विक्रमगढ़, जौहर और वाडे को छान मारा। 3 जुलाई को तलसारी में पत्रकारों से अनौपचारिक बातचीत में उन्होंने कहा, ‘‘दो प्रमुख अखिल भारतीय कार्यकर्ताओं को उनकी जिम्मेदारियों से मुक्त कर दिया गया है ताकि वे वनवासी मुद्दे का अध्ययन कर सकें।’’ उनसे मिलने वाली जानकारी के आधार पर हम पूरे देश में नए कार्यक्रम शुरू करने पर विचार कर रहे हैं। 4 जुलाई को जौहर में पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा, सेवा कार्य का दायित्व विशेष तौर पर दो अखिल भारतीय और 45-48 प्रांत स्तर के कार्यकर्ता संभालेंगे।
बालासाहब ने सेवा पर बहुत बल दिया था, उसी का परिणाम था कि प्राकृतिक आपदाओं के दौरान बड़ी संख्या में स्वयंसेवक सक्रिय हुए और उन्होंने बचाव और पुनर्वास कार्य में समर्पित भाव से काम किया। 1979 में आंध्र में आया चक्रवात हो या 1982 में राजस्थान में आई बाढ़, सब तरफ सुरक्षात्मक मास्क लगाकर शवों को ले जाते या आपदाग्रस्त लोगों को राहत पहुंचाते स्वयंसेवक दिख रहे थे। स्वयंसेवकों ने इस तरह की गतिविधियों में प्रभावी रूप से पहले भी राहत कार्यों में भाग लिया था, जैसे वर्ष 1950 में  असम में भूकंप और बाढ़ के दौरान। संघ के स्वत:स्फूर्त विकास को बालासाहब की सामाजिक गतिविधियों पर केंद्रित विचार का साथ मिला और संघ का सेवा भाव एक व्यापक अखिल भारतीय प्रवृत्ति बन गया। 1989 में डॉ. हेडगेवार शताब्दी वर्ष के दौरान संघ के इस सेवा कार्य को काफी प्रोत्साहन मिला।
  बालासाहब ने संघ में समरसता की रूपरेखा निर्धारित की। 8 मई, 1974 को पुणे में वसंत व्याख्यानमाला में उनका उद्बोधन सामाजिक समरसता और हिंदू संगठन पर निस्संदेह संघ के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण व्याख्यान है। काम को सबसे ज्यादा महत्व देने वाले इस संगठन में व्याख्यानों की सीमित उपयोगिता है। अगर कभी काम से ज्यादा उद्बोधन प्रभावी रहा हो, तो यही वह अवसर था। समरसता के संदर्भ में बालासाहब के शब्दों ने संघ को वह बहुप्रतीक्षित ऊर्जा दे दी जिसे पाने के संगठन के तमाम प्रयास विफल रहे थे।
उल्लेखनीय है कि बालासाहब ने यह विषय जान-बूझकर चुना था जब उन्हें वसंत व्याख्यानमाला में बोलने के लिए आमंत्रित किया गया था। उन्होंने बड़ी सूक्ष्मता से भाषण की तैयारी की। वैसे तो वे खुद भी संस्कृत और दर्शनशास्त्र के विद्वान थे, फिर भी उन्होंने पुरुषसूक्त पर नागपुर के कृष्ण शास्त्री बापट की राय ली। बालासाहब ने अपनी व्याख्यान तैयार करने के लिए करणजा गांव में अपने पैतृक घर पर दो दिन बिताए। उन्होंने आसपास के गांवों से साधारण कार्यकर्ताओं को बुलाया और उन्हें व्याख्यान पढ़कर सुनाया। बालासहब ने उन कार्यकर्ताओं से भी सुझाव लिए और अतंत: अपने व्याख्यान को अंतिम रूप दिया। फिर उस व्याख्यान को नागपुर में टाइप किया गया और पुणे रवाना होने से पहले उसकी एक प्रति ‘तरुण भारत’ को दी गई। इसके अलावा, भाषण पढ़ने से पहले बालासाहब ने इसे महाराष्टÑ के प्रांत      प्रचारक श्री बाबाराव भिडेÞ को दिखाया जो रूढ़िवादी माने जाते थे।
भ्रम दूर करना
बालासाहब के इस महत्वपूर्ण व्याख्यान से पहले संघ के आलोचक हावी रहते थे। संघ पर चतुर्वर्ण और जाति प्रथा का पैरोकार होने का आरोप लगाया जाता था। ये आलोचक खास तौर पर मराठी दैनिक ‘नवकल’ को दिए साक्षात्कार के दौरान चतुर्वर्ण पर की गई श्री गुरुजी की टिप्पणियों को संदर्भों से परे जाकर उद्धृृत करते जिसके परिणामस्वरूप स्वयंसेवक रक्षात्मक हो जाते। इसके अतिरिक्त सामाजिक मुद्दों पर संघ का दृष्टिकोण स्वयंसेवकों को समझ नहीं आ रहा था। वे अपने चतुर विरोधियों को आत्मविश्वास के साथ जवाब नहीं दे पाते और अक्सर अपने पूर्वजों के प्रत्येक कार्य को न्यायसंगत ठहराने की कोशिश में अपनी ऊर्जा व्यर्थ कर देते। बालासाहब ने संघ को विरोधियों की थोपी गई जंजीरों से आजाद किया। उन्होंने विचार-विमर्श के नियम ही बदल डाले। अतीत में जाने के बजाय उन्होंने निर्विवाद रूप से घोषणा की कि समय की मांग है कि एक ऐसे समाज का निर्माण हो जो शोषणमुक्त हो और जहां सामाजिक समानता की छटा बिखरी हो। सरसंघचालक के शब्दों ने स्वयंसेवकों के मन के भ्रम को तत्काल दूर कर दिया और आलोचकों को चुप कर दिया।
यह सामाजिक सक्रियता पर बालासाहब के बल देने का ही असर था कि वनवासी कल्याण आश्रम एक राष्टÑीय संगठन बन गया। सेवा भारती की शुरुआत (1979), संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा (1981) में आरक्षण पर संकल्प, महाराष्टÑ में सामाजिक समरसता मंच का गठन (1987), डॉ़  हेडगेवार के जन्म शताब्दी वर्ष (1989) में सैकड़ों सेवा परियोजनाओं का शुभारंभ, 1990 में डॉ. आंबेडकर का जन्म शताब्दी समारोह, घुमंतू जनजातियों के बीच काम करना बालासाहब के दर्शन की स्वाभाविक कड़ियां थीं। बालासाहब ने संघ को वह मार्ग दिखाया जहां से आगे बढ़ने की प्रशस्त और ऊर्जा से ओत-प्रोत यात्रा शुरू हुई।

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