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हल्ला ज्यादा, लोग कम

Written byArchiveArchive
Mar 20, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 20 Mar 2017 14:21:23

 

मणिपुर में ‘अफ्स्पा’ हटाने के लिए 16 वर्ष तक लगातार अनशन करने वालीं इरोम शर्मिला को विधानसभा चुनाव में केवल 90 वोट मिले। इसका मतलब है कि उन्हें उनके लोगों ने भी वोट नहीं दिया

  गुलशन गुप्ता

मणिपुर में विधानसभा चुनाव लड़ने वालीं इरोम शर्मिला चानू को दोबारा अपनों से ही हार खानी पड़ी। उन्हें सिर्फ 90 वोट मिले। अब सवाल उठता है कि जिन्हें सिर्फ 90 वोट मिले, उनकी पालकी दिल्ली में, मणिपुर में और विदेश में ढोने वाले कहार कौन   थे? गौण चीजों को बड़ा दिखाने का काम किसने किया? सेना पर लांछन किसके इशारे पर लगाया गया? दुनियाभर में इरोम को एक ‘नायिका’ की तरह किसने प्रस्तुत किया? इन चुनावों ने इन सब सवालों की पड़ताल का रास्ता खोला है।
 इरोम को वोट नहीं मिलने पर सोशल मीडिया में अनेक तरह की बातें की गर्इं। किसी ने मणिपुर के लोगों को कृतघ्न और संवेदनहीन कहा। किसी ने कहा कि यह मूर्खों का लोकतंत्र है, तो किसी ने कहा आज भी 90 लोग उनके (इरोम के) साथ हैं।
इतना तो स्पष्ट है कि इरोम ने चुनाव इन्हीं अपनों के भरोसे लड़ा था। 16 साल का उपवास भी इन्हीं अपनों के लिए रखा था। और चुनाव परिणाम से स्पष्ट हुआ कि वे कुल 90 लोग हैं। तो फिर क्या कारण रहा कि उनका त्याग और उनके अपनों की यह सहानुभूति उन्हें राजनीतिक पारी में विजयी नहीं बना सकी। क्या उन्होंने 16 वर्ष का उपवास केवल इन 90 लोगों के लिए रखा था? वास्तव में इरोम ने अपने लिए सहानुभूति और समर्थन के कारण को ठीक से जाना ही नहीं।
जरा इतिहास में झांकें। 8 सितम्बर, 1980 को मणिपुर में ‘अफ्स्पा’ अधिनियम 1958 लागू हुआ। संवेदनशील क्षेत्र में सेना को कुछ छूट देने वाले इस प्रावधान के कारण मैयरा पायिबी समूहों ने सेना के खिलाफ भी मोर्चा खोला।
इरोम के आमरण अनशन पर जाने की एक पूरी घटना है। इंफाल बाजार से दस किलोमीटर पूरब में पोरोम्पट नामक जगह है। इरोम यहीं से हैं। इंफाल बाजार से दस किलोमीटर पश्चिम में, हवाई अड्डे के रास्ते मालोम नाम की जगह है।  2 नवंबर, 2000 को मणिपुर के इस इलाके में सुरक्षाकर्मियों ने दस लोगों को गोली मार दी थी। उस दिन गुरुवार था। गुरुवार के दिन मैतेई (अर्थात् मणिपुरी हिंदू) महिलाएं देवी का व्रत रखती हैं। इरोम ने भी व्रत रखा था। उस घटना से आवेश में आर्इं इरोम ने व्रत ही नहीं खोला। इस बात को चार दिन बीत गए। अभी तक इरोम ने कुछ खाया नहीं था।  जब उन्होंने अपने उपवास का कारण सबके सामने लाना चाहा तो पहले वे अपनी मां से आशीर्वाद लेने गर्इं। उन्हें भी खबर नहीं थी कि उनकी बेटी इस प्रकार का कठोर निर्णय ले लेगी। लेकिन उनके दृढ़ निश्चय को जानकर आखिरी मुलाकात में मां ने कहा कि अब उनसे तभी मिलेंगी जब उपवास का उद्देश्य पूरा हो जाएगा।
जब यह खबर फैली तो लोगों की इरोम से सहानुभूति तो हुई लेकिन वे उनके संघर्ष में शामिल नहीं हुए। जब इरोम के उपवास की चर्चा देश-विदेश में होने लगी तब मणिपुर के लोगों को समझ आया कि इरोम ने अंतरराष्टÑीय जगत में पैठ बना ली है। इसके बाद मणिपुर के राजनीतिक-सामाजिक संगठनों ने इरोम की ओर रुख किया। इनमें विशेष है मैयरा-पायिबी समूह। मणिपुर में समाज निर्माण के क्षेत्र में महिलाओं का यह संगठन सबसे अधिक प्रभावशाली है।
पहले की अपेक्षा अब मैयरा-पायिबी संगठनों का भी यही उद्देश्य है कि मणिपुर में से अफ्स्पा को हटाया जाए और इनर लाइन परमिट (अंतर्गमन अनुमति पत्र) लागू किया जाए। इरोम को भी लगा कि इन महिलाओं का साथ उनके निश्चय को और अधिक दृढ़ करेगा। यहां एक बात स्पष्ट करना जरूरी है कि मणिपुर में प्रत्येक महिला मैयरा-पायिबी है। इसलिए इरोम भी एक प्रकार से उसी का हिस्सा हुर्इं। गौर करने वाली बात यह है कि इरोम के रूप में इन मैयरा पायिबी समूहों को एक ऐसा ‘हाथी’ मिल गया था जिसके दांत दिखाकर इन्हें स्थानीय और देश के अतिरिक्त अंतरराष्टÑीय समाज से भी समर्थन और आर्थिक सहयोग मिलने लगा था। लेकिन अब हाथी ही नहीं रहा तो सर्कस कैसा? अर्थात् जैसे ही इरोम ने अपने अनशन को समाप्त करना चाहा, लोगों की सहानुभूति भी समाप्त हो गई।
अंतरराष्टÑीय समाज का समर्थन और सहयोग मिलने का अर्थ था सरकार पर अपना दबाव बढ़ाना। मैयरा-पायिबी समूहों सहित स्वयं इरोम ने इसके लिए प्रयास किए। लेकिन ऐसी पेचीदा स्थिति में कोई भी सरकार या दल हाथ डालना नहीं चाहता था।
मणिपुर की वर्तमान स्थिति और       जनसांख्यिकी को देखते हुए ‘अफ्स्पा’ को हटाना मणिपुर के लिए ही नुकसानदेह है। राज्य का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा पहाड़ी है जिसमें महज 30 प्रतिशत लोग रहते हैं। इनमें अधिकतर नागा और कूकी जनजाति के लोग हैं जबकि 30 प्रतिशत धरती समतल है, जहां मणिपुर की 70 प्रतिशत आबादी रहती है। इस 70 प्रतिशत में  मैतेई समुदाय के लोग सबसे ज्यादा हैं, फिर नेपाली, बंगाली, पंजाबी, मारवाड़ी, बिहारी आदि हैं। अर्थात् मैतेई (मूल मणिपुरी) लोग समतल में ही रहते हैं। और पूर्वोत्तर में जहां-जहां नागा रहते हैं, उनकी मांग है कि मणिपुर, असम, अरुणाचल प्रदेश के कुछ हिस्से और नागालैंड को मिलाकर उन्हें ‘ग्रेटर नगालिम’ दिया जाए। ऐसे में सेना को न रखा जाए तो उग्रवादी और उपद्रवी तत्वों से निबटने और गृहयुद्ध की स्थिति से बचने के लिए मणिपुर में तैनात सुरक्षा बल पर्याप्त नहीं हैं। अन्यथा कौन-सा राष्टÑ चाहता है कि अपने ही घर में अपने ही लोगों को बंधक बनाकर रखा जाए। हालांकि पिछले कुछ साल में स्थिति एकदम बदल गई है। तनावपूर्ण स्थितियों को छोड़कर अब केवल सीमावर्ती क्षेत्रों में ही (नागालैंड सीमा और म्यांमार सीमा) सुरक्षा बल अधिक संख्या में तैनात रहते हैं और गहन तलाशी आदि कार्रवाई की जाती है, अन्यथा सभी जगह हालात सामान्य हैं।
कई प्रयासों के बाद भी जब इनकी मांगें पूरी नहीं हुर्इं तो केवल विरोध ही एकमात्र उपाय बचा था जो आज तक जारी है, इरोम के उपवास तोड़ने के बाद भी जारी है। लेकिन उन्हें यह समझने में 16 वर्ष का समय लगा कि कुछ समूहों द्वारा अपनी राजनीतिक-आर्थिक स्थिति मजबूत करने के लिए उनका उपयोग किया जा रहा है। दरअसल, उनकी रोजी-रोटी का साधन बन गई थीं इरोम।
निष्कर्ष के तौर पर पहली बात यही कि इसमें गलती इरोम की नहीं, बल्कि यह अतिविश्वास था कि वे अकेली ही इस समस्या का उपचार कर लेंगी। दूसरी बात यह कि मणिपुर में ‘अफ्स्पा’ कभी ज्वलंत मुद्दा हुआ करता था लेकिन आज स्थिति बदल गई है। राष्टÑवादी विचार मजबूत हुआ है। कुछ भूमिगत गुटों के अलावा कोई ‘अफ्स्पा’ की बात नहीं करता और जब यह वस्तुस्थिति इरोम को समझ आने लगी तो बिना किसी को बताए, मौका देखते हुए, चुनाव आने के ठीक पहले उन्होंने अपने अनशन का फल प्राप्त करने की इच्छा से उपवास तोड़कर राजनीति में जाने की इच्छा जताई। निश्चित रूप से उन्हें इसके लिए प्रोत्साहन दिल्ली के उदहारण से ही मिला है। तीसरी बात यह कि व्यक्ति एक बार जब किसी निर्णय पर आगे बढ़ जाता है तो अपनी ही बात से पलटना या पीछे हटना उसके लिए मुश्किल हो जाता है। चौथी बात यह 2012 के मणिपुर चुनावों के बाद एक सर्वेक्षण कराया गया था, जिसमें लोगों की राय थी कि इरोम को अपना अनशन जारी रखना चाहिए। हालांकि जब 9 अगस्त, 2016 को इरोम ने उपवास तोड़ा तो सबसे अधिक विरोध उसी समाज ने जताया जिस पर उन्हें सबसे अधिक विश्वास था। एक साक्षात्कार में उनके भाई ने कहा था कि अपनी 85 वर्षीया मां को यह सोचकर यह बात नहीं बताई कि मां की अपेक्षाओं पर क्या असर पड़ेगा जब वे यह सुनेंगी कि इरोम ने अनशन तोड़कर शादी करने और राजनीति के दंगल में कूदने का निर्णय लिया है। उन्हें डर था कि इससे उनकी अपेक्षाएं टूट जाएंगी। खबर पता लगने पर इरोम की मां ने भी उनके इस निर्णय का समर्थन नहीं किया था। मतलब यह उनकी पहली हार थी।
पांचवीं बात यह कि इस बार के मणिपुर के चुनावों में इरोम को वामदलों का समर्थन और अरविंद केजरीवाल का आर्थिक सहयोग प्राप्त था। दिल्ली में केजरीवाल की तर्ज पर मणिपुर में इरोम ने भी मुख्यमंत्री के विरोध में ही चुनाव लड़ने का दूसरा हठ किया। छठी बात यह, जब इरोम ने उपवास तोड़ा था तो उन्होंने दो इच्छाएं जाहिर की थीं— एक चुनाव लड़ने की, दूसरी शादी करने की। इरोम के समर्थन किसी विदेशी से उनके विवाह के विरोध में हैं हालांकि बाकी निर्णयों की तरह यह निर्णय भी इरोम ही लेंगी। इन सोलह वर्ष के दौरान कई लोग और संगठन इरोम के संघर्ष को समझने और अपना सहयोग देने आए। इनमें से एक हैं गोवा में जन्मे 48 वर्षीय ब्रिटिश-भारतीय मानवाधिकारकर्मी डेस्मंड काऊटिन्हो। पत्राचार के माध्यम से दोनों में प्रेम बढ़ा। इरोम इनसे शादी करना चाहती हैं। ध्यान देने वाली बात यह कि पहले दो निर्णयों की भांति इस फैसले में भी समाज की सहमति नहीं है।
इरोम  को समाज की नब्ज को भांपना होगा, उसे अपने साथ करना होगा या स्वयं उसके साथ खड़ा होना होगा क्योंकि समय की ‘लहर’ को भांपना आवश्यक है। तभी वह आगे कुछ कर या अपनी उपयोगिता सिद्ध कर सकती हैं। यदि उन्होंने ऐसा नहीं किया तो आगे भी वह अपनों से ही हारती रहेंगी।     ल्ल

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