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रपट/नर्मदा सेवा यात्रा : आकार लेता संकल्प

Written byArchiveArchive
Feb 20, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 20 Feb 2017 14:23:14

 

नमामि देवि नर्मदे सेवा यात्रा

अमरकंटक से शुरू हुई 144 दिवसीय नर्मदा सेवा यात्रा ने महज 59 दिन में जिस प्रकार एक जनांदोलन का स्वरूप ग्रहण कर लिया है उसे देखकर प्रतीत होता है कि यह यात्रा देश में एक बडे सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवर्तन का माध्यम बनेगी

-ओंकारेश्वर से लौटकर प्रमोद कुमार-

मध्य प्रदेश की जीवनरेखा मानी जाने वाली पवित्र नदी नर्मदा के संरक्षण हेतु अमरकंटक से 11 दिसंबर, 2016 को शुरू 'नमामि देवि नर्मदे सेवा यात्रा' राज्य में एक बडे़ सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तन का माध्यम बनती हुई प्रतीत होने लगी है। 59वें दिन 9 फरवरी को यह यात्रा जब आदि शंकराचार्य की तपोस्थली ओंकारेश्वर पहंुची तब तक उसमें कई ऐसे आयाम जुड़ चुके थे जो आगामी दिनों में संपूर्ण देश के लिए प्रेरणास्रोत बन सकते हैं। नदी एवं पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ यात्रा में 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ', संपूर्ण साक्षरता, नशामुक्ति, स्वच्छता, तीथार्ें के विकास जैसे आयामों से जिस प्रकार शहरी एवं सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों के लोग स्वप्रेरणा से जुड़ते दिखाई दिए, उससे लगता है कि नर्मदा को बचाने के साथ-साथ मध्य प्रदेश कुछ ऐसी सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक मान्यताओं में सकारात्मक बदलाव का साक्षी बनेगा जो हिंदू समाज में अंधश्रद्धा के शिकार लोगों को अवश्य ही सोचने पर बाध्य कर देगा। यात्रा 11 मई, 2017 को अमरकंटक में ही संपन्न होगी।

नर्मदा सेवा यात्रा 9 फरवरी को सायंकाल 4़ 30 बजे ओंकारेश्वर पहंुची। यात्रा का स्वागत करने के लिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान एवं अनेक वरिष्ठ संत पहुंचे। इस अवसर पर वरिष्ठ संतों, चिंतकों, विचारकों, विशेषज्ञों, प्रबुद्धजनों एवं सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ नर्मदा संरक्षण एवं आदि शंकराचार्य के वेदांत दर्शन पर खुलकर संवाद हुआ। संतों एवं विद्वतजनों के सुझावों का सम्मान करते हुए मुख्यमंत्री ने राज्य के स्कूली पाठ्यक्रम में आदि शंकराचार्य पर एक अध्याय शामिल करने की घोषणा की। मुख्यमंत्री ने आंेकारेश्वर में आदि शंकराचार्य की एक विशाल अष्टधातु की प्रतिमा भी स्थापित करने की घोषणा की। अपने आशीर्वचन में जूनापीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानन्द गिरि ने सुझाव दिया कि शंकराचार्य की प्रतिमा हेतु धातु राज्य के प्रत्येक निवासी से संग्रहित की जाए। मुख्यमंत्री ने इस सुझाव को स्वीकार करते हुए तुरंत गांव-गांव से प्रतिमा हेतु धातु एकत्र करने की घोषणा कर दी। इस हेतु एक वृहद् अभियान नर्मदा सेवा यात्रा के बाद शुरू होगा।

मुख्यमंत्री ने प्रतिमा हेतु 11 किलो तांबा प्रदान करने की घोषणा की। उसी समय उनके मंत्रिमंडल के अन्य सदस्यों एवं राज्य के भाजपा नेताओं ने भी अपनी तरफ से सामर्थ्यानुसार कोई न कोई धातु प्रदान करने की घोषणा की। श्री चौहान ने कहा, ''यदि कोई लोहे की एक छोटी सी कील भी देता है तो वह भी पूर्ण श्रद्धाभाव से स्वीकार की जाएगी। चूंकि आदि शंकराचार्य का अद्वैत दर्शन संपूर्ण समाज को जोड़ता है इसलिए उनकी प्रतिमा संपूर्ण समाज के सहयोग से ही बनेगी।''

मुख्यमंत्री ने ओंकारेश्वर में वेदांत संस्थान स्थापित करने की भी घोषणा की, जहां आदिशंकर से जुड़ी महत्वपूर्ण स्मृतियों को सहेजने के साथ-साथ उनके जीवन दर्शन पर संतों के मार्गदर्शन में शोध होगा। पर्यटकों एवं तीर्थयात्रियों को ओंकारेश्वर के बारे में जानकारी प्रदान करने के लिए एक 'लाइट एंड साउंड शो' भी तैयार किया जाएगा, जो 40 मिनट में इस तीर्थ के महात्म्य, इतिहास एवं उसके महत्वपूर्ण स्थलों के बारे में तथ्यात्मक जानकारी प्रदान करेगा। ओंकारेश्वर में मुख्यमंत्री ने ममलेश्वर मंदिर, आंेकारेश्वर मंदिर एवं मंदिर में बनी पुरातात्विक महत्व की प्राचीन गुफा, जहां आदि शंकराचार्य ने तपस्या की थी, इन्द्र मंदिर, चन्द्रमौलिश्वर मंदिर आदि के साथ नर्मदा के घाटों का भी विकास करने की घोषणा की। शंकराचार्य गुफा में अद्वैत दर्शन और उनके जीवन से जुडे़ चित्र उकेरे जाएंगे।

वर्ष 1986 से ओंकारेश्वर आने वाले तीर्थयात्रियों से एक रुपए प्रति यात्री कर वसूला जाता रहा है जो तीर्थयात्रियों को काफी आहत करता था। मुख्यमंत्री ने इस कर को अब पूरी तरह समाप्त कर दिया है। इससे करीब 20 लाख यात्रियों को लाभ होगा। कर समाप्त करने से नगरपालिका परिषद को जो नुकसान होगा, उसकी भरपाई भोपाल से की जाएगी।

महज दो महीने में नर्मदा सेवा यात्रा जनांदोलन का रूप धारण कर चुकी है और समाज के सभी वर्ग सक्रिय रूप से इसमें शामिल हो रहे हैं। कुछ स्थानों पर विपक्षी दल कांग्रेस के कार्यकर्ता एवं विधायक भी शामिल हुए हैं। ओंकारेश्वर पहंुची यात्रा में झिरन्या की किन्नर रूबी कलश लेकर चलीं। उनके साथ और भी किन्नर चल रहे थे। तीर्थनगरी से बड़ी संख्या में स्थानीय महिलाएं कलश यात्रा में शामिल हुईं। यात्रा में शामिल होने के बाद नर्मदा आरती में शामिल होने के लिए नगर घाट की ओर बढ़ती इन महिलाओं के एक समूह से जब यह पूछा गया कि वे क्या सोचकर यात्रा में शामिल हुईं तो उन्होंने एक स्वर में कहा, ''मां नर्मदा को बचाने के लिए दूरदराज से लोग यहां पहंुच रहे हैं, ऐसे में हम भला अपने घरों में कैसे बैठी रह सकती हैं। मां नर्मदा हमारी जीवनदायिनी हैं, उनकी रक्षा हमें ही करनी है।''

नर्मदा संरक्षण में अन्य लोग भी अपनी-अपनी भूमिका सुनिश्चित करते दिखाई दिए। ममलेश्वर, आंेकारेश्वर तथा अन्य मंदिरों तक तीर्थयात्रियों को नाव से पहुंचाने वाले 26 वर्षीय नाविक मनोज ने अपनी नाव में एक कूड़ादान रखा हुआ है और वह नाव पर सवार होने वाले प्रत्येक यात्री से यात्रा शुरू करने से पहले ही निवेदन कर देता है कि यात्रा के दौरान किसी प्रकार का कूड़ा नदी में फेंकने की बजाए उस कूडे़दान में ही डालें। ओंकारेश्वर नाविक संघ ने ऐसे कूडे़दान सभी नाविकों को उपलब्ध कराए हैं। चूंकि अनेक स्थानों पर शहर का गंदा पानी नर्मदा में सीधे मिल रहा है, इसलिए ओंकारेश्वर में चार सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित कर गंदे पानी को साफ करके खेतों की सिंचाई के काम में लाया जाएगा। ओंकार पर्वत को फिर से हरा-भरा करने के लिए 25,000 पौधों की नर्सरी तैयार करने का काम शुरू हो गया है ताकि बरसात के दौरान इस पहाड़ी पर रोपाई की जा सके। संगोष्ठी में बोलते हुए स्वामी अवधेशानंद गिरि ने कहा, ''सिंहस्थ कंुभ का आयोजन अद्भुत था। अब नर्मदा संरक्षण का संकल्प भी प्रशंसनीय है। वृक्षारोपण का निर्णय भी सही समय पर लिया गया है।'' उन्होंने कहा, ''आदि शंकर उत्तर और दक्षिण को जोड़ते हैं, इसलिए दक्षिण के संतों को भी नमामि देवि नर्मदा प्रकल्प से जोड़ा जाए। इस अभियान का जन-आंदोलन बनना भारत के जागरण का संकेत है। मैं आचार्य सभा कर अध्यक्ष होने के नाते सभी संतों की ओर से मुख्यमंत्री का अभिनंदन करता हूं।''

चिन्मय मिशन के स्वामी तेजोमयानंद ने वेदांत के व्यावहारिक पक्ष को समाज के समक्ष रखने के किसी भी प्रयास में अपनी तरफ से पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया। कांची शंकराचार्य स्वामी विजयेन्द्र सरस्वती के प्रतिनिधि के तौर पर आए प्रो. कुटुम्ब शास्त्री ने कहा कि शंकराचार्य की इच्छा है कि नर्मदा परिक्रमा मार्ग को सौर ऊर्जा से जगमग किया जाए और मंदिरों में आदि शंकराचार्य के मंत्रों का नियमित पाठ हो। दीदी मां साध्वी ऋतम्भरा ने कहा कि मां की गोद में मलमूत्र डालना मां का अपमान है, इसलिए सभी संकल्प करें कि वे मां नर्मदा में किसी भी प्रकार की गंदगी नहीं डालेंगे और न ही दूसरों को डालने देंगे। उन्होंने कहा, ''हमारी संस्कृति ने हमें विवेक दिया है। उस विवेक का इस्तेमाल करते हुए रसायनयुक्त मूर्तियों को किसी भी स्थिति में नदी में प्रवाहित न करें।''

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सहसरकार्यवाह श्री सुरेश सोनी ने कहा, ''मां नर्मदा का प्रवाह अविरल और पावन रहे, यह सरकार और समाज सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है और यह जिम्मेदारी ईमानदारी से निभाने की जरूरत है।'' उन्होंने कहा, ''आदिशंकर सनातन परंपरा के प्रतीक हैं और सदियों से उनका दर्शन समाज को एकजुट रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। भौतिक धरातल पर अद्वैत दर्शन को बढ़ावा देने और व्यवहार में अपनाने की जरूरत है। तभी समाज में समरसता का भाव जाग्रत होगा।'' श्री सोनी ने कहा, ''विश्व में गहरा रहे पर्यावरण संकट और आतंकवाद जैसी समस्याओं से निबटने में वेदांत बहुत सहायक है। हमारा दायित्व है कि यह दर्शन पूरी दुनिया में फैले। इसके लिए विद्यालय के शिक्षक, आचार्य, संत एवं माता-पिता सभी को सक्रिय भूमिका निभानी होगी।'' प्रख्यात कलाकार, फिल्मकार एवं 'चाणक्य' धारावाहिक में चाणक्य की भूमिका निभाकर विश्वभर में प्रसिद्धि प्राप्त करने वाले डॉ. चन्द्रप्रकाश द्विवेदी ने प्रश्न किया कि जिस समृद्ध विरासत को हमने अपने पूर्वजों से प्राप्त किया, क्या हम सही सलामत उसे अगली पीढ़ी को सौंप रहे हैं?

वैसे प्रश्न अकेले नर्मदा के प्रदूषण का नहीं है। हमारी अनेक जीवनदायिनी नदियां हमारी मूर्खताओं, शासकों की लापरवाही और कुछ धूर्त लोगों की चालाकियों के कारण अंतिम सांसें गिन रही हैं।  नर्मदा सेवा यात्रा को मिल रहे अपार जनसमर्थन से ऐसा प्रतीत होता है कि यह यात्रा गंगा और यमुना जैसी अन्य नदियों को प्रदूषणमुक्त करने हेतु एक मिसाल पेश करेगी। साथ ही इस यात्रा के माध्यम से समाज जागरण के जो प्रयोग शुरू हो रहे हैं, उनका अनुकरण देश के अन्य राज्यों में भी होगा। 

 

शंकराचार्य और ओंकारेश्वर

आदि शंकराचार्य को उनके गुरु पूज्य गोविंद भागवदपादाचार्य नर्मदा तट पर ही मिले थे और यहीं पर उन्होंने दीक्षा ग्रहण की थी। ओंकारेश्वर मंदिर के नीचे एक गुफा है, जहां उन्होंने बैठकर तप किया था। यहीं पर उन्होंने 'नर्मदाष्टक' की रचना की और अपने शिष्यों के साथ अद्वैत वेदांत का उपदेश दिया। ओंकारेश्वर का महत्व शंकारचार्य के साथ स्वाभाविक रूप से जुड़ा हुआ है। इसलिए नर्मदा सेवा यात्रा जब ओंकारेश्वर पहंुची तो शंकराचार्यजी का स्मरण होना स्वाभाविक है। शंकराचार्य के चिंतन में एकात्मता, देश की अखंडता और सामाजिक समरसता के महत्वपूर्ण सूत्र मिलते हैं। नर्मदा सेवा यात्रा के माध्यम से ऐसे सभी सूत्रों को रेखांकित करने का प्रयास हो रहा है।

ऐसे हुई धन की व्यवस्था

यात्रा के दौरान वृक्षारोपण, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट आदि के लिए पर्याप्त धन की व्यवस्था करने के बाद ही यात्रा शुरू हुई है। इसके लिए नर्मदा सेवा मिशन बनाया गया है जिसमें वन विभाग, राजस्व विभाग, नर्मदा घाटी विकास निगम, बागबानी, कृषि, शहरी विकास आदि शामिल हैं। ट्रीटमेंट प्लांट शहरी विकास विभाग द्वारा स्थापित किए जा रहे हैं, जिसका 1500 रुपये करोड़ का बजट है। बागबानी विभाग का बजट फलदार पेड़ लगाने और किसानों को अनुदान देने में किया जा रहा है। वन विभाग के बजट से सरकारी भूमि पर वृक्षारोपण होगा।

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