| दिंनाक: 13 Feb 2017 17:53:34 |
|
एक कहावत है, अगर मनुष्य धर्म चक्र को ठीक तरह से नहीं घुमाएगा तो वह अपने आप हवा के द्वारा सही रास्ते पर चलने लगता है। पश्चिम बंगाल की राजनीति में अब ऐसी ही घटनाएं घट रही हैं। गत 18 जनवरी को परेड ग्राउंड में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कोलकाता शाखा का वार्षिक सम्मेलन होने वाला था। किन्तु राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी उस सम्मेलन को नहीं होने देना चाहती थीं। इस कारण वे एक के बाद एक अड़ंगा लगाती गईं।
सम्मेलन के लिए प. बंगाल के प्रांत कार्यवाह जिष्णु बसु तथा प्रांत प्रचारक विद्युत मुखर्जी ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। ममता सरकार यह मुकदमा लड़ना चाहती थी परंतु राज्य के महाधिवक्ता जयंत मित्र ने इसका विरोध किया। लेकिन ममता ने उनकी एक नहीं सुनी। नतीजा यह हुआ कि सरकार को अदालत में मुंह की खानी पड़ी और सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत की उपस्थिति में बहुत अच्छा सम्मेलन हुआ। इससे सरकार की जबरदस्त किरकिरी हुई।
इस मामले को अब याद करने के पीछे एक वजह है। 7 फरवरी को महाधिवक्ता जयंत मित्र ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इसके अनेक कारण हैं, पर एक मुख्य कारण संघ और सरकार से जुड़ा हुआ उपरोक्त मामला भी है। मित्र ने अपने इस्तीफे में लिखा है कि रा.स्व. संघ के कार्यक्रम के बारे में ममता ने जो कदम उठाया था, उसके लिए मैंने उन्हें मना किया था, लेकिन उन्होंने मेरी बात नहीं मानी। इस कारण उन्हें कानून के सामने अपना सिर झुकाना पड़ा। केवल इतना ही नहीं, न्यायाधीश जयमाल्या बागची का आदेश न मानने के कारण कोलकाता के पुलिस आयुक्त राजीव कुमार को अदालत की अवमानना करने का मुकदमा झेलना पड़ रहा है। इस मुकदमे की अगली सुनवाई 10 फरवरी को होगी। उच्च न्यायालय में इस मुकदमे का फैसला चाहे कुछ भी हो, पर राजनीतिक पंडितों का कहना है कि इस मामले में ममता बनर्जी और उनकी सरकार की भद पिट रही है। अब इस सरकार की कार्यशैली पर नजर घुमाएं। इसकी कार्यशैली ऐसी है कि छह वर्ष के कार्यकाल में तीन सरकारी महाधिवक्ताओं
ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है।
निवर्तमान महाधिवक्ता जयंत मित्र का कहना है कि आत्मसम्मान बरकरार रखते हुए उनके (ममता) साथ काम करना संभव ही नहीं है। कुछ समय पहले शिक्षा विभाग में सरकार ने 700 कर्मचारियों को नियुक्त किया है। जब नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू हो रही थी तभी महाधिवक्ता ने सलाह दी थी कि लिखित परीक्षा और साक्षात्कार के बाद ही कर्मचारियों की नियुक्ति हो, लेकिन सरकार ने यह सलाह भी नहीं मानी और आज यह मामला भी अदालत में पहुंच गया है। इसी तरह तीन-चार वर्ष पहले पुलिस विभाग में भी नियुक्तियां हुई थीं। वह मामला भी उच्च न्यायालय तक पहुंचा और अदालत ने सरकार की आलोचना करते हुए उन नियुक्तियों को रद्द कर दिया था। सरकार आए दिन कुछ ऐसा काम करती है कि उसे न्यायालय की डांट पड़ती है। यही कारण है कि जयंत मित्र के पहले दो महाधिवक्ताओं अनिन्द्य मित्र तथा विमल चटर्जी को इस्तीफा देना पड़ा था।
जयंत मित्र ने बंगाल के एक विश्वविद्यालय में एक प्राध्यापक की रजिस्ट्रार के पद पर हुई नियुक्ति का भी विरोध किया था। उन प्राध्यापक पर घोटाले का आरोप है और उनके विरुद्ध जांच चल रही है। ममता सरकार पर इस तरह के अनेक आरोप लगे हैं, लेकिन वह अपनी जिद पर अड़ी रहती है और अदालती फटकार अधिकारियों को खानी पड़ती है। -असीम कुमार मित्र