दर्द अनदेखा
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दर्द अनदेखा

Written byArchiveArchive
Jan 9, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 09 Jan 2017 15:50:22

बंगाल के धूलागढ़ में हुई हिंसा को लगभग एक महीना होने चला है, पर वहां के पीडि़त हिंदुओं के दर्द की अनदेखी यूं की जा रही है, मानो उनका हिंदू होना गुनाह हो। जो लोग उनके दर्द को बांटने के लिए धूलागढ़ जाना चाहते हैं, राज्य सरकार उन्हें जाने से रोकती है
 

 

धूलागढ़ से अश्वनी मिश्र

हर दिन की तरह मैं घर पर काम कर रही थी। कुछ दिन बाद मेरी शादी होने वाली थी सोे घर के लोग भी उसी काम में लगे हुए थे। लेकिन अचानक 'अल्लाह-हो-अकबर', 'हिंदुस्तान मुर्दाबाद़, पाकिस्तान जिंदाबाद,' 'हिंदुओं भाग जाओ, नहीं तो सबके सब मारे जाओगे' जैसे नारे लगाते हुए सैकड़ों हथियारबंद मुसलमानों की भीड़ हिंदुओं के घरों की तरफ भागती चली आ रही थी। लेकिन जब तक कोई कुछ समझता तब तक वे हिंदू घरों पर टूट पड़े थे। पहले तो उन्होंने जमकर पत्थरबाजी की, फिर लूटपाट और आगजनी शुरू कर दी। भीड़ घरों पर बम फेंक रही थी। जो भी सामने आया, उसको घसीट-घसीट कर मारा गया। वे यह भी धमकी दे रहे थे कि हिंदुओं को खत्म करके ही छोड़ेंगे। मेरा घर मेरी आंखों के सामने ही जल चुका था। जो शादी का सामान था वह राख बन चुका था और बाकी उन्होंने लूट लिया था। उन्होंने मेरे साथ भी मारपीट की।''
यह कहना है धूलागढ़ हिंसा में अपना सब कुछ गवां चुकीं सुनीता मंडल का। उनकी आंखें थम नहीं रही हैं, लगातार आंसू टपक रहे हैं। डर से थर-थर कांप रही हैं। जली टोपी देखते ही अपने जले घर में दुबक जाती हैं। दर्द और पीड़ा उनके शब्दों में झलकती है।
सुनीता हिंसा में अपना सब कुछ खोने वालीं अकेली हिंदू महिला नहीं हैं। इस हिंसा से सैकड़ों हिंदू परिवार प्रभावित हुए हैं। दंगे की आग ने हिंदुओं का सब कुछ स्वाहा कर दिया है। जो भी संवेदनशील व्यक्ति यहां के हिंदुओं की स्थिति को देखता है, वह पिघल जाता है। सुनीता की उम्र अभी केवल 23 वर्ष है। घर में और भी भाई-बहन हैं। पिता मजदूरी करते हैं और उसी से घर चलता है।
सुनीता रुंधे गले से आगे की घटना बताती हैं, ''कुछ दिनों से यहां के मुसलमान हिंदुओं को परेशान कर रहे थे। अगर कोई हिंदू विरोध करता तो वे एकजुट होकर उसे मार डालने पर आमादा हो जाते। इसी डर से कोई हिंदू उनका विरोध नहीं करता था। उनका हौसला इसी वजह से बढ़ता गया। वे आए दिन यहां के हिंदुओं के साथ कुछ न कुछ ऐसा करते जिससे वे भड़कें और फिर वे हिंदुओं को मारें। और नवी के त्योहार पर उन्होंने अपने मन का किया। 13 दिसंबर, 2016 की शाम से ही नमाज के बाद यहां उपद्रव शुरू हो गया था। मस्जिद से मौलवी खुलेआम धमकी दे रहा था कि हिंदुओं को मार भगाओ। इसके बाद भीड़ ने वही किया जो मौलवी कह रहा था।''
इसे दर्द को केवल सुनीता ही नहीं सह रही हैं। यह तकलीफ धूलागढ़ के सभी हिंदू सह रहे हैं। लेकिन उनके दर्द पर मरहम न तो प्रदेश सरकार लगा रही है और न ही वे सेकुलर, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर जिहादियों के पक्ष में भी खड़े हो जाते  हैं। उनके दर्द की अनदेखी केवल इसलिए की जा रही है क्योंकि वे हिंदू हैं और हिंसा नहीं करते।  
गौरतलब है कि हावड़ा से धूलागढ़ की दूरी सिर्फ 25 किमी है। आसपास के अधिकतर क्षेत्र मुस्लिम बहुल हैं। मस्जिदों की भरमार है। भले ही एक गांव में 100 लोग रहते हों, लेकिन मस्जिदों के लाउडस्पीकर पांच किमी तक अपना संदेश पहुंचाते हैं। धूलागढ़ के आसपास पांच मस्जिदें हैं। स्थानीय हिंदुओं का कहना है कि मस्जिदों के मौलवी समय-समय पर मुसलमानों को हिंदुओं के खिलाफ भड़काते रहते हैं। 13 दिसंबर के बाद जो बवाल हुआ, उसका कारण भी कहीं न कहीं मस्जिदों के मौलवी ही हैं। धूलागढ़ में एक काली मंदिर है। मंदिर के पुजारी ब्रह्मानंद कहते हैं, ''मंदिर से कुछ ही दूरी पर साकन्तला मस्जिद है। नवी की शाम को मस्जिद से मौलवी जोर-जोर से लाउडस्पीकर से बोल रहा था कि मुस्लिमो एक हो जाओ। हिंदुओं को मरना होगा। अब इन्हें यहां नहीं रहने देंगे। इन्हें घर में घुसकर मारो। इसके बाद जो हुआ, वह अभी भी डर पैदा करता है।'' वे हिंसा की शुरुआत के बारे में कहते हैं कि 13 दिसंबर को मुसलमानों की जिद थी कि वे नवी के जुलूस को उन रास्तों से ले जाएंगे जिधर हिंदू बस्तियां हैं। पहले इन रास्तों से कभी जुलूस नहीं निकला था। इस बात का हिंदुओं ने विरोध किया। बस विरोध करते ही पहले से तैयार मुस्लिम हिंदुओं पर टूट पड़े। जो मिला उसे मारा पीटा़.़ घर जलाए और लूटपाट की। हिंसा इतनी बढ़ गई कि उन्होंने पुलिस के उच्च अधिकारियों को भी नहीं छोड़ा। पुलिस मूक दर्शक बनी हुई थी।'' एक पुलिस अधिकारी नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, ''खुफिया सूचनाओं के हवाले से मैंने एक दिन पहले ही हिंदुओं को आगाह करा दिया था कि यहां हिंसा हो सकती है। मुसलमान एक-दो दिन में हमला करेंगे। इसलिए तब तक कहीं और चले जाओ। और ऐसा ही हुआ।'' पुलिस ने दंगाइयों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की, इस पर वे कहते हैं, ''हिंसा बढ़ती देखकर जब पुलिस ने उच्च अधिकारियों से भीड़ पर लाठीचार्ज करने की अनुमति मांगी तो ऊपर से ऐसा न करने के लिए कहा गया।'' 

मस्जिद से मौलवी जोर-जोर से लाउडस्पीकर से बोल रहा था कि मुस्लिमो एक हो जाओ। हिंदुओं को मरना होगा। अब इन्हें यहां नहीं रहने देंगे। इन्हें घर में घुसकर मारो। इसके बाद जो हुआ वह अभी भी डर पैदा करता है।
— ब्रह्मानंद, पुजारी, काली मंदिर, धूलागढ़ 

ममता का झूठ
धूलागढ़ की घटना स्थानीय है।  वहां सांप्रदायिक हिंसा नहीं हुई है। सोशल मीडिया पर इस घटना का दुष्प्रचार किया जा रहा है।
— ममता बनर्जी,मुख्यमंत्री, प. बंगाल— ब्रह्मानंद, पुजारी, काली मंदिर, धूलागढ़

जनता ने बताया क्या हैसच
जब तक कोई कुछ समझता तब तक वे हिन्दू घरों पर टूट पड़े थे। पहले तो उन्होंने जमकर पत्थरबाजी की फिर लूटपाट और आगजनी शुरू कर दी। भीड़ घरों पर बम फेंक रही थी। जो भी सामने आया उसको घसीट-घसीट कर मारा गया। वे यह भी धमकी दे रहे थे कि हिंदुओं को खत्म करके ही छोड़ेंगे। मेरा घर मेरी आंखों के सामने ही जल चुका था। जो शादी का सामान था वह राख बन चुका था और बाकी उन्होंने लूट लिया था। उन्होंने मेरे साथ भी मारपीट की।
— सुनीता मंडल, पीडि़ता   (आज भी डर से कांप,ती और अपने हाल पर सुबकती सुनीता ने फोटो के लिए मना कर दिया।)

उस दिन मुसलमानों ने हिंदू बस्ती में जो आतंक मचाया उसे शब्दों में नहीं बताया जा सकता। मेरा एक ही कमरे का खपरैल का घर था, उसे भी उन दुष्टों ने नहीं छोड़ा। अब मैं बेघर हूं, कहीं से कोई मदद भी नहीं मिली।
— झरना प्रजापति, पीडि़ता

जब हमला हुआ तो पुलिस ने ही कहा, भाग जाओ नहीं तो मारे जाओगे। दंगाइयों ने महिलाओं को भी बहुत मारा-पीटा। मेरे सामने ही मेरे घर में आग लगाई गई। देखते ही देखते सब कुछ खाक हो गया। अब मैं अपनी बेटी की शादी कैसे करूं?
— सुकुमार गोले, पीडि़त

जो ममता बनर्जी मुसलमानों के थोड़े से नुकसान पर आंसू बहाने लगती हैं, वही ममता सैकड़ों हिंदुओं के घर जल जाने पर कुछ बोलती तक नहीं हैं। उलटे इसे झुठलाने का प्रयास करती हैं। यह मुस्लिम  तुष्टीकरण नहीं तो और क्या है?    -राजश्री हलधर, वरिष्ठ अधिवक्ता, कोलकाता उच्च न्यायालय

 

इस पुलिस अधिकारी का यह बयान राज्य की ममता सरकार की मंशा  को बताने के लिए काफी  है। हिंसा के चलते धूलागढ़ के 100 से ज्यादा हिंदू अपने घर छोड़कर चले गए हैं, वहीं 500 से ज्यादा परिवार अपने जले घरों को देखकर आंसू बहाने पर मजबूर हैं। इतने के बाद भी इनकी ओर ममता बनर्जी का ध्यान नहीं है। सरकार की ओर से पीडि़त हिंदुओं को अभी तक किसी तरह का मुआवजा भी नहीं दिया गया है। थोड़ी राहत सामग्री जरूर दी गई थी, पर वह ऊंट के मुंह में जीरे के समान है।
इस रपट को लिखने तक हिंसा को हुए 25 दिन हो गए हैं, लेकिन हालात वैसे के वैसे ही हैं। हिंदू डर के चलते अपने घरों में दुबके हुए हैं। वहीं यहां की कोई खबर बाहर न जा पाए इसका भी सरकार ने पूरा इंतजाम कर रखा है। किसी बाहरी व्यक्ति को धूलागढ़ जाने से रोका जाता है। बाहरी व्यक्ति पुलिस की नजरें बचाकर ही वहां पहुंच सकता है। इस संवाददाता ने भी ऐसा ही किया। लेकिन जब वहां के पीडि़तों से बात हो रही थी तो पुलिस ने ऐसा करने से मना किया और उनकी तस्वीरें भी लेने से रोका।
इस मसले पर कोलकाता उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता राजश्री हलधर कहते हैं, ''जो ममता बनर्जी मुसलमानों के थोड़े से नुकसान पर आंसू बहाने लगती हैं, वही ममता सैकड़ों हिंदुओं के घर जल जाने पर कुछ बोलती तक नहीं हैं। उलटे इसे झुठलाने का प्रयास करती हैं। यह मुस्लिम  तुष्टीकरण नहीं तो और क्या है?'' बंगाल के मीडिया के संदर्भ में उन्होंने कहा, ''यहां का मीडिया ममता की कठपुलती है। सरकार की ओर से उसे जो बोला जाता है वही करता है। यही कारण है कि धूलागढ़ की हिंसा को  बंगाल के मीडिया में जगह नहीं मिली।''
 एक अन्य पीडि़ता झरना प्रजापति की उम्र लगभग 45 वर्ष है। वे कहती हैं, ''उस दिन मुसलमानों ने हिन्दू बस्ती में जो आतंक मचाया उसे शब्दों में नहीं बताया जा सकता। मेरा एक ही कमरे का खपरैल का घर था, उसे भी उन दुष्टों ने नहीं छोड़ा। अब मैं बेघर हूं, कहीं से कोई मदद भी नहीं मिली।'' सुकुमार गोले भी हिंसा से पीडि़त हुए हैं। उनके परिवार में पत्नी और तीन बेटियां हैं। दो की शादी हो चुकी है और तीसरी बेटी की शादी मार्च में होने वाली थी। सुकुमार शादी का सामान महीनों से जमा कर रहे थे। लेकिन हिंसा ने उनके अरमानों पर पानी फेर दिया। दंगाइयों ने पहले उनके घर को लूटा और बाद में आग के हवाले कर दिया। सुकुमार कहते हैं, ''पुलिस ने भी हमारी मदद नहीं की। जब हमला हुआ तो पुलिस ने ही कहा, भाग जाओ नहीं तो मारे जाओगे। दंगाइयों ने महिलाओं को भी बहुत मारा-पीटा। मेरे सामने ही मेरे घर में आग लगाई गई। देखते ही देखते सब कुछ खाक हो गया। अब मैं अपनी बेटी की शादी कैसे करूं?''
सुकुमार इन दिनों खुद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा चलाए जा रहे शिविर में रह रहे हैं और बेटी तथा पत्नी को बड़ी बेटी के घर छोड़ आए हैं। उनके जैसे सैकड़ों हिंदू हैं, जो अपने भविष्य को लेकर चितिंत हैं। उन हिंदुओं को चिंता-मुक्त करने के लिए कोई आगे नहीं आ रहा है। इसे हिंदुओं का दुर्भाग्य कहेंगे या उनका हिंदू होना ही दुर्भाग्य है, यह तय करना होगा।  

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